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बृजभूमि में लोकप्रिय गोवर्धन गिरधारी, इस दिन होगी पूजा

बृजभूमि में लोकप्रिय गोवर्धन गिरधारी, इस दिन होगी पूजा

जयपुर। कृष्ण, मनमोहक छवि वाला सबको अपनी ओर आकृषित करने वाले श्याम बृजवासियों के बड़े ही दुलारे हैं। वैसे तो राधे-कृष्ण को क्या देश और क्या विदेश उसके नाम की मस्ती में तो सब झूम उठते हैं। लेकिन आज हम कृष्ण की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि दीपो का त्यैौहार दीपावली आ गया है। दीपावली को कई जगहों पर दिवाली भी कहा जाता है। लेकिन खासतैौर पर तमिलनाडू में इसे सभी दीपावली के नाम से जानते हैं। सबसे खास बात तमिलनाडू में दीपावली सुबह के करीब 4 बजे से 6 बजे के बची मनाई जाती है जबकि देश के बाकी हिस्सों में शाम के समय दिवाली पूजन होता है। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अन्नकूट-गोवर्धन पूजा की जाती है। 

दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजन किया जाता है। कहते हैं जब कन्हैया धरती पर आए थे तो उन्होंने यादव कुल में वृज में जन्म लिया। यहां के लोग पहले अच्छी वर्षा हो इसके लिए इन्द्र देवता की पूजा करते थे। लेकिन जब कृष्ण इस धरा पर आए तो उन्होंने भगवान गिरिराज की पूजा शुरु करवाई। कृष्ण के कहने पर वृजवासी जब पूजा करने लगे तो उन्हें गोवर्धन में कृष्ण का ही स्वरुप नज़र आने लगा। लोग कृष्ण को भगवान मानने लगे। भगवान कृष्ण ने वृजभूमि पर अपनी लीलाएं की। इसलिए वृजवासी राधे-कृष्ण को सबसे प्रिय मानते हैं।

बतादें कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अन्नकूट-गोवर्धन पूजा की जाती है। दीपावली की तरह इसमें भी दीपोत्सव का विधान है। इस बार गोवर्धन पूजा दिवाली के दूसरे दिन यानि 8 नवंबर को होगी। कहते हैं गुजरात, महाराष्ट्र राज्यों में इसी दिन से नव वर्ष की शुरूआत होती है। यह वैष्णवों का मुख्य पर्व है और इसका आयोजन कृष्ण मन्दिरों एंव विष्णु मन्दिरों और आस्तकि गृहस्थों के घर में किया जाता है। यह पर्व वृज भूमि में अधिक लोकप्रिय है। इस पर्व को दो भागों में विभक्त किया गया है।इस दिन घर के आंगन में गोबर से गोवर्धन का चित्र बनाकर उसकी पूजा रोली, चावल, खीर, बताशे, चावल, जल, दूध, पान, केसर, पुष्प आदि से दीपक जलाने के बाद की जाती है। गायों को स्नानादि कराकर उन्हें सुसज्जित कर उनकी पूजा करनी चाहिए । गायों को मिष्ठान खिलाकर उनकी आरती कर परिक्रमा भी करनी चाहिए।

इस त्यैौहार को अन्नकुट के नाम से भी जाना जाता है अन्नकूट शब्द का अर्थ होता है अन्न का समूह। विभिन्न प्रकार के अन्न को समर्पित और वितरित करने के कारण ही इस उत्सव या पर्व का नाम अन्नकूट पड़ा है। इस दिन अन्नकूट के रूप में अन्न और शाक-पक्वानों को भगवान को अर्पित किया जाता है। अन्नकूट और गोवर्धन की यह पूजा आज भी कृष्ण और बिष्णु मन्दिरों में बहुत ही उत्साह से की जाती है।

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नई दिल्ली: कोरोना संकट के बीच बाबा बर्फानी की जल्द यात्रा शुरू होने जा रही है, लेकिन इस बार 500 से ज्यादा श्रद्धालुओं को पवित्र गुफा में दर्शन करने की अनुमति नहीं ​दी जाएगी. प्रशासन ने बुधवार को यह जानकारी दी. बाबा बर्फानी की यात्रा 21 जुलाई से शुरू हो सकती है.जम्मू-कश्मीर में स्थित अमरनाथ गुफा मंदिर और वैष्णोदेवी मंदिर में श्रद्धालुओं को दर्शन देने की अनुमति के संबंध में एक उच्चस्तरीय बैठक में चर्चा की गई. 

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अमरनाथ यात्रा को लेकर चर्चा:
बैठक में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह और गृह मंत्रालय तथा जम्मू-कश्मीर प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया. एक अधिकारी ने बताया कि पहलगाम मार्ग हिमाच्छादित होने के कारण से अभी तक साफ नहीं है और इस वर्ष केवल बालटाल मार्ग से यात्रा हो सकती है. 

अगले सप्ताह हो सकता है निर्णय:
अधिकारी ने कहा कि अमरनाथ यात्रा को लेकर अंतिम निर्णय अगले सप्ताह लिया जा सकता है. उन्होंने कहा कि वैष्णोदेवी मंदिर के मामले में मंदिर तक तीर्थयात्रियों के जाने पर 31 जुलाई तक रोक लगा दी गई है. 

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सावन का पहला सोमवार आज, शिवालयों में गूंज रहे हर-हर महादेव के जयकारे

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जैसलमेर: आज से भगवान भोलेनाथ की भक्ति का पर्व सावन मास आज से शुरू हो गया है, लेकिन इस वर्ष कोरोना संकट के बीच भक्त अपने भगवान के दर्शन करने में काफी परेशान हो रहे हैं. इस बार कोरोना संक्रमण की वजह से प्रमुख मंदिर बंद है. कुछ मंदिरों में पुजारी और सीमित संख्या में भक्त भगवान शिव का अभिषेक कर रहे हैं. शहर के मोहल्लों में कुछ मंदिर खुले है जिसमे थोड़ी थोड़ी मात्रा  लोग पहुंच रहे हैं. बारी-बारी से श्रद्धालु दर्शन कर रहे हैं.

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ऊं नम: शिवाय के मंत्रोच्चार से शिवालय गूंज रहे: 
जैसलमेर शिव मार्ग स्थित देवचंद्रेश्वर मंदिर में हर सावन भव्य मेला भरता है लेकिन मंदिर इस बार सूना दिखाई दे रहा है. आस-पास के लोग भगवान शिव के दर्शन करने पहुंच रहे हैं. बील पत्र से पूजन करने व शिवलिंग को दुग्ध से नहलाने के लिए मंदिर पहुंच रहे हैं. साथ ही बोल बम ऊं नम: शिवाय के मंत्रोच्चार से शिवालय गूंज रहे हैं. जैसलमेर सहित आसपास के सभी शिवालयों में शिव पूजन चल रहा है. लेकिन कई आमजन जागरूक होकर दर्शन कर रहे हैं. मंदिरो में थोड़ी भीड़ है वहीं कई मंदिर के बंद होने से भक्त मायूस होकर लोट रहे हैं. 

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जयपुर: आज से भगवान शिव का प्रिय सावन मास शुरू हो गया है. हिंदू धर्म में सावन के महीने का खास महत्व माना जाता है. इस पूरे महीने में भगवान शिव की पूजा होती है. इस दौरान भगवान शिव की पूजा करके मनचाहा फल प्राप्त किया जा सकता है. इस मास भगवान शिव और पार्वती जी का मांगलिक मिलन हुआ. भोले नाथ का विवाह भी लोकमंगलकारी है. इसलिये सामाजिक सरोकार से भी विवाह को यही दर्ज़ा मिला है. परिवार चलता रहे. वंश परंपरा आगे बढ़ती रहे. भगवान का विवाह भी संकटकाल में हुआ. 

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सावन माह के पहले और आखिरी दिन सोमवार: 
इस बार सावन माह के पहले और आखिरी दिन सोमवार है. इसके साथ ही पांच सोमवार के साथ जबरदस्त संयोग भी बना है. लेकिन कोरोना काल के चलते इस बार शिवभक्त मंदिरों में जाकर भोले बाबा की पूजा नहीं कर पाएंगे. ऐसे में हम आपको घर पर रहकर ही शिव आराधना करने के बारे में बता रहे हैं....

- इस महीने सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहने. 

- पूजा स्थल पर अच्छी तरह से साफ-सफाई करके गंगाजल का छिड़काव करें.

- शिव पुराण पढ़े. संधिकाल अवश्य पढ़ें.

- शिव गायत्री की एक माला करें अन्यथा 3, 5, 7, 11, 13, 21 या 33 बार पढ़ें.

- संभव हो तो तीन बार रुद्राष्टक पढ़ ले. अथवा ॐ नमः शिवाय के मन्त्र से अंगन्यास करें. 

- भगवान शिव को 11 लोटे जल अर्पण करें. प्रयास करें कि यह पूरे सावन मास हो जाये. काले तिल,और दूध के साथ.

- यदि विल्व पत्र नहीं मिले तो एक जनेऊ अथवा तीन या पांच कमलगट्टे अर्पित कर दें.

- आसपास के शिवमंदिर में जल व दूध का अभिषेक कर चंदन का तिलक करें.

- शिव कथा व शिव चालीसा का पाठ कर, महादेव की आरती करें. 

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BHARATPUR: कोरोना की वजह से गुरु पूर्णिमा का पर्व रहा फीका, नहीं हुए मंदिरों में धार्मिक आयोजन, मुड़िया पूनो मेला भी रद्द

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भरतपुर: कोरोना के खौफ ने परंपरागत पर्व गुरु पूर्णिमा का रंग पूरी तरह से फीका कर दिया है और हालात यह हो गए है कि आज जहां विभिन्न मंदिरों में धार्मिक आयोजन होने थे वहां सन्नाटा पसरा हुआ नजर आ रहा है. भरतपुर के पड़ोसी उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के गोवर्धन में आयोजित होने वाला मुड़िया पूनो मेला भी रद्द कर दिया गया है और आज तक के इतिहास मैं ऐसा पहली बार हो रहा है कि गुरु पूर्णिमा पर लगाई जाने वाली 7 कोस परिक्रमा मार्ग आज वीरान नजर आ रहा है.

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पूंछरी के लौठा गांव में छाई वीरानी:
गुरु पूर्णिमा के मौके पर गोवर्धन की परिक्रमा देने के लिए देश के दूरदराज इलाकों से करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते थे, लेकिन कोरोना के खौफ के चलते परिक्रमा को स्थगित करना पड़ा है. गोवर्धन महाराज की परिक्रमा का लगभग डेढ़ किलोमीटर का हिस्सा राजस्थान में भी आता है और डीग तहसील के पूंछरी का लौठा गांव में भी आज वीरानी छाई हुई है.

विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम हुए रद्द:
श्रद्धालु गोवर्धन परिक्रमा देने तक नहीं पहुंचे इसके लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं और जगह-जगह पुलिस बैरिकेड लगाकर श्रद्धालुओं को वापस भेज रही है. गुरु पूर्णिमा के मौके पर पूरा ब्रज मंडल गिर्राज महाराज की जयकरों से गुंजायमान रहता था लेकिन कोरोना ने अन्य त्योहारों की तरह गुरु पूर्णिमा पर्व का भी मजा किरकिरा कर दिया है. भरतपुर शहर में गुरु पूर्णिमा के मौके पर नगर परिक्रमा का हर साल आयोजन होता था लेकिन आज नगर परिक्रमा भी रद्द कर दी गई है. भरतपुर शहर की सर्कुलर रोड पर जहां हजारों लोगों की भीड़ और सैकड़ों की संख्या में भंडारे आयोजित होते थे वह भी कही नजर नहीं आ रहे हैं.

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जयपुर: देशभर में आज गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है. शिष्य अपने गुरुओं की पूजा अर्चना करके श्रद्धा प्रकट कर रहे है. लेकिन कोरोना संकट की वजह से देशभर में गुरु पूर्णिमा पर कोई बडा आयोजन नहीं होगा. गुरुओं के आश्रम में भी बडे आयोजन पर रोक है. आपको बता दें कि गुरु पूर्णिमा का पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. इस दिन गुरु पूजा का विधान है. गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के शुरू में आती है. 

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इस दिन हुआ था महर्षि वेदव्यास का जन्म:
इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं. ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं. न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी. इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं. जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है. इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म भी हुआ था, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं. इस दिन से ऋतु परिवर्तन भी होता है. इस दिन शिष्य द्वारा गुरु की उपासना का विशेष महत्व भी है.

ऐसे करें गुरु की पूजा...

-सबसे पहले आप गुरु को उच्च आसन पर बैठाये.

-इसके बाद आप गुरु के चरण साफ जल से धुलाएं और फिर चरण को साफ करें. 

-फिर आप गुरुजी के चरणों में पीले या सफेद पुष्प अर्पित कीजिए. 

- इसके बाद गुरुजी को श्वेत या पीले वस्त्र देने चाहिए. 

- यथाशक्ति फल, मिष्ठान्न दक्षिणा अर्पित कीजिए. 

- आप गुरु से अपना दायित्व स्वीकार करने की प्रार्थना कीजिए.

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मानसून की सटीक भविष्यवाणी के लिए आज जंतर-मंतर पर होगा वायु परीक्षण

मानसून की सटीक भविष्यवाणी के लिए आज जंतर-मंतर पर होगा वायु परीक्षण

जयपुर: मानसून की सटीक भविष्यवाणी के लिए आज जंतर मंतर वेधशाला पर वायु परीक्षण किया जाएगा. आषाढ़ी पूर्णिमा के अवसर पर जंतर मंतर के सम्राट यंत्र पर आज ज्योतिष से और दैवज्ञ जुटेंगे. सूर्यास्त काल में ध्वज पूजन के साथ वायु परीक्षण की प्रक्रिया शुरू होगी. कोरोना महामारी के चलते इस बार महज पांच ज्योतिष वह दैवज्ञ ही वायु परीक्षण की विधिवत प्रक्रिया संपन्न कराएंगे.

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वायु के दाब और दिशा के अनुसार मानसून की भविष्यवाणी:  
दरअसल, वायु धारिणी आषाढ़ी पूर्णिमा पर हर वर्ष जंतर मंतर पर वायु परीक्षण किया जाता है. जिसमें सम्राट यंत्र पर ध्वज पूजन के बाद वायु के दाब और दिशा के अनुसार मानसून की भविष्यवाणी की जाती है. इस वर्ष मौसम विभाग की भविष्यवाणी के अनुसार मानसून अच्छा रहेगा. यदि आज ज्योतिष वायु परीक्षण के बाद मानसून को लेकर सकारात्मक भविष्यवाणी करते हैं तो मौसम विभाग की भविष्यवाणी पर भी मुहर लग जाएगी.

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पितृ पक्ष के समापन के 1 महीने बाद आएगी नवरात्र, 165 साल बाद बना संयोग

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जयपुर: हर साल पितृ पक्ष के समापन के अगले दिन से नवरात्रि का आरंभ हो जाता है जो कि इस साल नहीं होगा. आश्विन मास में मलमास लगना और एक महीने के अंतर पर दुर्गा पूजा आरंभ होना ऐसा संयोग करीब 165 साल बाद लगने जा रहा. इसके चलते नवरात्रि 1 महीने विलंब से शुरू होंगे. 

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इस बार चातुर्मास पांच महीने का: 
लीप वर्ष होने के कारण इस बार चातुर्मास जो हमेशा चार महीने का होता है, इस बार पांच महीने का होगा. चातुर्मास लगने से विवाह, मुंडन, कर्ण छेदन जैसे मांगलिक कार्य नहीं होंगे. इस काल में पूजन पाठ, व्रत उपवास और साधना का विशेष महत्व होता है. इस दौरान देव सो जाते हैं. देवउठनी एकादशी के बाद ही देव जागृत होते हैं.

इस साल 17 सितंबर 2020 को श्राद्ध खत्म होंगे:
इस साल 17 सितंबर 2020 को श्राद्ध खत्म होंगे. इसके अगले दिन अधिकमास शुरू हो जाएगा, जो 16 अक्टूबर तक चलेगा. इसके बाद 17 अक्तूबर को प्रतिपदा तिथि यानि के प्रथम नवरात्र होगा और 25 अक्तूबर को नवमी तिथि तक नवरात्र रहेंगे. जिसके साथ ही चातुर्मास समाप्त होंगे. इसके बाद ही शुभ कार्य जैसे विवाह, मुंडन आदि शुरू होंगे. 

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अंतर हर तीन वर्ष में लगभग एक माह के बराबर: 
एक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, जबकि एक चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है. दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है. ये अंतर हर तीन वर्ष में लगभग एक माह के बराबर हो जाता है. इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है, जिसे अतिरिक्त होने की वजह से अधिकमास का नाम दिया गया है. 


 

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जयपुर: आज देवशयनी एकादशी है. इसी एकादशी के साथ चातुर्मास का महीना भी आरंभ हो जाएगा. हिंदू धर्म की मान्यताओं के मुताबिक इन चार महीनों में सभी तरह के शुभ कार्यों पर विराम लग जाता है. इसे भगवान विष्णु का शयन काल माना जाता है. पुराणों के अनुसार इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं. इस तिथि को पद्मनाभा, विष्णुशयन भी कहा जाता है. हालांकि इस बार चातुर्मास 4 महीने की जगह पांच महीने का है. यानी 1 जुलाई से शुरू होकर यह समय 25 नवंबर तक चलेगा, इसके बाद 26 नवंबर से मांगलिक कार्यों की शुरुआत की जा सकेगी.

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शिव करेंगे संसार का संचालन: 
मान्यता है कि इस अवधि में श्रीहरि, पाताल के राजा बलि के यहां चार मास निवास करते हैं. इस अवधि में भगवान शिव पृथ्वीलोक पर आते हैं और चार मास तक संसार की गतिविधियों का संचालन करते हैं. भगवान शिव गृहस्थ होते हुए भी संन्यासी हैं. अत: उनके राज में विवाह आदि कार्य वर्जित होते हैं. देवशयनी एकादशी का व्रत करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उनके सभी पापों का नाश होता है लेकिन इस दिन और भी कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है. आइए जानते हैं इस दिन कौन से काम नहीं करने चाहिए.

- एकादशी के दिन चावल नहीं खाना चाहिए, इसे खाने से व्यक्ति का मन चंचल होता है और प्रभु भक्ति में मन नहीं लगता है. 

- देवशयन की अविधि में पत्तल पर भोजन करें.

- वाक-सिद्धि प्राप्त करने के लिए इस अवधि में मीठे पदार्थों का त्याग करें.

- आरोग्य की प्राप्ति के लिए इस अवधि में तली हुई वस्तुओं का त्याग करें.

- एकादशी को बिस्तर पर नहीं, जमीन पर सोना चाहिए. मांस और नशीली वस्तुओं का सेवन भूलकर ना करें. स्नान के बाद ही कुछ ग्रहण करें.

- एकादशी के दिन झूठ नहीं बोलें, इससे पाप लगता है. एकादशी के दिन भूलकर भी क्रोध नहीं करें.

- एकादशी के दिन किसी पेड़-पत्ती की फूल-पत्ती तोड़ना वर्जित है.

- एकादशी के दिन पान खाना भी वर्जित माना गया है. 

- संतान की उन्नति के लिए देवशयन की अवधि में दूध एवं दूध से बनी वस्तुओं का त्याग करें.

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