VIDEO: लोकसभा चुनाव में टिकटों को लेकर महिलाओं की भागीदारी हो रही नजरअंदाज !

Naresh Sharma Published Date 2019/03/17 03:21

जयपुर (नरेश शर्मा)। राजस्थान में पुरुष मतदाताओं की तुलना में महिला मतदाताओं की संख्या बस 20 लाख ही कम है, लेकिन इसके बावजूद लोकसभा चुनाव में इस आधी आबादी का प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है। राजनीतिक पार्टियां महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण की वकालत करती है, लेकिन हकीकत यह है कि दोनों ही प्रमुख दल महिलाओं को टिकट देने के मामले में हाथ खुले नहीं रखते। यही कारण है कि आजादी के बाद 2014 तक हुए आम चुनाव में महज 180 महिला प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा और इनमें से 28 ही संसद में पहुंच पाईं। खास रिपोर्ट-

राजस्थान में लोकसभा चुनाव में महिलाओं की भागीदारी पहले ही चुनाव से शुरू हो गई थी, लेकिन आज तक चार से अधिक महिलाएं एक चुनाव में नहीं जीत सकी। राजस्थान की महिलाएं राजनीति के शिखर तक पहुंची हैं। प्रतिभा पाटिल राज्यपाल व राष्ट्रपति रह चुकी है, कमला बेनीवाल भी राज्यपाल पद पर सुशोभित हो चुकी है। वसुंधरा राजे दो बार प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी है, वहीं गिरिजा व्यास प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रह चुकी है। वसुंधरा राजे, गिरिजा व्यास व चंद्रेश कुमारी तो केंद्र में मंत्री भी रह चुकी है। वहीं प्रभा ठाकुर राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रह चुकी है। लेकिन इसके बावजूद दोनों ही दल महिलाओं को टिकट देने में हाथ खुले नहीं रखते। शुरुआती चुनाव में औसतन पांच से छह महिलाएं चुनाव मैदान में उतर रही थीं, लेकिन 1991 के बाद इसमें तेजी आई और चुनाव मैदान में उतरने वाली महिलाओं की संख्या 20 से 25 तक हो गई। वर्ष 2009 में सबसे ज्यादा 31 महिलाओं ने चुनाव लड़ा, जबकि 2014 में 27 महिलाएं चुनाव मैदान में थीं। दो आम चुनाव 1957 और 1977 ऐसे रहे, जब एक भी महिला चुनाव मैदान में नहीं थी।

राजस्थान में मुख्य मुकाबला हमेशा भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रहा है, लेकिन इन दलों ने भी आधी आबादी को ज्यादा अवसर नहीं दिए। अब तक हुए आम चुनावों पर नजर डाले तो भाजपा ने 19 महिला प्रत्याशियों को और कांग्रेस ने 27 महिला प्रत्याशियों को टिकट दिए हैं। कांग्रेस पहले लोकसभा चुनाव से ही मैदान में रही है, लेकिन राजस्थान में उसने 1980 में पहली बार महिला प्रत्याशी निर्मला कुमारी को टिकट दिया। भाजपा ने पहली बार 1984 में दो महिलाओं को टिकट दिया था। खास बात यह है कि भाजपा व कांग्रेस चेहरे बदले बिना ही महिलाओं को मैदान में उतारती रही है। वसुंधरा राजे 1989 से 1999 तक हुए पांच लोकसभा चुनाव में हर बार चुनाव मैदान में रहीं और जीतीं। इसी तरह कांग्रेस की ओर से गिरिजा व्यास को 1991 से 2004 तक लगभग हर बार टिकट मिला और एक बार छोड़कर वे लगातार जीती भी।  

—राजस्थान में पहले चुनाव में दो महिलाएं खड़ी हुईं, दोनों की जमानत जब्त हुई
—तीसरे आम चुनाव में छह महिलाएं मैदान में उतरीं
—जयपुर राजघराने की गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी से सांसद बनीं
—गायत्री देवी राजस्थान की पहली महिला सांसद बनीं
—1971 का चुनाव महिलाओं के हिसाब से अच्छा चुनाव रहा
—चार महिलाओं ने चुनाव लड़ा। दो जीत गईं और दो हार गईं
—1980 में पहली बार कांग्रेस ने निर्मला कुमारी को टिकट दिया
—चित्तौड़गढ़ से सांसद चुनी गईं निर्मला कुमारी
—1989 में भाजपा ने एक,  कांग्रेस ने तीन महिलाओं को टिकट दिए
—कांग्रेस की तीनों प्रत्याशी चुनाव हार गईं
—भाजपा की वसुंधरा राजे पहली बार झालावाड़ से सांसद बनीं
—2014 में कांग्रेस ने छह महिलाओं को टिकट दिया
—लेकिन कांग्रेस की एक भी महिला नहीं जीत सकी
—भाजपा ने महज एक को झुंझुनू से टिकट दिया और जीत गई

राजस्थान की महिला सांसदों पर एक नजर:

1962 
—गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी
1967 
—गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी
1971 
—गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी
—कृष्णा कुमारी निर्दलीय
1980 
—निर्मला कुमारी कांग्रेस आई
1984 
—इंदुबाला सुखाड़िया कांग्रेस
—निर्मला कुमारी कांग्रेस
1989 
—वसुंधरा राजे भाजपा
1991 
—महेंद्र कुमारी भाजपा
—कृष्णेंद्र कौर भाजपा
—वसुंधरा राजे भाजपा
—गिरिजा व्यास कांग्रेस
1996 
—दिव्या सिंह भाजपा
—उषा देवी कांग्रेस
—वसुंधरा राजे भाजपा
—गिरिजा व्यास कांग्रेस
1998 
—उषा मीणा कांग्रेस
—प्रभा ठाकुर कांग्रेस
—वसुंधरा राजे भाजपा
1999 
—जसकौर मीणा भाजपा
—वसुंधरा राजे भाजपा
—गिरिजा व्यास कांग्रेस
2004 
—किरण माहेश्वरी भाजपा
—सुशीला बंगारू भाजपा
2009 
—ज्योति मिर्धा कांग्रेस
—चंद्रेश कुमारी कांग्रेस
—गिरिजा व्यास कांग्रेस
2014 
—संतोष अहलावत भाजपा

विधानसभा में दोनों ही पार्टियों ने महिलाओं को टिकट दिए थे, लेकिन अब नजर लोकसभा पर है। कांग्रेस की महिला प्रकोष्ठ ने छह सीट की मांग की है, तो भाजपा मोर्चा ने भी अच्छी संख्या में महिलाओं को टिकट देने की वकालत की है। लेकिन देखना यह है कि देश की दोनों प्रमुख पार्टिया सत्ता में महिलाओं की भागीदारी कितनी कर पाते हैं। नारों व वादों के बीच पिछले 40 साल में राजनीति में महिलाओं की सिर्फ सक्रियता बढ़ी है, भागीदारी नहीं।

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