बनास की बर्बादी का सबब अवैध बजरी खनन, शिकायत के बाद भी सुस्त है प्रशासन

FirstIndia Correspondent Published Date 2017/02/02 16:16

टोंक | टोंक मे बनास नदी कई माईनों मे यहां के वासिंदों के लिये जीवनदायनी कहलाती है| लेकिन समय की रेत की तरह ही संबंधित विभाग और अधिकारियों की लापरवाह कार्यप्रणाली की वजह से लीज़ धारक मनमानी से रहे हो अंधाधुंध बजरी खनन बनास की बर्बादी का कहानी बयां कर रहा है| टोंक में रोजाना हजारों पौकलेंड मशीनों द्वारा बनास के चीर का हरण कर यहां की बजरी ट्रकों मे भरी जा रही है, जिसकों लेकर ना तो किसी नियम की परवाह की जा रही है और ना ही भविष्य मे आने वाले समस्याओं पर किसी का ध्यान है| लगातार खनन होने के चलते जहां बनास के किनारे बसे अधिकतर ग्रामीण क्षेत्र फ्लोराईड युक्त पानी पीने को मजबूर है तो जगह-जगह हुये गढ्ढों आये दिन हादसों को कारण बन रहे है| 

 

टोंक की बनास नदी मे बीसलपुर बांध क्या बना, लोगों को बनास की कोख लूटने का जैसा मौका मिल गया हो| दरअसल टोंक के जिले राजमहल और देवली के बीच बीसलपुर बांध बनने के बाद टोंक मे पानी की आवक बंद हो गई और जैसे ही आवक बंद हुई तो खनन माफियाओं की बुरी नजर बनास मे मौजूद पीले सोने यानि बजरी पर ऐसी पडी कि देखते ही देखते स्थानीय लोगो से लेकर खनन माफियाओं तक बनास से बजरी खनन कर मुनाफा कमाने की जुगत मे लग गया| आज हालात यह है कि बनास मे 30-30 मीटर की गहराई पर खनन किया जा रहा है और वर्तमान मे लीज़ होल्डर खनन करने की नियमों के ताक मे रखकर वहां से भी खनन कर रहा है, जिससें को लेकर ना तो प्रशासन और ना ही जनप्रतिनिधि आवाज उठाते दिखाई दे रहे है और ऐसे मे टोंक के आम बाशिंदें बनास की उजड़ती कोख पर अधिकारियों को कोसते नजर आ रहे है।

 

टोंक मे बजरी खनन को लेकर आम आदमी ही नही बल्कि विपक्षी दलों के नेता प्रशासन और सरकार पर ठेकेदार से मिलीभगत का आरोप लगाया चुके है लेकिन ना तो इससे बनास मे हो रहे अंधाधुंध खनन पर कोई प्रभाव पडा और ना ही नियम के दायरों को सीमाज्ञान किया गया| बल्कि ठेकेदार की मनमानी तो तो इतनी बढ़ गई कि नदी मे पेयजल के लिये छोडे गए एक चौथाई भाग पर भी खनन करने से नही चूक रहा है| बल्कि बरसात के दिनों मे नदी मे भहाव के बीच खनन कार्य किया गया|

 

आपकों बता दे बनास मे लीज ठेकेदार द्वारा खनन कार्य मे बरती जा रही अनियमितताओं, नियम विरूद्ध खनन और बनास नदी में ट्रकों की आवाजाही के लिए बनाई गई अवैध सड़क के मामलें को टोंक जिले के ही विधायक राजेन्द्र गुर्जर ने संसद ने उठाया है| उसके बावजूद प्रशासन और विभाग द्वारा लीज़ धारक द्वारा किए जा रहे अवैध खनन कार्य में रोकथाम नही होना प्रशासन और विभाग के अधिकारियों का ठेकेदार से मिलीभगत होने की तरह साफ इंगित करता है| 

 

भले ही टोंक मे पानी के लिये जनता त्रस्त हो और पूर्व कलेक्टरों ने बनास के पच्चीस किलोमीटर क्षेत्र को प्रतिबंधित क्षेत्र की श्रेणी डाला हो लेकिन वर्तमान में बजरी खनन के आगे हर कोई नतमस्तक है| जनप्रतिनिधि आवाज तो उठाते है लेकिन उनकी आवाज भी प्रशासनिक मेहरबानी के आगे मानों दबी सी नजर आती है| सांसद से लेकर विधायक सभी को ग्रामीणों द्वारा अक्सर बजरी ठेकेदार की शिकायत लेकर पहुंचते है पर उन्हे भी आश्वासन के सिवा कुछ नही मिल पाता|

 

वही कानून के जानकारों की नजर मे खनन के नियम कहते है कि पर्यावरण का ध्यान रखकर तीन मीटर से अधिक खनन नही होना चाहिये| वही पानी वाले क्षेत्र के साथ प्रतिबंधित क्षेत्र मे बजरी खनन नही किया जा सकता है लेकिन जब खनिज विभाग, पुलिस महकमा या फिर यह कहिए कि पूरा प्रशासन लीज़ ठेकेदार की आव भगत मे तैनात हो तो कौनसे नियम, किसके नियम? क्योंकि नियम तो सिर्फ गरीब और कमजोर पर लागू होते है|

 

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