VIDEO: BJP-RLP में गठबंधन, जानें क्या होगा 'कमल' को 'नफा' और 'हाथ' को 'नुकसान' 

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/04/04 09:52

जयपुर। चुनावी घमासान के बीच राजस्थान की राजनीति में उठा-पटक का दौर जारी है। हाथ का साथ मिलने की संभावनाएं धूमिल होने के बाद हनुमान बेनीवाल ने कमल से हाथ मिला लिया है। नागौर समेत जाट बहुल सीटों पर बीजेपी इसे ट्रम्प कार्ड के तौर पर देख रही है तो वहीं कांग्रेस पार्टी ने नई रणनीति बनाने का काम हाथ में ले लिया है। विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते है कि जब हनुमान बेनीवाल ने आरएलपी के बैनर तले चुनाव लड़ा था, तब कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा था। अब आरएलपी पूरी तरह बीजेपी के साथ आ गई है तो कांग्रेस को अपने वोट बैंक में सेंध लगने का खतरा नहीं होगा। यह अलग बात है कि नये सियासी घटनाक्रम के बाद सियासी दलों की निगाहें जाट बेल्ट पर टिक गई है। खास रिपोर्ट:

छात्रसंघ चुनावों से की शुरुआत:

राजस्थान विश्वविद्यालय में जब हनुमान बेनीवाल ने छात्रसंघ चुनावों की तैयारी शुरु की थी, उस समय ज्यादातर छात्रों ने उन्हीं की स्टाइल और खांटी वाक शैली के कारण गंभीरता से नहीं लिया था। बाद में इसी वाकपटुता और बॉडी लैंग्वेज ने उन्हें राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ का अध्यक्ष बनाया और वो भी उस समय के सबसे चर्चित छात्रनेता रणवीर सिंह गुढ़ा को हराकर। हनुमान बेनीवाल ने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा, राजनीति घर से ही सीखी लिहाजा नागौर को अपना सियासी मुख्यालय बनाने की ठान ली, चुनौती थी मिर्धा परिवार। 

हनुमान के सामने पहली चुनौती थी मिर्धा परिवार:

आजादी के बाद से ही मिर्धा परिवार ने जो राजनीतिक जमीन नागौर में तैयार की उसका मुकाबला करने की क्षमता किसी के पास नहीं थी। नाथूराम मिर्धा तो ऐसे किसान नेता रहे जिनकी गूंज राजस्थान ही नहीं बल्कि दिल्ली तक सुनाई देती है। सही मायनों में वो किसान नेता रहे। रामनिवास मिर्धा ने भी नागौर की धरती को सियासी तौर पर चमकाने में भूमिका निभाई और लोकसभा का स्पीकर बनकर गौरव दिलाया। इनके बाद मिर्धा परिवार आगे बढ़ाने का काम नई पीढ़ी के हाथों में आया। दूसरी छात्र राजनीति से निकलकर पहले भाजपा और बाद में अपने दम पर हनुमान बेनीवाल ने खींवसर में जमीन तैयार करने का काम कर लिया। पिछले लोकसभा चुनावों में भी उन्होंने दम दिखाया औऱ जनहित के मुद्दों पर संघर्षो के बलबूते खुद को स्थापित कर लिया। 

आरएलपी के गठन का मकसद थर्ड फ्रंट बनाना:

पिछले विधानसभा चुनावों में आरएलपी के गठन का मकसद ही यही था कि राजस्थान में थर्ड फ्रंट बनाया जाये। डॉ किरोड़ी लाल मीना के भाजपा में जाने और घनश्याम तिवाड़ी के पूरी तरह साथ नहीं आने के कारण बेनीवाल के मंसबूे पूरी नहीं हो पाये, लेकिन आरएलपी के दम पर तीन सीट लाकर अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह बोतल को पहचान दिला दी। 

नागौर, पाली और बाडमेर तीन लोकसभा सीटों पर हनुमान बेनीवाल चाह रहे थे सत्ताधारी दल कांग्रेस से गठबंधन करना। समझौता की बात ठहर गई केवल नागौर सीट पर, वो भी इसलिये कि वहां के कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने ज्योति मिर्धा के खिलाफ आवाज बुलंद कर रखी थी, लेकिन ज्योति के विरोधियों की सुनवाई के बाद भी आलाकमान ने ज्योति मिर्धा को कांग्रेस का टिकट थमा दिया। खींवसर में पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान ज्योति मिर्धा से हुई सियासी अदावत को हनुमान बेनीवाल भूले नहीं थे। लिहाजा रुख कर लिया उसी पार्टी बीजेपी का जहां से उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई थी। 

बोतल और बीजेपी के गठबंधन का असर:
—नागौर सीट पर भाजपा को मिल जायेगा उपयुक्त फेस
—कमल की कोशिश रहेगी जाट बेल्ट सीट पर बेनीवाल से लाभ लेने की 
—तकनीकी तौर पर बेनीवाल ने विलय नहीं किया ,बल्कि गठबंधन में शामिल हुये
—जद यू,इनेलो के बाद बीजेपी ने मौजूदा लोकसभा चुनावों में आर एल पी से गठबंधन किया
—अमित शाह की नीति है छोटे दलों को साथ लेकर चलना
—लिहाजा राजस्थान में यूपी का चुनावी मॉडल अपनाया
—बेनीवाल से बीजेपी को उम्मीद है नागौर, सीकर, झुंझुनूं, चूरु, बीकानेर, बाडमेर, पाली, जोधपुर, जयपुर ग्रामीण, अजमेर, राजसमंद सीटों पर
—बेनीवाल के जेएमएम समीकरण को बीजेपी की ओर से साधने की कोशिश
—आरएलपी के तीन में से विधायक दलित है
—दलित वोट नहीं मिलने से विधानसभा में बीजेपी को हुआ था नुकसान, आरएलपी के जरिये भरपाई की कोशिश
—बेनीवाल के साथ आने से नागौर लोकसभा सीट पर जायल, खींवसर, नागौर, डीडवाना में बढ़त मिलने के आसार
—विधानसभा में भी मिलेगा बोतल का साथ

कांग्रेस के रणनीतिकारों को अंदाजा हो गया था कि हनुमान बेनीवाल उनसे समझौता टूटने के बाद कोई बड़ा निर्णय ले सकते है। लिहाजा कांग्रेस ने बिना समय गंवाये जयपुर ग्रामीण से जाट और चर्चित उम्मीदवार पर दांव खेल दिया। कांग्रेस पार्टी आगे की रणनीतिक के तहत उन सीटों पर फोकस करेगी जिन्हें आरएलपी के जरिये बीजेपी साधने की जुगत में है। 

कमल के साथ बेनीवाल आने के बाद कांग्रेस की रणनीति:
—जाट बहुल सीटों पर कांग्रेस नवीन रणनीति के साथ आगे बढेगी
—कांग्रेस पार्टी के मजबूत जाट क्षत्रपों को ग्राउंड में उतारा जायेगा
—कांग्रेस का परम्परागत वोट बैंक माना जाता रहा है जाट
—आर एल पी से संभावित नुकसान को लेकर सोशल इंजीनियरिंग की जाएगी
—मुस्लिम -दलित वोटों की गोलबंदी होगी

हनुमान बेनीवाल के बीजेपी के साथ जाने से मारवाड़ और शेखावाटी की राजनीति में बदलाव के संकेत है। कांग्रेस पार्टी के थिंक टैंक अब नई चुनावी रणनीति के साथ आगे बढ़ने जा रही है। 

... संवाददाता योगेश शर्मा की रिपोर्ट 

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