विश्व जल दिवस: जैसलमेर का बड़ा भूभाग आज भी पानी के लिए कर रहा संघर्ष

विश्व जल दिवस: जैसलमेर का बड़ा भूभाग आज भी पानी के लिए कर रहा संघर्ष

विश्व जल दिवस: जैसलमेर का बड़ा भूभाग आज भी पानी के लिए कर रहा संघर्ष

जैसलमेर: आज विश्व जल दिवस है और पानी का महत्व रेगिस्तानी जिले के वाशिंदों से बेहतर और शायद ही कोई जान सके. बात करें जैसलमेर जिले की तो पीने का पानी यहां की सबसे प्रमुख समस्या रही है, जिसके लिए यहां के लोगों ने रेगिस्तान का सीना चीर कर अपने व अपने पशुओं के पीने योग्य पानी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए बेरियां खोदी, जिसमें बारिश के दौरान भूगर्भ में सिंचित जल रिस-रिस कर आता था. इसके साथ ही महिलाएं कई किलोमीटर तक पैदल चल कर सर पर बर्तन रखकर पानी लाती थी और उसका कई तरीके से सदुपयोग करती थी. 

भू जल वैज्ञानिक नारायण दास इणखिया ने बताया कि यहां पर पुराने समय ने पानी का अधिक महत्व था पानी के उपयोग को लेकर भी यहां एक कहावत थी की 'घी सस्ता और पानी मंहगा'. ऐसे में यहां के लोग पानी का बहुत उपयोग करते थे, जिसमें नहाने के पानी से कपड़े धोना और कपड़े धोने के बाद बचे हुए पानी को पौधों को दे देना ताकि पानी व्यर्थ नहीं जाए. साथ ही यहां घी-दूध मांगने पर सहज ही उपलब्ध हो जाता था लेकिन पानी नहीं. उन्होंने बताया कि अब जैसलमेर में इंदिरा गांधी नहर का पानी पहुंच रहा है, जिससे नहरी इलाकों में हरियाली बढ़ी है, लेकिन आज भी जिले का बड़ा भूभाग पानी के लिए संघर्ष कर रहा है. 

भूजल का दोगुनी गति में दोहन हो रहा: 
अत्याधुनिक वैज्ञानिक संसाधनों की उपलब्धता के कारण अब यहां पर बड़ी संख्या में बोरवेल भी खुद गए हैं, जिससे भूजल का दोगुनी गति में दोहन हो रहा है और वर्षा जल जो पारंपरिक तरीकों से संवर्धन किया जाता था, वो बिल्कुल नहीं हो रहा है. साथ ही, परम्परागत जल स्त्रोतों की अनदेखी की जा रही है और वनों की कटाई के कारण पर्यावरण पर विपरीत असर पड़ रहा है, जो जिले के भविष्य के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है. इस मौके पर भू जल वैज्ञानिक नारायण दास इणखिया ने आमजन से वर्षा जल के संचयन के साथ ही परम्परागत जल स्रोतों के संरक्षण के साथ पानी के सदुपयोग की अपील की है.  

और पढ़ें