फायदेमंद साबित होती यूनानी पद्धति की कपिंग और लीच थेरेपी

Ravish Tailor Published Date 2017/04/13 16:47

टोंक। आधुनिकता और दौड़भाग के युग मे महंगी होती चिकित्सा व्यवस्थाओं के बीच प्राचीन चिकित्सा पद्धती भी लोगों के रोग मिटाने मे सक्षम है। यह साबित हो रहा टोंक मे संचालित यूनानी चिकित्सालय में, जहां पिछले कुछ सालों से लोगों का यूनानी पद्धती के कपिंग और लीच थैरेपी से उपचार हो रहा है, जिसका असर मरीजों को कुछ ही दिनों मे होने लगता है और इससे उपचार करवाने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।


आमतौर पर कमर दर्द, जौडों का दर्द, स्लिप डिस्क और शरीर मे अन्य जगहों पर होने वाले दर्द को कम करने के लिये लोग पैन किलर लेते हैं और बाद मे दर्द बढ़ने पर महंगा इलाज करवाते हैं, लेकिन टोंक के बग्गीखाना मे पिछले चार सालों यूनानी पद्धती में लोगों का उपचार कर रहे चिकित्सकों द्वारा एक साल पूर्व ही शुरू किये गए हिजामा थैरेपी लोगों के लिये असरकारक साबित हो रही है और जिलेभर से लोग इस थैरेपी के बारे मे सुनकर अपना उपचार करवाने पहुंच रहे हैं।


दरअसल, हिजामा यानी कपिंग थैरेपी को यूनानी भाषा मे इलाज-बित-तदबीर कहते हैं और इसके उपचार के तहत काम आने वाले उपकरणों को रोग के अनुसार शरीर पर दर्द कर रही जगह पर खास किस्म के तेल की मालिश कर प्लास्टिक के उपकरण लगाये जाते हैं, जो दर्द का पूरी तरह से खत्म कर देते हैं। कपिंग थैरेपी का नियमित उपचार ले रहे मरीजों का भी मानना है बिना किसी चीर-फाड़ और पैन किलर लिये ही यह काफी असरदार है। उपचार खत्म होने के बाद दोबारा दर्द का अहसास नहीं होता है।


आपको बता दें कि इस थैरेपी की मदद से कमर, गर्दन, घुटनों और एडी के दर्द के अलावा स्लिप डिस्क, सरवाईकल, स्पोज डिलाईटीस, प्रिजन शौल्डर, टेनिस एल्बो, मांसपैशियों के खिंचाव लिंगोमेंट के फेक्चर, चमडी रोग, सफेद दाद सुर्यासीस के मरीजों को फायदा पहुंचता है। बग्गीखाना मे यूनानी चिकित्सालय के साथ-साथ चलाये जा रहे यूनानी कॉलेज मे प्रशिक्षण ले रहे इंटरशीप स्टूडेंट्स भी कपिंग थैरेपी से खासे प्रभावित हैं और इस थैरेपी के इंचार्ज डां शौक़त अंसारी और अन्य डॉक्टरों की बताई हुई सभी बातों को गौर से सुनते हैं और उपचार के दौरान उनका साथ भी देते हैं।


कपिंग थैरेपी की तरह ही लीच यानी जौंक थैरेपी से उपचार टोंक के यूनानी चिकित्सालय की अहम कडी है, जिससें शरीर मे जमा होने वाले गंदे खून की वजह से होने वाली बिमारियों मे काम मे लिया जाता है। दरअसल, जौंक थैरेपी यूनानी चिकित्सा मे प्राचीनकाल से की जा रही है, हालांकि आधुनिकता के चलते लोग इससे दूर हो गए थे, लेकिन पिछले कुछ सालों में जैसे ही लोगों ने इसकी उपयोगिता जानी, लोग लीच थैरेपी करवाने लगे है।


गौरतलब है कि इस पद्धति मे काम मे ली जाने वाली लीच यानि जौंक मेडिसिनल होती है, जो कि गहरे भूरे रंग से काले रंग की होती है। लाल और भूरे रंग की धारियां इनकी खास पहचान होती है, यह तालाब मे मिलती है, जहां बहुत सारे मेंढक पाये जाते हैं। यह खून चूसने वाला प्राणी है, उपचार के दौरान लगाने पर एक ओर से जहां यह खून चूंसती है और दूसरी ओर चमड़ी पर चिपक जाती है, ताकि खून चूसने से बड़े हुये आकार की वहज से वह गिर ना जाये। क्योेंकि जैसे-जैसे लीच खून चुसती है उसका आकार भी बढ़ता है।

 

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