VIDEO: बेहद रोचक रहा है झुझुनूं में उपचुनावों का इतिहास, 36 सालों बाद मंडावा सीट पर हो रहा चुनाव 

VIDEO: बेहद रोचक रहा है झुझुनूं में उपचुनावों का इतिहास, 36 सालों बाद मंडावा सीट पर हो रहा चुनाव 

VIDEO: बेहद रोचक रहा है झुझुनूं में उपचुनावों का इतिहास, 36 सालों बाद मंडावा सीट पर हो रहा चुनाव 

जयपुर: झुझुनूं में उपचुनावों का इतिहास बेहद रोचक रहा है. पांच उपचुनाव इस जिले में हो चुके है और 4 बार कांग्रेस जीती. मंडावा में दूसरी बार उपचुनाव के लिये मतदान होगा. यह भी रोचक तथ्य है कि मंडावा में जो पहला उपचुनाव हुआ था, वो रीटा चौधरी के पिता रामनारायण चौधरी ने 1983 में लड़ा था. 1980 में लच्छूराम ने जनता पार्टी से चुनाव जीता था, उनके निधन के कारण उपचुनाव हुआ था और कांग्रेस के रामनारायण चौधरी ने उपचुनाव में जीत दर्ज की. 36 सालों बाद ऐसा संयोग बना है कि मंडावा में उपचुनाव हो रहा है और रामनारायण चौधरी की बेटी रीटा चौधरी कांग्रेस के टिकट पर मैदान में है. रामनारायण चौधरी ने 7 बार मंडावा से चुनाव जीता था. एक बार उपचुनाव में उन्होंने विजय दर्ज की. 

डॉ मूलसिंह शेखावत ने बनाया था कीर्तिमान:          
झुंझुनूं जिले में उपचुनाव का राजनीतिक इतिहास बेहद अहम है. उपचुनाव जीतकर नेताओं ने राजस्थान की सियासत में झंडे गाड़े, चाहे शीशराम ओला हो या फिर डॉ जितेन्द्र सिंह. चर्चित तथ्य यह भी है कि शीशराम ओला और उनके पुत्र बृजेन्द्र ओला दोनों ने उपचुनाव लड़े. 1969 में खेतड़ी उपचुनाव में कांग्रेस के शीशराम ओला ने जीत दर्ज की. 1967 में खेतड़ी के विधायक ठाकुर रघुवीर सिंह ने इस्तीफा दे दिया था, कांग्रेस के शीशराम ओला इस उपचुनाव में विजयी हुये. बाद में उपचुनाव के जरिये झुंझुनूं की सियासत में इतिहास लिखा गया जब पहली बार झुंझनूं विधानसभा क्षेत्र में कमल खिला. 1996 में झुंझुनूं विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था, शीशराम ओला के पुत्र बृजेन्द्र ओला ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा. वहीं बीजेपी के टिकट पर डॉ मूलसिंह शेखावत ने चुनाव लड़ा. दिलचस्प बात यह रही कि डॉ मूलसिंह ने कद्दावर ओला परिवार को शिकस्त देकर कीर्तिमान बनाया और पहली बार यहां कमल खिलाया. 1996 का यह चुनाव खासा चर्चित चुनाव था. 

2014 का उपचुनाव भी रहा चर्चित:
इसके बाद सबसे चर्चित उपचुनाव हुआ सूरजगढ़ का. 2014 में सूरजगढ़ में हुये उपचुनाव में बीजेपी ने भरतपुर से लाकर डॉ दिगम्बर सिंह को चुनावी समर में उतारा था, लेकिन बीजेपी उसमें सफल नहीं हो पाई. कांग्रेस के श्रवण कुमार ने डॉ दिगम्बर सिंह को चुनाव हरा दिया. सूरजगढ़ का उपचुनाव तत्कालीन विधायक संतोष अहलावत के सांसद बनने के कारण हुआ था. उस समय बीजेपी की वसुंधरा राजे सरकार थी और डॉ दिगम्बर सिंह को भरतपुर से लाकर यहां चुनाव लड़ाया गया. लेकिन वो चुनाव नहीं जीत पाये. 

झुंझुनूं जिला और उपचुनाव पॉलिटिक्स:
—1969 में खेतड़ी में उपचुनाव हुआ.. 
—इस उपचुनाव में कांग्रेस के शीशराम ओला ने जीत दर्ज की 
—1983 में मंडावा में उपचुनाव हुआ और कांग्रेस के रामनारायण चौधरी चुनाव जीते
—1988में खेतड़ी के उपचुनाव में कांग्रेस के डॉ जितेन्द्र सिंह चुनाव जीते
—1996 के झुंझुनूं उपचुनाव में बीजेपी का खाता खुला और डॉ मूलसिंह शेखावत ने बृजेंद्र ओला को हराकर चुनाव जीता
—पहली बार झुंझुनूं विधानसभा क्षेत्र में डॉ मूलसिंह ने कमल खिलाया
—2014 में सूरजगढ़ विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के श्रवण कुमार ने डॉ दिगम्बर सिंह को चुनाव हराया 

शीशराम ओला के इर्द-गिर्द ही रही जाट राजनीति:
उपचुनाव जीतने के बाद शीशराम ओला देश और प्रदेश की सियासत में कद्दावर नेता कहलाये. आगे चलकर वो राज्य की सरकारों में विभिन्न महकमों के मंत्री रहे. बाद में झुंझुनूं के सांसद बने और केन्द्र की सरकारों में मंत्री बनने का गौरव मिला. जब तक वो जिंदा रहे, झुंझुनूं की जाट राजनीति शीशराम ओला के इर्द-गिर्द ही रही आज वो जिंदा नहीं है, लेकिन उनके पुत्र बृजेन्द्र ओला झुंझुनूं विधानसभा सीट से विधायक है. रामनारायण चौधरी ने 1983 में मंडावा से उपचुनाव जीता और उसके बाद अगले चार चुनाव भी जीते. वे राजस्थान की कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष रहे. इतना ही नहीं राज्य की विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर रहे. रामनारायण चौधरी के शेखावाटी के कद्दावर नेताओं में रहे और कभी भी कांग्रेस का दामन नहीं छोड़ा. उस वक्त भी नहीं, जब शीशराम ओला कांग्रेस में चले गये थे. चौधरी की पहचान थी, झक-सफेद कुर्ता-पायजामा और सिर पर गांधी टोपी. 

उपचुनाव जीतकर ही डॉ जितेन्द्र सिंह बने सियासत में सिरमौर:
खेतड़ी से उपचुनाव जीतकर ही डॉ जितेन्द्र सिंह प्रदेश की सियासत में सिरमौर बने. आगे चलकर गहलोत सरकार में मंत्री बनने का अवसर मिला और कई महकमों को उन्होंने संभाला. कद्दावर गुर्जर नेताओं में उनकी गिनती आज होती है. पेशे से डॉक्टर जितेन्द्र सिंह का मूल जुड़ाव नीम का थाना से है, लेकिन उन्होंने सियासी स्थली बनाया खेतड़ी को. झुंझुंनूं के ही एक उपचुनाव में डॉ मूलसिंह शेखावत ने इतिहास लिखा और पहली बार कमल खिलाकर राज्य की बीजेपी की राजनीति में स्थापित नेता बने. मूलसिंह भी पेशे से चिकित्सक है और सरल स्वभाव के कारण सियासत में उन्होंने अलग पहचान बनाई. घनश्याम तिवाड़ी से दोस्ती उनकी इतनी गहरी रही कि आगे चलकर जब घनश्याम तिवाड़ी ने दीनदयाल वाहिनी बनाई तो डॉ मूलसिंह शेखावत भी उनके साथ बीजेपी छोड़कर उसमें चले गये. हालांकि वे आज तिवाड़ी के साथ कांग्रेस में नहीं है, लेकिन इलाके में उन्हें आज भी इसीलिये जाना जाता है कि उन्होंने उपचुनाव में खांटी राजनीति करने वाले ओला परिवार को पटखनी दी थी. उपचुनावों का इतिहास का रोचक रहा है, लेकिन खास यह भी है कि कांग्रेस के पक्ष में रहा है. मंडावा में अब हो रहे उपचुनाव पर सबकी नजरें टिकी है. यह किसके पक्ष में रहेगा यह चुनावी परिणामों से पता चलेगा. 

... संवाददाता योगेश शर्मा की रिपोर्ट

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