रूप चतुर्दशी पर विदेशी बालाओं ने भी किया भारतीय परंपराओं का निर्वहन

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/11/06 11:41

पुष्कर (अजमेर)। आदि-अनादि काल से भारतीय संस्कृति में रूप चतुर्दशी का खास महत्व माना जाता रहा है। दीपावली से एक दिन पहले आने वाली रूप चतुर्दशी के इस खास पर्व को नरक चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। महिलाएं रूप चतुर्दशी पर्व पर खास तौर से अपने रूप को निखारने के जतन करती हैं, वहीं पुरूष भी दिवाली की तैयारियों को पूरा करने में जुट जाते हैं। साथ ही साथ अपने घरों एवं प्रतिष्ठानों को भी रोशन करने के साथ ही सजावट भी करते हैं।

धार्मिक नगरी पुष्कर में भी महिलाओं को सजते-संवरते देखकर सात समंदर पार से आई विदेशी बालाएं भी अपने आपको रोक नहीं सकी और उन्होंने भी भारतीय संस्कृति में रूप चतुर्दशी का महत्व समझकर अपने आपको सजाने-संवारने के लिए ब्यूटी पार्लर का रूख किया। यहां पर न केवल इन विदेशी—महिलाओं ने श्रंगार करवाया, बल्कि भारतीय परिधान को धारण करते हुए सोलह श्रंगार भी किये।

पर्यटकों के अनुसार, उन्हें भारतीय संस्कृति से बेहद लगाव है। भारतीय सिनेमा ने उन्हें हिंदी सीखने के लिए उत्साहित किया। भारतीय ग्रंथों ग्रंथों के अनुसार चतुर्दशी के दिन  नरकासुर राक्षस के चगुल में बंदी बनाई गई 17 हजार रानियों को भगवान कृष्ण ने मुक्त कराया था। तब इन रानियों ने चंगुल से मुक्त होने के बाद जड़ी बूटियों से स्नान कर श्रृंगार किया था। तब से आज तक भारतीय महिलाएं इस दिन को रूप चतुर्दशी के रूप में मानती हैं और अपने आपको सजाती और संवारती हैं।

पुष्कर में विदेशी महिलाओं ने सजने-संवरने के बाद अपने इस अनुभव बारे में बताया कि  यहां आने पर रूप चतुर्दशी के बारे में जानकारी मिली थी। हमने भी भारतीय धार्मिक रीति रिवाजों के अनुसार श्रृंगार किया है, हमें ये सब करके बहुत अच्छा लगा। सचमुच इस तरह के कार्यक्रमों में भारतीय परंपराओं की झलक दिखती है।

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