...इस वजह से मिली कांग्रेस में राजस्थान के 'जादूगर' को सीएम की कमान

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/12/14 06:06

जयपुर। राजस्थान में सत्ता की चाबी अपने हाथों में आने के बाद से शुरू हुआ राजस्थान में मुख्यमंत्री का फैसला कांग्रेस ने आज आखिरकार कर दिया है। कांग्रेस आलाकमान की ओर से लिए गए फैसले के अनुसार राजस्थान में अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री और सचिन पायलट के ​उपमुख्यमंत्री बनाए जाने को ऐलान कर दिया गया है। पूर्व में दो बार सूबे के मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत जहां तीसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बन रहे हैं, वहीं पूर्व में केन्द्रीय मंत्री रह चुके सनि पायलट भी डिप्टी सीएम के रूप में उनके साथ प्रदेश की सत्ता संभालेंगे।

राजस्थान में कांग्रेस के हाथों में आई सत्ता की कमान कांग्रेस आलाकमान ने पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री अशोक गहलोत और पीसीसी चीफ सचिन पायलट के हाथों में सौंपी है। दोनों को एक साथ मिलकर प्रदेश में कार्य करने का जिम्मा जनता के साथ साथ पार्टी आलाकमान ने भी दे दिया है। ऐसे में राजस्थान में कांग्रेस के साथ साथ सियासत के जादूगर कहे जाने वाले अशोक गहलोत के सियासी सफर के बारे में जानना भी काफी दिलचस्प है।

पिता से सीखा जादूगरी का फन :
जोधपुर के सरदारपुरा विधानसभा क्षेत्र में अशोक गहलोत का पुश्तैनी घर है, जहां से वे विधायक हैं। यहीं अशोक का 3 मई 1951 में जन्म हुआ। अब यहां उनके भाई अग्रसेन रहते हैं, गहलोत ने 1962 में छठी कक्षा में सुमेर स्कूल में दाखिला लिया था। अशोक गहलोत इनके पिता बाबू लक्ष्मण सिंह गहलोत देश के जाने-माने जादूगर थे। अशोक गहलोत ने भी पिता से ये फन सीख लिया था। स्कूली दिनों में ही जादू की कला से लोकप्रियता साधना अशोक गहलोत को आ गया था। स्कूल में अशोक गहलोत रूमाल निकालने और कबूतर उड़ाने का जादू दिखाया करते थे।

कहां से शुरू हुआ सियासी सफर :
अशोक गहलोत स्काउट और एनसीसी के जरिए होने वाली समाज सेवा में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे, वाद-विवाद में माहिर थे। इसी शौक ने उन्हें पहला सार्वजनिक पद यानी छात्रसंघ में उपमंत्री का ओहदा भी दिलवा दिया। पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए इन्होंने इकोनॉमिक्स चुन लिया और यहीं से उनका सियासी सफर भी शुरू हो गया। शुरुआत छात्रसंघ चुनाव में दोस्त के हाथ मिली हार के साथ हुई। कॉलेज से निकलने के बाद रोजगार का संकट नजर आने पर गहलोत ने 1972 में जोधपुर से पचास किलोमीटर दूर पीपाड़ कस्बे में खाद-बीज की दुकान खोली, लेकिन सफलता हाथ  नहीं लगी। डेढ़ साल में ही कारोबार समेट कर जोधपुर लौट आए।

बाइक बेचकर लड़ा पहला चुनाव :
1977 में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस का टिकट लेने के लिए जोधपुर में कोई भी सीनियर नेता आगे नहीं आ रहा था। ऐसे में एनएसयूआई में रम चुके अशोक गहलोत को टिकट की पेशकश मिली, जिसे उन्होंने लपक लिया। बताया जाता है कि गहलोत ने यह चुनाव चार हजार रुपए में अपनी बाइक बेचकर वो चुनाव लड़ा था। 1980 में किस्मत ने फिर गहलोत का दरवाजा खटखटाया, जब जोधपुर लोकसभा का चुनाव लड़ने से सीनियर नेता पीछे हट गए। मौका देखकर 29 साल के नौजवान गहलोत ने लोकसभा का टिकट मांग लिया। दोस्त रघुवीर सैन का सैलून चुनावी कार्यालय बन गया। 1980 में अशोक गहलोत देश के सबसे युवा सांसद बन गए थे।

गांधी परिवार के रहे सबसे विश्वासपात्र :
इंदिरा गांधी गहलोत से इतनी प्रभावित हुईं कि 1982 में उन्हें केन्द्र में राज्यमंत्री बना दिया। 1984 में गहलोत राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सबसे युवा अध्यक्ष बना दिए गए। आखिरकार नए नेताओं की यही कतार गहलोत की ताकत बन गई और दिग्गजों की कमजोरी। इंदिरा गांधी के बाद अशोक गहलोत राजीव गांधी के भी विश्वासपात्र रहे, फिर सोनिया गांधी का भी भरोसा जीता। दो बार मुख्यमंत्री रह चु​के गहलोत का कार्यकाल बतौर मुख्यमंत्री एक स्वच्छ और बेदाग नेता के रूप में जाना जाता रहा है। यही वजह है कि उन पर आलाकमान ने फिर से भरोसा जताया है और राजस्थान में एक बार फिर से उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया है।

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