मरूभूमि की मशहूर प्रेम कथा, "मूमल-महेन्द्र"

FirstIndia Correspondent Published Date 2017/02/11 17:43

जैसलमेर | जैसलमेर अद्वितीय सौन्दर्य की स्वामिनी मूमल व अदम्य साहस के प्रतीक महिन्द्रा के अटूट प्रेम को हजारों वर्ष बाद भी लोकप्रियता हासिल है। एक-दूसरे से बेइंतहा प्रेम करने वाले इन दीवानों के प्रेम का हालांकि दुखद अंत हुआ। लेकिन स्वर्णनगरी के भ्रमण को आने वाले देश-विदेशी सैलानी यहां मूमल की मेड़ी को देखकर उसकी प्रेम कहानी से काफी प्रभावित होते हैं। मन में प्रेम कथा का विचार कौंधते ही मानस पटल पर प्रेम के पुजारी हीर-रांझा, सोनी-महीवाल, शीरी-फरहाद, रोमियो-जूलियट, लैला-मजनू और बूवना-जलाल का नाम सामने आ जाता है। ऐसे में मरूप्रदेश की मूमल व अमरकोट, पाकिस्तान निवासी उनके प्रियतम महेन्द्रा की प्रेम कहानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


 
मूूमल की कलात्मक मेड़ी का बखान लोक गीतों में भी किया जाता है। बुजुर्गों का कहना हैं कि जैसलमेर की प्राचीन राजधानी लौद्रवा जिला मुख्यालय से 14 किमी दूरद्ध में शिव मंदिर के समीप व काक नदी के किनारे आज भी मूमल की मेड़ी के अवशेष मौजूद है जो कि इस अमर प्रेम कहानी के मूक गवाह बने हुए है। यहां आने वाले सैलानी भग्नावशेष के रूप में दिखाई देने वाली मेड़ी को देखकर उन दिनों की कल्पना करते हैं| जब रेगिस्तान के मीलों लंबे समंदर को पार कर अमरकोट से महेन्द्रा अपनी प्रियतमा मूमल से मिलने यहां आता था।

 

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