रेतीले रेगिस्तान में खजूर उगा असम्भव को किया सम्भव, हो रहा लाखों का उत्पादन

Suryaveer Singh Tanwar Published Date 2019/08/19 10:13

जैसलमेर: खजूर का नाम आते ही सबके मन में स्वादिष्ट और पोष्टिक खजुर की तस्वीर उभरती हैं. लेकिन खेती का जिक्र हो तो सभी मानेंगे कि जैसलमेर के रेतीले रेगिस्तान में खजूर की खेती होना नामुमकिन हैं. लेकिन ऐसा असम्भव काम भी सम्भव कर दिखाया जैसलमेर के लाठी इलाके के लोहटा गाँव में. हरियाणा के प्रेमसिंह ने यहां लोहटा गांव में जमीन ले रखी है‌. उन्होंने अपने खेत में बाजरा, ग्वार या अन्य जैसलमेर की रेतीली धरती पर पैदा होने वाली फसल नहीं बल्कि खजूर की खेती करनी शुरू कर दी हैं. शुरुवाती परेशानियों और असफलताओं को सहन करने के बाद इन्होने अपनी मेहनत के बल पर आज खजूर के सैकड़ो पौधे अपने खेत में विकसित कर दिये हैं.

यहां खजूर का खेत देख कर हर कोई आश्चर्य:  
दरअसल खजूर एक ताड़ प्रजाति का वृक्ष है जिसका जैसलमेर जैसे इलाके में उम्मीद करना असम्भव सा हैं, खजूर की कृषि बड़े पैमाने पर इसके खाद्यफल के लिए की जाती है. चूँकि इसकी खेती बहुत पहले से हो रही है इसलिए इसका सटीक मूल स्थान तलाशना लगभग असंभव है, लेकिन जलवायु के अनुसार इसकी अनुकूलता को देखते हुये कहा जा सकता है कि इसकी खेती कम से कम जैसलमेर जैसे क्षेत्र में नहीं की जा सकती. जैसलमेर में इस इलाके में आकर हर कोई यह खजूर का खेत देख कर आश्चर्य कर सकता हैं लेकिन जब इसको चख कर देखेंगे तो सभी भरोसा कर सकते हैं कि जैसलमेर में भी इसकी खेती हो रही हैं.

80 बीघा में लगाये खजूर के पंद्रह सौ पौधे: 
कृषि विभाग की बागवानी मिशन योजना के तहत यहाँ शुरुवाती दौर में खजूर के पंद्रह सौ पौधे 80 बीघा में लगाये गये थे. यहाँ छः साल पहले इजारियल की बरही,खल्लासखुनेजीकिस्म के किस्म खजूर के पौधे लगाये गये थे. इन पौधौं के रोपण के मात्र तीन सालों बाद में इन पौधों ने खजूर की फसल देना शुरु कर दिया हैं. जबकि आम तौर पर चार साल के बाद खजूर के पौधौं से उत्पादन शुरु होता हैं. प्रगतिशील कृषक प्रेमसिंह व भंवर सिंह के अनुसार बूंद बूंद सिंचाई पद्धति से उन्होंने इस खेत को तैयार किया हैं और सभी पौधों को रोजाना 20 लीटर पानी की ही आवश्यकता होती हैं. कृषि फॉर्म के संचालक प्रेमसिंह के अनुसार इस बार की बम्पर फसल के बाद अपने फैसले पर खुश हैं. 

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