VIDEO: एक भूला हुआ वीर योद्धा राव चंद्रसेन, जिसने 19 सालों तक मुगल सेना से लिया लोहा

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/06/13 06:33

जयपुर: राजस्थान की धरती के मेवाड़ के महाराणा प्रताप को देश का बच्चा बच्चा जानता है, लेकिन राजस्थान की ही धरती पर मारवाड़ में भी एक वीर योद्धा हुए, जिन्हें मारवाड़ का महाराणा प्रताप कहा जाता है. महाराणा प्रताप की वीरता की चर्चाएं हर तरफ है, लेकिन मारवाड़ के इन वीर योद्धा को महज इतिहासकार या फिर इतिहास में रुचि रखने वालों के अलावा शायद ही कोई जानता हो. आखिर कौन है ये महान योद्धा और क्या है इनका इतिहास... पेश है एक खास रिपोर्ट:

पिता की हार का बदला लेना चाहता था अकबर:
जिस वक्त अकबर के पिता हुमायूं पश्चिमी राजस्थान में फतह के लिए आए तो राजा मालदेव देव ने उनसे लड़ाई लड़ी और उन्हें खदेड़ दिया. उस वक्त हुमायूं सीधे सिंध होते हुए उमरकोट पहुंचा और उसी उमरकोट में उस दौरान उनकी पत्नी उनके साथ थी और अकबर गर्भ में. अकबर का जन्म भी उमरकोट में ही हुआ. बाद में अकबर देश का शहंशाह बना. कहा जाता है कि अकबर के दिल में इस बात की टीस थी कि मालदेव ने उनके पिता को खदेड़ा था, यही कारण था कि अकबर मारवाड़ यानी जोधपुर को अपने सम्पूर्ण अधीनता में लेना चाहते थे. 

भाइयों ने चंद्र सेन के खिलाफ रची साज़िश: 
मालदेव के छठे नंबर के पुत्र चंद्रसेन सारे भाइयों में सबसे ज्यादा शूरवीर और एक बेहतर योद्धा थे यही कारण था कि मारवाड़ की गद्दी पर चंद्रसेन बैठे. चंद्रसेन के गद्दी पर बैठने की नाराजगी उनके भाइयों में थी और उन्होंने अकबर की शाही सेना के साथ मिलकर चंद्र सेन के खिलाफ साज़िश रची. यही कारण रहा कि अकबर ने चंद्रसेन और उनके भाइयों की फूट का लाभ लेने के लिए नागौर के मुग़ल हाकिम हुसैन कुलीबेग को सेना देकर 1564 में जोधपुर पर आक्रमण कर दिया. चंद्रसेन ने अच्छे से लड़ाई लड़ी, लेकिन उनके भाइयों ने मुगल सेना को जो भेद दिया. उस वजह से लड़ाई लगातार लड़ना संभव नहीं था. ऐसे में चंद्रसेन को जोधपुर का किला खाली करके भाद्राजून चला जाना पड़ा. 

छापामार युद्ध प्रणाली में चंद्रसेन थे निपुण:
जब अकबर अजमेर आया तो जियारत करने के बाद अकबर ने नागौर में चंद्रसेन को संधि के लिए बुलवाया, लेकिन चंद्रसेन ने संधि नहीं की. कारण साफ़ कि  चंद्रसेन अकबर की अधीनता स्वीकार करने के पक्षधर नहीं रहे. चंद्रसेन जानते थे कि अकबर से मुकाबला करना बेहद कठिन है, यही कारण रहा की छापामार युद्ध प्रणाली में चंद्रसेन में महारत हासिल कर ली. चंद्रसेन भाद्राजून रहते हुए अकबर के लिए परेशानी का सबब बना हुआ था. यही कारण था कि अकबर ने भाद्राजूण पर आक्रमण कर दिया, पर राव चन्द्रसेन वहां से सिवाना के लिए निकल गए. सिवाना से ही राव चन्द्रसेन ने मुग़ल क्षेत्रों, अजमेर, जैतारण,जोधपुर आदि पर छापामार हमले शुरू कर दिए.

मुग़ल सेना पर पड़े भारी:
राव चन्द्रसेन ने दुर्ग में रहकर रक्षात्मक युद्ध करने के बजाय पहाड़ों में जाकर छापामार युद्ध प्रणाली अपनाई. खुद पिपलोद के पहाड़ों में चले गए और वहीं से मुग़ल सेना पर आक्रमण करके उनकी रसद सामग्री आदि को लूट लेते. बादशाह अकबर ने उनके विरुद्ध कई बार बड़ी सेनाएं भेजीं, पर अपनी छापामार युद्ध नीति के बल पर राव चन्द्रसेन अपने थोड़े से सैनिको के दम पर ही मुग़ल सेना पर भारी रहे. 2 वर्ष तक युद्ध होता रहा और राठौड़ों ने ऐसा सामना किया कि  जनवरी 1575 ई0 में आगरा से और सेना भेजनी पडी.

अकबरनामा के भाग 3 में उल्लेख: 
अकबरनामा के भाग 3 में उल्लेख है कि मुगलों को सफलता नहीं मिली जिसके कारण अकबर बड़ा नाराज हुआ. इसके बाद जलाल खान के नेतृत्व में सेना भेजी, परन्तु जलाल खान स्वयं मार डाला गया. चौथी बार अकबर ने शाहबाज खां को भेजा, जिसने 1576 में अंततः सिवाना दुर्ग पर अधिकार कर लिया. 1576 -77 में सिवाना पर मुग़ल सेना के आधिपत्य के बाद राव चन्द्रसेन मेवाड़, सिरोही, डूंगरपुर और बांसवाड़ा आदि स्थानों पर भी रहे, लेकिन मुग़ल सेना से उनकी लड़ाई लगातार चल रही थी.

पहाड़ों में ताजिंदगी स्वाधीनता के लिए संघर्ष:
सन् 1579ई0 में चंद्रसेन ने अजमेर के पहाड़ों से निकल कर सोजत के पास से मुगलों को खदेड़ दिया और स्वयं सारण पर्वत क्षेत्र में जाकर रहे. 1541 में इस योद्धा का जन्म हुआ और महज 40 वर्ष तक की छोटी, लेकिन स्वाभिमान आन बान और शान की साथ स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने वाला यह योद्धा उसी क्षेत्र में सचियाव गांव में 1581 में दुनिया को अलविदा कह गया. छपनो के पहाड़ों में ताजिंदगी स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने वाला यह योद्धा 40 साल में दुनिया को विदा कह गया. अंत तक अकबर की सेना से लड़ता रहा और अकबर के लिए लगातार चुनौती बना रहा, लेकिन अधीनता स्वीकार नहीं की.

योद्धा से जुड़ी कहानियां राजस्थान के इतिहास के अलावा अन्य इतिहास के लेख अकबरनामा और अन्य पुस्तको में मिल जाती है। प्रमाण है कि मुग़ल सेना ने डिंगल काव्य में चंद्रसेन को जो श्रद्धांजलि दी उसमे लिखा कि

"अंडगिया तुरी ऊजला असमर
चाकर रहन न दिगीया चीत
 सारै हिन्दुस्थान तना सिर
पातळ नै चंद्रसेन प्रवीत"

इतिहास में ऐसे दो वीर हुए हैं, जिन्होंने आजीवन संघर्ष का रास्ता चुना और लड़ाईया ही लड़ते रहे, लेकिन अकबर के आगे अधीनता स्वीकार नहीं की महाराणा प्रताप को तो आप जानते ही हैं और दूसरे थे यह महा प्रतापी चंद्र सैन.

... संवाददाता ऐश्वर्य प्रधान की रिपोर्ट 


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