VIDEO: SMS अस्पताल में लगी आग के घटनाक्रम की सीएमओ पहुंची रिपोर्ट में बड़ा खुलासा 

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/05/15 09:57

जयपुर: एसएमएस अस्पताल की लाइफ लाइन में लगी आग की लपटों से करीब चार करोड़ रुपए के बड़े भ्रष्टाचार की बूं आ रही है. दरअसल अस्पताल में पिछले छह सालों में लाइफ लाइन में आपूर्तिकर्ता फर्मों पर दवाओं की आपूर्ति में "लेटलतीफी" का जुर्माना ही नहीं लगाया गया. अस्पताल प्रशासन और फर्मों के बीच चली इस मिलीभगत से एक तरफ जहां मरीज दवाओं के लिए भटकते रहे, वहीं दूसरी ओर राजस्व को चपत भी लगी. ये कोई हमारा आरोप नहीं, बल्कि अग्निकाण्ड को लेकर सीएमओ भेजी गई रिपोर्ट का खुलासा है. आखिर कैसे किया गया लाइफ लाइन में भ्रष्टाचार और कौन-कौन रहे जिम्मेदार, पेश है फर्स्ट इंडिया की एक्सक्लुसिव रिपोर्ट:

एसएमएस अस्पताल की मुख्य लाइफ लाइन, किसी जमाने में निजी कम्पनी के जरिए लाइफ लाइन संचालित की जा रही थी, लेकिन वर्ष 2012 में अस्पताल प्रशासन ने खुद लाइफ लाइन का संचालन शुरू किया. उद्देश्य ये था कि मरीजों को बाजार दर से 30 से 50 फीसदी तक सस्ती दवाएं उपलब्ध हो, लेकिन कुछ समय बाद ही ये उद्देश्चय प्रभारियों की कमाई का जरिया बन गया. पिछले सात सालों में आधा दर्जन अधीक्षक और प्रभारी बदले, लेकिन सबका जोर इस बात पर रहा कि लाइफ लाइन पर दवाओं के लिए फर्मो को अधिक से अधिक ऑर्डर तो दिए जाए. परंतु समय पर आपूर्ति नहीं करने वाली फर्मों पर जुर्माना नहीं लगा. 

इस मनमानी से कैसे आया मरीजों पर असर और फर्मों ने कूटी चांदी:
—जयपुर SMS अस्पताल की "आग" में सुलगते कई सवाल 
—लाइफ लाइन में 7सालों में "LD" की आड़ में बड़ा खेल 
—दरअसल, 2012 से अस्पताल प्रशासन चला रहा था लाइफ लाइन
—इस दौरान कई बार सामने आए ऐसे केस, जब फर्मों की लेटलतीफी के चलते मरीजों को नहीं मिली दवा 
—बावजूद इसके फर्मों पर नहीं लगाया गया नियमानुसार जुर्माना 
—अक्टूबर 2018 से जब प्रशासन ने "जुर्माने" पर दिखाई सख्ती 
—तो चार माह में ही "LD" के रूप में 35 लाख का अस्पताल को मिला राजस्व 
—यानी साल में 80-90 लाख रुपए बतौर "LD" होंगे वसूली  
—ऐसे में सवाल ये, पहले दिखाई होती सख्ती तो मरीजों को समय पर मिलती दवा
—अन्यथा दवा आपूर्ति में लेटलतीफी पर 6 सालों में 4 करोड़ से अधिक का आता राजस्व 

आखिर क्या है "LD":
—अस्पताल की लाइफ लाइन के लिए पैनलिस्ट फर्मो को मरीजों की मांग के हिसाब से ऑर्डर दिया जाता है 
—फर्मों को निश्चित समय में आपूर्ति करनी होती है 
—यदि आपूर्ति में देरी होती है तो उस स्थिति में मरीजों को मजबूरी में बाजार से महंगी दर पर दवाएं लेनी पड़ती है 
—मरीजों को इस दिक्कत से बचाने के लिए दवाओं की आपूर्ति में लेटलतीफी पर फर्मों पर जुर्माने का प्रावधान है 
—तय समय से जिनते दिन लेट आपूर्ति होती है, उसी हिसाब से पैनल्टी बढ़ती जाती है। 

अस्पताल प्रशासन की तरफ से सीएमओ भेजी रिपोर्ट में अधीक्षक डॉ डी एस मीणा ने खुद के स्तर पर किए गए लाइफ लाइन के सुधार और जुर्माना लगाने की जानकारी तो दी है, लेकिन ये नहीं बताया गया कि आखिर इतने सालों से जुर्माना नहीं लगने की जांच क्यों नहीं कराई गई. जबकि अगर सूत्रों की माने तो जुर्माना नहीं लगाने के पीछे भी बड़ा खेल नजर आ रहा है. बताया जा रहा है कि पिछले छह सालों में फर्मों ने अस्पताल से मनमाने ऑर्डर लिए और दवा कम्पनियों को गुमराह करते हुए सस्ती दर पर माल की आपूर्ति भी करवा ली. तब मरीजों को दवा उपलब्ध नहीं कराने की स्थिति में जुर्माना नहीं लग रहा था. ऐसे में ये सस्ता माल लाइफ लाइन के बजाय बाजार में बेचने की बात भी चर्चाओं में है. 

पिछले सात सालों में लाइफ लाइन के ये रहे कर्ताधर्ता:
—अस्पताल अधीक्षक : डॉ एलसी शर्मा, वीरेन्द्र सिंह, डॉ मानप्रकाश शर्मा, डॉ डी एस मीणा 
—लाइफ लाइन प्रभारी : डॉ. अरूण चोगले, डॉ. बीएल कुमावत, डॉ. राजेन्द्र मांडिया, डॉ. एसएस रानावत, डॉ. प्रभात सराफ, डॉ. पीडी मीणा 

एसएमएस अस्पताल के अग्निकाण्ड ने पूरे प्रशासन की नींद उड़ा दी है. खुद सूबे के चिकित्सा मंत्री डॉ रघु शर्मा ने हादसे को संदेह के घेरे में लिया है. ऐसे में अब पिछले सात सालों में लाइफ लाइन से जुड़े अधिकारियों के खलबली मची हुई है. सबको ये चिंता सता रही है कि अगर पुरानी फाइलों से धूली हटी, तो कईयों के खेल सामने आ जाएंगे. ऐसे में जिम्मेदारों में से कईयों में अपने रसूखात का उपयोग भी शुरू कर दिया है. अब देखना ये है कि अग्निकाण्ड की ये जांच कितना दूध का दूध और पानी का पानी कर पाती है. 

... संवाददाता विकास शर्मा की रिपोर्ट 

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