राजस्थान का रण : टोंक की मालपुरा सीट पर यूं बिछी है चुनावी बिसात

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/09/19 03:15

जयपुर (योगेश शर्मा/कार्तिक बलवान)। टोंक जिलें की विधानसभा सीट मालपुरा को राजस्थान में दामोदर व्यास राजनीतिक मानचित्र पर लेकर आए। लम्बे समय तक व्यास परिवार का मालपुरा की सीट पर दबदबा रहा है। परिसीमन के बाद बदले सियासी वातावरण में व्यास परिवार के दबदबे को चोट पहुंची और इस सीट पर जाट राजनीति हावी होती गई। प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष डॉ. चन्द्रभान भी मालपुरा सीट से विधायक रह चुके हैं। देश की आजादी के बाद राजस्थान में हुए पहले चुनाव में इस सीट पर दामोदर व्यास ने चुनाव लड़ा और 1951 में व्यास ने चुनाव जीता, जिसके बाद 1957 में दामोदर व्यास दोबारा से निर्विरोध विधायक चुने गए। मालपुरा सीट से निर्विरोध चुनाव जीतने का यह पहला और आखिरी मौका था, लेकिन अगले ही चुनाव 1962 में स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार जयसिंह ने दामोदर व्यास को चुनाव हरा दिया। 

1967 के चुनावी समर में दामोदर व्यास दोबारा से जनता की पसंद के विधायक बने। 1972 में यहां दामोदर व्यास के पुत्र सुरेन्द्र व्यास कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। 1977 में जनता पार्टी के नारायण सिंह यहां से विधायक बने। 1980 में जनता पार्टी के टुकड़े होने का फायदा कांग्रेसी उम्मीदवार सुरेन्द्र व्यास को मिला, जिसके चलते वो दूसरी बार विधायक चुन गए। इसी चुनाव में जनता पार्टी को दोनो धड़ों में वोट बटने के कारण जनता पार्टी की हार हुई। 1985 में जनता पार्टी के उम्मीदवार नारायण सिंह भी दोबारा विधायक चुने गए। 1990 में भाजपा के साथ समझौते में जनता दल के प्रत्याशी नारायण सिंह के सामने हरियाणा से राजस्थान आए जीतराम चौधरी ने भी ताल ठोक दी और कांग्रेस के सुरेन्द्र व्यास तीसरी बार मालपुरा सीट से विधानसभा में पहुंचे।

गौरतलब है कि जीतराम चौधरी हरियाणा के देवीलाल परिवार के रिश्तेदार हैं, जिसके चलते आगामी चुनावों में भाजपा ने जीतराम चौधरी को टिकट दिया। 1993 के चुनाव में मालपुरा कस्बे में सरकारी कॉलेज शुरु करने के मुद्दे पर जीतराम ने सीधे चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी सुरेन्द्र व्यास को हरा दिया। बाद में भाजपा विधायक जीतराम ने अपने ही कार्यकाल में सरकारी कॉलेज का उद्घाटन तात्कालिक मुख्यमंत्री भैंरोंसिंह शेखावत के हाथों करवाया था। 1998 में कांग्रेस ने सुरेन्द्र व्यास का टिकट काटकर गुर्जर प्रत्याशी के रूप में सरोज गुर्जर को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन पूर्व विधायक सुरेन्द्र व्यास ने निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़कर जीत हासिल की। भाजपा प्रत्याशी दूसरे और कांग्रेस प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे।

अपने राजनीतिक इतिहास के अनुरूप 2003 में मालपुरा की जनता ने भाजपा के जीतराम चौधरी को विधानसभा की चौखट पर भेज दिया। वहीं पूर्व विधायक सुरेन्द्र व्यास दूसरे स्थान पर कांग्रेस प्रत्याशी रामदेव गुर्जर तीसरे स्थान पर रहे। 2008 के चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी रणवीर पहलवान दोनों ही पार्टियों के प्रत्याशियों पर भारी पड़े, जिसके चलते भाजपा के तात्कालीन विधायक जीतराम चौधरी चौथे स्थान पर पहुंच गए थे। 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कन्हैयालाल चौधरी ने यहां से एकतरफा जीत हासिल की।

वर्तमान सरकार ने राज्य के लगभग सभी मंदिरों के विकास के लिए बड़ी राशि खर्च की है। मालपुरा विधानसभा क्षेत्र में मौजूद इस कल्याणजी का मंदिर सालभर श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केन्द्र बना रहता है। मेले के दिनों में यहां लगभग 5 लाख से अधिक श्रद्धालु मंदिर में नाचते गाते पहुंचते हैं। ऐसे में राज्य सरकार द्वारा यहां कराए गए विकास कार्यों को लेकर भी स्थानीय लोगों में उत्साह है। मालपुरा के गांवों में जाट और गुर्जर जातियों का दबदबा है, वहीं अन्य जातियां भी छितरे हुए रूप में पूरी विधानसभा में फैली हैं। जानते हैं मालपुरा विधानसभा क्षेत्र की चुनावी बिसात में किस जाति के कितने मत हैं। 

जातिगत समीकरण :
जाट -  42 से 45 हजार 
गुर्जर - 28 से 30 हजार
सैनी -  लगभग 18 हजार 
मुस्लिम - अल्पसंख्यक - 17 से 18 हजार
राजपूत - 15 हजार
ब्राह्मण - 15 हजार 
महाजन - 10 हजार
अनुसूचित जाति - जनजाति - लगभग 50 हजार 
अन्य जातियों के भी लगभग 35 हजार मतदाता मौजूद हैं । 

पिछले विधानसभा चुनावों में दोनो ही पार्टियों ने नए चेहरों को चुनाव मैदान में उतारा। भाजपा ने जहां युवा नेता कन्हैयालाल चौधरी पर दांव खेला, वहीं कांग्रेस ने रामबिलास चौधरी को चुनाव मैदान में उतारा। लेकिन मालपुरा की राजनीतिक विरासत संभाले हुए सुरेन्द्र व्यास ने मालपुरा सीट से 9वीं बार चुनाव मैदान में ताल ठोकी, जिसके चलते कांग्रेस के वोट दो भागों में बंट गए और भाजपा प्रत्याशी को एक तरफा जीत मिली।

पिछले चुनावों में बूथ मैनेजमेंट का चुनावी गणित :
— पिछले चुनावों में यहां से लगभग 256 बूथों पर हुए मतदान में 190 बूथों पर भाजपा उम्मीदवार को सर्वाधिक मत मिले।
— वहीं कांग्रेस उम्मीदवार को 34 बूथों पर बाकि प्रत्याशियों से अधिक मत मिले।
— निर्दलीय उम्मीदवार पूर्व विधायक सुरेन्द्र व्यास को केवल 28 बूथों पर ही अन्य प्रत्य़ाशियों पर प्रत्यक्ष बढत मिल सकी। 

अगर बूथवार मिले मतों पर चर्चा करें तो भाजपा को 5 बूथों पर 50 से कम मत मिले, वहीं 1 बूथ पर भाजपा को 10 से भी कम वोट मिल सके। कांग्रेस प्रत्याशी को 38 बूथों पर 50 से कम और 5 बूथों पर 10 से भी कम वोट मिल सके। वर्तमान विधायक कन्हैयालाल चौधरी के अनुसार इस सरकार के कार्यकाल में लगभग 1000 करोड़ से अधिक के विकास कार्य उनकी विधानसभा में कराए गए हैं। वहीं कांग्रेसी नेताओं ने आरोप में केवल भाजपा विधायक पर चुनावी घोषणाओं को पूरा नहीं करने की बात कही। वहीं ग्रामीणों में किसानों के माफ किए गए ऋण योजना की खासी चर्चा है, लेकिन इस क्षेत्र के अधिकतर किसानों में योजनाओं को लेकर समूचा प्रचार-प्रसार नहीं दिखा।

वहीं बात अगर भाजपा के संभावित चेहरों की करें तो वर्तमान विधायक कन्हैयालाल चौधरी और पूर्व विधायक जीतराम चौधरी के नाम प्रमुख हैं। वहीं कांग्रेस के दावेदारों में पूर्व पीसीसी चीफ डॉ. चन्द्रभान, पूर्व प्रत्याशी रामबिलास चौधरी, पूर्व विधायक सुरेन्द्र व्या, पूर्व प्रत्याशी रामदेव गुर्जर के पुत्र गोपाल गुर्जर, रामफूल गुर्जर, भूपसिंह पूनिया और सतवीर चौधरी के नाम सामने आ रहे हैं। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के बीच हर बार की तरह इस बार भी स्थानीय व्यक्ति को टिकट देने की मांग सामने आई है। वहीं चुनावी माहौल पर भाजपा विधायक ने दावा किया कि बीते 5 साल में कांग्रेसी नेता इस पूरे विधानसभा क्षेत्र में नहीं पहुंचे हैं, अब चुनाव सामने आने पर कांग्रेसी बाहर आए हैं। 

पूर्व निर्दलीय विधायक रणवीर पहलवान ने अभी पत्ते नहीं खोले कि वे किस पार्टी की ओर से चुनाव मैदान में उतरेंगे। रणवीर पहलवान को लेकर क्षेत्र में चल रही चर्चा के साथ ही विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय का मुद्दा भी जोर पकड़ता जा रहा है। ऐसे में स्थानीय उम्मीदवार को प्राथमिकता देना कांग्रेस को मजबूत स्थिति में पहुंचा सकता है। वहीं भाजपा के पास कन्हैयालाल चौधरी के रूप में एक लोकप्रिय चेहरा भले ही मौजूद हो, लेकिन वर्तमान विधायक के सामने एंटीइंन्कंबेंसी भी एक बड़ा खतरा है।

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