कुंभलगढ़ में बाघ बसाने की तैयारी, प्रदेश का चौथा टाइगर रिजर्व बन सकता है कुंभलगढ़

Nirmal Tiwari Published Date 2019/05/11 01:09

जयपुर। हाल ही में जयपुर में उदयपुर व राजसमन्द के वन विभाग के अधिकारीयों का एक वर्कशॉप हुआ है जिसमें कुम्भलगढ़ में बाघ को पुनर्स्थापित करने पर चर्चा की गयी। ये चर्चा इस सम्भावना को भी जन्म देती है की क्या मेवाड़ में पुनः बाघों को बसाया जा सकता है। एक रिपोर्ट:

मेवाड़ में बाघ बसाने की योजना

मेवाड़ में बाघ बसाने की योजना को लेकर कई सवाल भी हैं जैसे क्या यहाँ पहले बाघ थे ? क्या उनको पुनः बसाया जा सकता है ? क्या यहाँ के जंगल बाघों के लिए उपयुक्त हैं ?, क्या यहाँ पर पर्याप्त प्रे बेस है.? क्या राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण एन.टी.सी.ए. की अनुमति मिलेगी ?  इन सारे सवालों का जवाब कुछ इस प्रकार से दिया जा सकता है कि मेवाड़ में बाघों का एक सदी का रिकार्डेड  इतिहास रहा है, कई विशेषज्ञों ने इसपर पेपर भी पब्लिश किये हैं एवं साथ ही साथ कुछ किताब भी इस विषय पर लिखी गयी हैं एवं राजघरानों के पास भी मेवाड़ में टाइगर की उपस्थिति के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। 

मेवाड़ में टाइगर का इतिहास
मेवाड़ में टाइगर का इतिहास क्या रहा है इस पर नजर डालें तो 1882 में   कोडियात में टाइगर का रिकॉर्ड है। इसके बाद 1925 में  जयसमंद में टाइगर की उपस्थिति दर्ज  की गयी। इसके बाद 1939 में बाघदडा में एक अंग्रेज अधिकारी द्वारा बाघ को मारने की बात एक किताब में पब्लिश हुई है। इसके बाद 1945  में दोबारा जयसमंद में टाइगर की उपस्थिति को दर्ज किया गया। 1952 कुआं खेडा चित्तोड़ में फिर टाइगर की उपस्थिति दर्ज की गयी। इसके साथ ही 1943-44 में पानरवा में टाइगर को मारे जाने पर पब्लिश्ड पेपर्स हैं। दोबारा 1952 में एक आदमखोर बाघ को मारने के लिए वन विभाग द्वारा उस समय के एक व्यक्ति को लेटर लिखा गया। 

कुम्भलगढ़ में भी टाइगर की उपस्तिथि का रिकॉर्ड 
इसके बाद ओगणा, डेढ़ मारिया फारेस्ट ब्लॉक सभी जगह समय समय पर टाइगर की उपस्तिथि दर्ज होती रही। इसे बाद 1982 में एक टाइगर भटक के बस्सी में आ गया था। फिर 1993 में एक टाइगर डूंगरपुर के फारेस्ट में मरा हुआ मिला था। साथ ही रावली ताड़गढ़ एवं कुम्भलगढ़ में भी टाइगर की उपस्तिथि का रिकॉर्ड दर्ज है। वहीँ घाणे राव सादड़ी में भी टाइगर को मारे जाने का रिकॉर्ड उपलब्ध है।

अब बात आती है मेवाड़ में इसे कहाँ बसाया जा सकता है..? तो इसके लिए रावली टाडगढ़ वन्यजीव अभ्यारण  के साथ कुम्भलगढ़ अभ्यारण  व् उदयपुर का रणकपुर सादड़ी फारेस्ट ब्लॉक मिला लिया जाए तो  ये लगभग 1500 स्क्वेयर किलोमीटर के आसपास का बेल्ट बनता है, जो की राजस्थान के तीसरे टाइगर रिज़र्व मुकुंदरा से लगभग क्षेत्रफल में दुगना है। यहाँ पैंथर, भालू भेड़िया, जरख, सियार, लोमड़ी, सांभर चीतल चिंकारा, चौसिंघा, लंगूर, जंगली सूअर आदि जानवर पहले से मौजूद हैं। 

कैसे टाइगर हैबिटैट खत्म हो रहे हैं
रही बात प्री बेस की तो उसे बढाया जा सकता है। गावों का विस्थापन एक समस्या रहती है जिसे भी समझाइश के साथ विस्थापन कर किया जा सकता है। शुरुआत में टाइगर को एनक्लोजर में रखा जा सकता है एवं बाद में हार्ड रिलीज़ किया जा सकता है। मध्यप्रदेश में जहाँ 6 टाइगर रिज़र्व हैं वहां राजस्थान में केवल 3 वो भी मुकुंदरा 2013 में बना व् टाइगर 2018 में लाये गए।

वहीँ छतीसगढ़ भी तमोर को नया टाइगर रिज़र्व बनाने में लगा हुआ है। वन्यजीव विशेषज्ञ अनिल रोजर्स की माने तो अभी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट आई हैं जिसमें बताया गया है कैसे टाइगर हैबिटैट खत्म होते जा रहे हैं। राजस्थान में मेवाड़ में टाइगर का इतिहास रहा है, जो तैयारी वन विभाग द्वारा चल रही है वो सराहनीय है। इससे न केवल राजस्थान में बाघों के संरक्षण के नए द्वारा खुलेंगें परन्तु मेवाड़  और मारवाड़ के जंगल भी सुरक्षित रहेंगें।

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