शराब के कारोबार को प्रदेश में अब महिलाएं भी करती आएंगी नजर, 37 फीसदी दुकान महिलाओं के नाम

शराब के कारोबार को प्रदेश में अब महिलाएं भी करती आएंगी नजर, 37 फीसदी दुकान महिलाओं के नाम

शराब के कारोबार को प्रदेश में अब महिलाएं भी करती आएंगी नजर, 37 फीसदी दुकान महिलाओं के नाम

जयपुर: जिस कारोबार को सामाजिक ताने-बाने में गलत माना जाता हो उसी शराब के कारोबार को प्रदेश में अब महिलाएं करती नज़र आएंगी. जी हां... इस बार के आबकारी बंदोबस्त में 37 फीसदी शराब की दुकान महिलाओं के नाम निकली हैं. सर्वाधिक 48 फीसदी शराब दुकान भरतपुर में महिलाओं के नाम निकली हैं तो सबसे कम 24 फ़ीसदी झालावाड़ में महिलाओं के नाम निकली हैं. 

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37 फीसदी शराब की दुकान महिलाओं के नाम:
प्रदेश में इस बार आबकारी बंदोबस्त के तहत शराब दुकान और समूह की लॉटरी 12 मार्च को निकाली गई थी. इस बार 6454 दुकान और समूह के लिए लॉटरी आयोजित की गई जिसमें से 2411 दुकान और समूह की लॉटरी महिलाओं के नाम निकली जोकि पूरी लॉटरी का 37 फ़ीसदी है. पिछले बंदोबस्त में 6546 दुकान और समूहों की लॉटरी में 2387 दुकान पर समूह महिलाओं के नाम निकले थे जो कि दुकान और समूह की संख्या का 36 फ़ीसदी था. यानी इस बार 1 फ़ीसदी ज्यादा दुकान है महिलाओं के नाम निकली हैं.

अजमेर जिले में सबसे ज्यादा 149 दुकान महिलाएं चलाती नजर आएंगी:
जिलों के हिसाब से बात करें तो अजमेर जिले में सबसे ज्यादा 149 दुकान महिलाएं चलाती नजर आएंगी. अलवर जिले में 106, भीलवाड़ा में 102, झुंझुनू में 132, जोधपुर में 126, पाली में 103, सीकर में 127, श्रीगंगानगर में 101 और उदयपुर में 122 देसी और अंग्रेजी शराब की दुकान महिलाएं चलाएंगी. जयपुर शहर और जयपुर ग्रामीण में भी 93-93 दुकान महिलाओं के नाम निकली हैं. हालांकि इस बार आबकारी बंदोबस्त में अजमेर, हनुमानगढ़ व कई अन्य जिलों में देसी मदिरा की कई दुकानों के लिए आवेदन नहीं मिले अन्यथा महिलाओं की संख्या और ज्यादा हो सकती थी. इस बार हनुमानगढ़ में 28 श्रीगंगानगर में 61 दुकानों के लिए आवेदन नहीं मिले.

हर कोई शराब के कारोबार में भाग्य आजमा रहा:
दरअसल प्रदेश में शराब का कारोबार पहले चंद लोगों तक ही सीमित था जो ग्रुप बनाकर शराब की दुकान खरीदा करते थे लेकिन अब हर कोई शराब के कारोबार में भाग्य आजमाना चाहता है. इसके पीछे कारण भी है... दरअसल सरकार द्वारा शराब दुकानों के लाइसेंस आवंटन से धरोहर राशि को हटा दिया गया है. अब कोई भी महज ₹30000 खर्च कर शराब दुकान के लिए आवेदन लगा सकता है. यदि उसके नाम दुकान आवंटित होती है तो उसके वारे न्यारे होना तय है. शराब के परंपरागत कारोबारी उस सफल लाइसेंसी से लाखों रुपए में उस दुकान को खरीद लेते हैं और फिर करोड़ों रुपए उस दुकान से कम आते भी हैं. इसलिए पिछले दो-तीन वर्ष से देखा गया है कि शराब कारोबारी खुद के रिश्तेदार, नौकर, चाकर और यहां तक की खुद के घर की महिलाओं तक के नाम से आवेदन लगाते हैं. 

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सभी जिम्मेदारी में महिला को सक्रिय रहना पड़ेगा:
यह अलग बात है कि महिलाओं के नाम लॉटरी निकलने पर उस दुकान से संबंधित सभी जिम्मेदारी में उस महिला को सक्रिय रहना पड़ता है. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जिस शराब के धंधे को समाज में एक सामाजिक कुरीति माना जाता है, उसमें 37 फ़ीसदी महिलाओं के नाम शराब दुकान निकलना कहने को तो एक विडंबना है लेकिन एक ऐसी सच्चाई भी जो इस कारोबार के जरिए रातो रात लखपति बनने का सपना दिखाती है. 

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