आखिर क्यों है इस्लाम में जुम्मे की नमाज का इतना महत्व?

Nizam Kantaliya Published Date 2019/05/17 03:47

जयपुर: इस्लाम में खुदा को समय पर याद करने और उसकी इबादत करने के समय को काफी अहम माना गया है. इसलिए प्रतिदिन 5 वक्त की नमाज को उन पाच अरकानो में शामिल किया गया है जो प्रत्येक मुसलमान के लिए अनिवार्य है.लेकिन जुम्मे की नमाज को इस्लाम में सबसे खास तवज्जो दी गयी है.

इस्लाम में जुम्मे को अल्लाह की इबादत है खास
इस्लाम धर्म को मानने वाले चाहे खाना भूल जाएं, दिन के जरूरी कार्यों को भूल जाएं, किसी सगे संबंधी से बात करना भूल जाएं लेकिन अल्लाह को याद करना वे कभी नहीं भूलते, खासतौर से शुक्रवार के दिन. इस्लाम धर्म में शुक्रवार को नमाज़ पढ़ना अति आवश्यक माना गया है. इस्लामिक तथ्यों के मुताबिक ऐसा माना जाता है कि शुक्रवार के ही दिन अल्लाह द्वारा ‘आदम’ को बनाया गया था और इसी दिन आदम की मृत्यु भी हुई थी. लेकिन आदम जन्म के बाद धरती पर आए थे, इसलिए दिन के एक घंटे को बेहद अहम माना जाता है.

इस दिन सुनते हैं अल्लाह फरियाद
कहते हैं शुक्रवार को यदि आप अल्लाह से कुछ ना भी मांगो तब भी वे आपके मुराद सुन लेते हैं और उसे पूरा करते हैं. परंतु वह मुराद इस्लामिक कायदे-कनूनों के अनुकूल ही होनी चाहिए. मुरादें पूर्ण करने के साथ इस दिन अल्लाह अपने बच्चों के सभी गुनाह भी माफ करते हैं. इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि स्वयं अल्लाह ने ही शुक्रवार का दिन चुना था। सप्ताह के सभी दिनों की तुलना में उन्होंने ही शुक्रवार के दिन को सर्वश्रेष्ठ माना था.

नमाज के लिए मशहूर जामा मस्जिद
आपने हर शहर में जामा मस्जिद का नाम सुना होगा.जामा मस्जिद वो मस्जिद है जहां शुरू से जुम्मे की नमाज अदा कि जाती रही है.हर जामा मस्जिद का नाम जुम्मा के नाम पर ही रखा गया है.इसलिए अधिकांश शहरो में जामा मस्जिद सबसे पुरानी मस्जिदो में शामिल होती है.यह वह स्थान है जहां हर जुम्मे के दिन लोग एकत्रित होकर नमाज पढ़ते हैं. 

एक दूसरे से मिलकर अपनी जिंदगी की परेशानियों का हल निकालते हैं और एक दूसरे के प्रति अपने रिश्ते को कायम रखते हैं.इसलिए कहा जाता है कि अल्लाह की इबादत के साथ ही शुक्रवार का दिन भाईचारे को भी समर्पित है.इस दिन मस्जिदों में इमाम वहां मौजूद लोगों को जीवन का संदेश देते हैं, कठिनाइयों से लड़ने के लिए कुरान में दर्ज उपदेश बताते हैं. शुक्रवार को नमाज पढ़ने के खास नियम भी बनाए गए हैं.

मौलाना देते हैं धर्म का संदेश
इस्लाम में जुम्मा को अल्लाह के दरबार में रहम का दिन माना जाता है। इस दिन नमाज पढ़ने वाले इंसान की पूरे हफ्ते की गलतियों को अल्लाह माफ करते हैं और उसे आने वाले दिनों में एक अच्छा जीवन जीने का संदेश देते हैं। इस दिन इमाम और मौलाना पवित्र पुस्तक कुरान में से मस्जिद में मौजूद लोगों को कुछ ऐसे उपदेश पढ़कर सुनाते हैं जो उनके आने वाले जीवन को सुखमय बनाते हैं। इस दि नमाज़ को पढ़ने से पहए क्या-क्या करना चाहिए इसके भी नियम बताए गए हैं। 

जयपुर से निजाम कंटालिया की रिपोर्ट
 

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