Janmashtami Special: प्राचीन काल में जैसलमेर की धरा से श्री कृष्ण का नाता, अर्जुन को प्यास लगी तो कृष्ण ने त्रिकूट पहाड़ी पर सुदर्शन चक्र से खोदा था जैसलू कुआं

Janmashtami Special: प्राचीन काल में जैसलमेर की धरा से श्री कृष्ण का नाता, अर्जुन को प्यास लगी तो कृष्ण ने त्रिकूट पहाड़ी पर सुदर्शन चक्र से खोदा था जैसलू कुआं

जैसलमेर: आज पूरे देश में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व उत्साह के साथ मनाया जा रहा है. प्राचीन काल में जैसलमेर की धरा का नाता श्री कृष्ण से रहा है. श्री कृष्ण ने इस धरा पर चमत्कार दिया था. विश्वविख्यात सोनार दुर्ग में लक्ष्मीनाथ जी के मंदिर के पास स्थित जैसलू कुआं हजारों साल से ज्यादा प्राचीन है. इस कुएं ने 1965 तक जैसलमेर के लोगों की प्यास बुझाई है. वर्तमान में इस कुएं को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है. बताया जाता है कि वर्तमान में भी इस कुएं में पानी है. और यह हुआ जब अर्जुन को प्यास लगी तो कृष्ण ने त्रिकूट पहाड़ी पर सुदर्शन चक्र से यह कुआं खोदा था. जो आज भी किसी आश्चर्य से कम नहीं है. 

इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा के अनुसार प्राचीन काल में मथुरा से द्वारिका जाने का रास्ता जैसलमेर से होकर निकलता था. एक बार श्रीकृष्ण भगवान व अर्जुन इसी रास्ते से द्वारिका जा रहे थे. जैसलमेर की इस त्रिकूट पहाड़ी पर कुछ देर विश्राम करने के लिए रुके. इस दौरान अर्जुन को प्यास लगी और आसपास कहीं पानी नहीं था. तब श्रीकृष्ण भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र से यहां पर कुआं खोद दिया और अर्जुन की प्यास बुझाई. उन्होंने बताया कि मेहता अजीत ने अपने भाटीनामे में लिखा कि एक शिलालेख पर यह भविष्यवाणी लिखी थी कि जैसल नाम का जदुपति, यदुवंश में एक थाय. किणी काल के मध्य में, इण था रहसी आय. इसका तात्पर्य यह है कि जैसल नाम का राजा यहां आकर अपनी राजधानी बनाएगा. ऐसा ही हुआ. इस त्रिकूट गढ़ पर महारावल जैसल ने संवत 1212 में सोनार दुर्ग की नींव रखी और विशाल दुर्ग बनाया. उन्हें पहाड़ी पर पहले से ही स्थित कुआं मिल गया.

इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन समय में पहले पानी की व्यवस्था देखी जाती और उसके बाद बस्ती बसाई जाती थी.  महाभारत काल में सरस्वती नदी का भी उल्लेख है. बताया जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने त्रिकूट गढ़ पर अपने सुदर्शन चक्र से जैसलू कुंए को खोदा था तो इसमें सरस्वती नदी का पानी निकला था. इस नदी के बहाव क्षेत्र को तलाश करने के लिए अभी भी कई विशेषज्ञ जुटे हुए हैं. कई प्रमाण ऐसे मिल चुके हैं जिससे यह साबित हो चुका है कि सरस्वती नदी इसी इलाके से बहती थी.

इतिहासकारों के अनुसार 1965 तक यह कुआं चालू स्थिति में था:
पानी की कीमत जैसलमेर के प्राचीन लोगों को सर्वाधिक पता है. यहां बारिश नहीं होती थी. ऐसे में हमेशा पानी का संकट रहता था. प्राचीन काल में दुर्गवासी जैसलू कुएं से और शहरवासी गड़ीसर सरोवर से अपनी प्यास बुझाते थे. इतिहासकारों के अनुसार 1965 तक यह कुआं चालू स्थिति में था. जैसलमेर में बारिश की कमी के चलते हमेशा पानी की कमी रहती थी. इस वजह से हर गांव व शहर में प्राचीन बेरियां व कुंए मौजूद है. इनकी बनावट ऐसी है कि ये सब तालाबों के आसपास बने हुए हैं. तालाब में आने वाला बारिश का पानी ही इन बेरियों व कुओं में पहुंच जाता था और यहां के लोग साल भर तक उस पानी का उपयोग करते थे. जैसलू कुएं के बारे में विभिन्न तवारीखों व शिलालेखों में यही लिखा है कि श्रीकृष्ण ने अपने मित्र अर्जुन की प्यास बुझाने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से इसे खोदा था. यह करीब 5 हजार साल से भी अधिक पुरानी घटना है. इसके बाद महारावल जैसल ने इस त्रिकूट पहाड़ी पर सोनार दुर्ग का भव्य निर्माण करवाया था.

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