VIDEO चुनावी यात्रा : राजस्थान के रण में क्या है मसूदा के मतदाताओं का रुझान

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/10/02 03:21

मसूदा (अजमेर)। फर्स्ट इंडिया की चुनावी यात्रा में आज बात करते हैं अजमेर जिले के मसूदा विधानसभा क्षेत्र की। इस विधानसभा क्षेत्र में मसूदा, भिनाय और विजयनगर उपखंड मौजूद हैं। राजनीतिक रूप से मसूदा का चुनाव एक कठिन चुनाव माना जाता है। इस क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास में कई तरह की उठापटक देखने को मिली है। सबसे पहले देखते हैं इस सीट पर बीते चार विधानसभा चुनावों के नतीजे क्या रहे हैं। 

- 1998 के विधानसभा चुनावों में इस सीट पर कांग्रस के कयूम खान ने भाजपा के प्रहलाद शर्मा को नजदीकी मुकाबले में चुनाव हराया।

- 2003 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के टिकट पर विष्णु मोदी ने चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इस चुनाव में कांग्रेस के तत्कालीन विधायक कय्यूम खां चुनाव हार गए।

- 2008 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने मुस्लिम प्रत्याशी के स्थान डेयरी चैयरमैन रामचंद्र चौधरी को चुनाव मैदान में उतारा, वहीं भाजपा ने विष्णु शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा। इससे कांग्रेस के नेता ब्रह्मदेव कुमावत ने निर्दलीय चुनाव मैदान में ताल ठोक दी और जीत हासिल की। कहा जाता है कि ब्रह्मदेव कुमावत को कांग्रेस के एक बड़े नेता ने चुनाव मैदान में उतरने के लिए तैयार किया था।

- 2013 के विधानसभा चुनावों में भी यहां रोचक मुकाबला हुआ। भाजपा की सुशील कंवर पलाड़ा के हाथ बाजी लगी, वहीं कांग्रेस के ब्रह्मदेव कुमावत दूसरे स्थान पर रहे। 2008 में कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी रहे रामचन्द्र चौधरी और नवीन शर्मा ने भी चुनाव मैदान में ताल ठोक दी।

इसके साथ ही 2013 के विधानसभा चुनाव में यूथ कांग्रेस से जुड़े वाजिद खान चीता ने भी निर्दलीय चुनाव मैदान में ताल ठोक दी। राजनीतिक मुकदमेबाजी के चलते 30 साल के इस युवक ने जेल से अपना पहला चुनाव लड़ा और 12 फीसदी से अधिक वोट अपने नाम किए। वाजिद खान ने बीते लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के समर्थन में जबरदस्त खेमाबंदी की और अपने क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी रघु शर्मा को बढ़त दिलवाई।

काठात मुस्लिम, गुर्जर और एससी बहुल इस क्षेत्र में राजपूत और जाट अन्य प्रमुख जातिया हैं, जिसके चलते यहां का स्थानीय वोटर सरकार के कामकाज का हिसाब भी जाति के आधार पर ही करता है। बीते विधानसभा चुनावों में यहां के बागियों ने दोनों ही पार्टियों के वोटों को बांट दिया था। तथाकथित रूप से सचिन पायलट की नाराजगी के चलते कांग्रेस के अजमेर डेयरी के तत्कालीन अध्यक्ष रामचन्द्र चौधरी को कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया और उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी ब्रह्मदेव कुमावत के खिलाफ चुनाव लड़ा।

वहीं भंवर सिंह पलाड़ा अजमेर में भाजपा के कद्दावर और बेबाक नेता माने जाते रहे हैं, लेकिन पु्ष्कर से दो चुनाव हारने के बाद भाजपा ने उनकी पत्नी सुशील कंवर को इस सीट पर चुनाव लड़ने भेजा, जिसके चलते भाजपा के तत्कालीन देहात जिलाध्यक्ष नवीन शर्मा ने सुशील कंवर के खिलाफ चुनाव मैदान में ताल ठोक दी। इस मुकाबले को रोचक बनाया था चीता समाज के जेल में बंद युवा नेता वाजिद खान नें। ऐसे में कांग्रेस को मिलने वाले चीता समुदाय के वोट भी खिसक गए और युवा गुर्जर नेता गोविंद भड़क ने भी बसपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतर कर गुर्जर वोटों को बांट दिया। ऐसे में सीट पर दो नेताओं के मुकाबले 6 प्रमुख प्रत्याशियों के बीच मुकाबला देखने को मिला।

मतदाताओं की जातीय गणना के आधार पर अगर देखें तो यहां से चीता काठात-एससी-गुर्जर जातियों का कांग्रेस के पक्ष में, वहीं राजपूत, रावत, जाट और ब्राह्मण जाति के वोटर का भाजपा की ओर झुकाव नजर आता है। ऐसे में दोनों ही पार्टियों को प्रत्याशी चयन में जातियों का समीकरण भी बैठाना पड़ेगा।

बीते विधानसभा से इस क्षेत्र में पहुंची विधायक सुशील कंवर पलाड़ा के पति भंवर सिंह पलाड़ा ने बीते 5 साल से यहां के वोटर में अच्छी खासी पैठ बनाई है, जिसके चलते यहां से भाजपा की ओर से उनका टिकट लगभग तय ही माना जा रहा है। वहीं कांग्रेस के सामने प्रत्याशी चयन को लेकर दुविधा की स्थिति नजर आ सकती है। अब आगामी विधानसभा चुनावों में इस सीट पर जातिगत समीकरण को साधने में अगर कांग्रेस कामयाब होती है तो कांटे का मुकाबला हो सकता है। वहीं निर्दलीय प्रत्याशी भी इस चुनावी दाल में तड़का लगाकर चुनाव को और भी रोचक बना सकते हैं।

मसूदा का जातीय समीकरण :
— चीता काठात : लगभग 30 हजार
— अन्य मुस्लिम : लगभग 8 हजार 
— गुर्जर  : लगभग 24 हजार
— राजपूत : लगभग 14 हजार
— रावत : लगभग 12 हजार
— एससी : लगभग 28 हजार
— जाट : लगभग 22 हजार
— ब्राह्मण : लगभग 15 हजार

कौन हैं टिकट के दावेदार :
भाजपा :
सुशील कंवर पलाड़ा, नवीन शर्मा
कांग्रेस : ब्रह्मदेव कुमावत, वाजिद खान चीता, संग्राम सिंह, सचिन सांखला

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