चालक-परिचालकों की कमी से हिचकोले खा रही दौसा आगार की गाड़ी

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/01/21 09:36

दौसा। किसी भी गाड़ी को चलाने के लिए सारथी की जरूरत होती है, और जब भला सारथी ही न हो तो गाड़ी चलेगी कैसे। दौसा आगार का हाल भी इन दिनों ऐसा ही बना हैं। यहां जितनी रोडवेज बसें हैं, उनके अनुपात से चालक व परिचालक नहीं होने से हालात ये है कि अपने आपात कार्यों के लिए भी अवकाश नहीं मिल रहा है। हालात ये है कि कर्मचारी बगावत पर आमादा है।

वैसे तो सरकारी गाड़ियां कैसे चलती हैं, इससे हर कोई वाकिफ है, लेकिन जब गाड़ी चलने के बजाय हिचकोले खाने लगे तो बात सिर के ऊपर से होकर गुजरने लगती है। दौसा रोजवेज आगार की गाड़ी भी इन दिनों हिचकोले खा रही है। कारण ये है कि गाड़ी तो हैं, पर उन्हें संचालन करने वालों का टोटा है। टोटा भी ऐसा कि कई बार चालक व परिचालक गाड़ियों को छोड़कर चलते बनते हैं और सवारियां रह जाती है ताकते हुए। 

दरअसल, ये मर्ज इतना गहरा है कि अफसर इसका इलाज नहीं कर पा रहे हैं। एटक के जिलाध्यक्ष का आरोप है कि मिसमैनेजमैंट के चलते रोडवेज कर्मचारियों का शोषण हो रहा है। हालत ये है कि साप्ताहित अवकाश तो दूर, चालक व परिचालकों को अपने निजी व जरूरी कार्य के लिए भी अवकाश नहीं दिया जा रहा है। इस मामले को लेकर दौसा डीपो के मुख्य प्रबंधक से लेकर रोडवेज महकमे के बड़े से बड़े अफसरों को शिकायतें और लिखित प्रपत्र भेजे गये, लेकिन परिणाम ढाक के तीन पात रहे।

मुख्य प्रबंधक की मानें तो कारब 60 शेड्यूल दौसा डिपो से संचालित होती हैं। इनके लिए 135 चालक व 133 परिचालक चाहिए, लेकिन सच्चाई ये है कि इन शेड्यूल के बदले करीब 35 चालक व 33 परिचालकों की कमी है, जिससे ये सच है कि चालक व परिचालकों को उनके अधिकार के अवकाश नहीं दिए जा सकते। ऊपर से अफसरों ने टारगेट किलोमीटर भी आवंटित किए हैं, जिन्हें पूरा कर पाना भी चुनौती हो जाती है।

गौरतलब है कि दौसा रोडवेज आगार को लेकर कहीं न कहीं विवाद गहराता रहता है। चाहे डीपो के शेड्यूल बंद करने का मामला हो या फिर अब कर्मचारियों को अवकाश तक नहीं मिलने का मामला। इस डीपो के हालात कुछ ऐसे हैं कि रोडवेज बसों को चलाना ही नहीं, खुद आगार की गाड़ी भी कई सालों से चलने में लड़खड़ा रही है। लेकिन अफसर हैं कि कुछ जानते ही नहीं। अब सवाल ये है कि गाडी चले तो आखिर चले कैसे।

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