रणथम्भौर की बाघिन T-16 मछली की मौत, कुछ ऐसा रहा मछली का सफर

FirstIndia Correspondent Published Date 2016/08/18 11:10

रणथम्भौर की बाघिन T-16 मछली की मौत हो गई है| मछली पिछले कई दिनों से बीमार चल रही थी| मछली लगभग 20 साल की हो चुकी थी| मछली रणथम्भौर की शान थी| इस मछली ने ना सिर्फ रणथम्भौर, बल्कि बाघ विहिन हो चुके सरिस्का को भी आबाद करने में जिम्मेदारी अदा की थी| 20 बरस की ये बाघिन वाइल्ड लाइफ हिस्ट्री से ना मिटाये जाने वाला इतिहास है| ये ऐसी बाघिन है जिसे लाइफ टाइम अचीवमेन्ट समेत कई अवॉर्ड से नवाजा गया था|

 

रणथम्भौर नेशनल पार्क में कई बरस तक अपना राज कायम रखनें वाली मछली नामक बाघिन T-16 उम्रदराज होने के साथ ही बीमार थी| हालात ये थे कि जंगल की बादशाहत करने वाली ये शेरनी ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर आकर शिकार तक करने की ताकत गवा चुकी थी| शारीरिक रुप ये दुर्बल हो चुकी इस बाघिन के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था| कई दांत टूट चुके थे और ये मछली बूढ़ी आंखों से धुंधले जंगल का दीदार भी ठीक से नहीं कर पाती थी|

 

मछली का इलाज करना था मुश्किल


जंगल में शान और शौकत का प्रतीक इस बाघिन ने बीते चार महीने से रणथम्भौर में महारानी पार्क से सटे एक होटल परिसर में डेरा डाल लिया था| T-16 की गिरती सेहत को देखते हुए वन विभाग के अधिकारियों समेत वन्यजीव प्रमियों ने इसकी देखभाल शुरु की थी, लेकिन बिना ट्रेंकूलाइज किये मछली का पूरा इलाज नहीं किया जा सकता था| आखिर कैसे उम्र के इस पड़ाव में मछली को बेहोश किया जाये और इलाज किया जाये...ये फिक्र सबको थी| डॉक्टर्स मांस में दवा डालकर उस तक पहुंचा रहे थे और बाघिन की निगरानी के लिये सीसीटीवी कैमरे तैनात किये गये थे|

 

रणथम्भौर की शान इस बाघिन की ताकत का लोहा एक वक्त पूरा जंगल मानता था| अब हालत ये है कि ना T-16 ठीक से खड़ी हो सकती थी और ना ही चल पाती थी| मछली का जाना रणथम्भौर के लिये ऐतिहासिक नुकसान है|

टाइगर क्वीन ऑफ रणथम्भौर 


टाइगर क्वीन ऑफ रणथम्भौर की उपाधि सिर्फ और सिर्फ T-16 यानि मछली को ही मिली| मछली की बदौलत ना सिर्फ रणथम्भौर बल्कि सरिस्का को आबाद करने में वन्य जीव प्रेमियों को कामयाबी मिली| इस बाघिन ने लगभग एक दर्जन शावको को जन्म दिया, जिसके कारण रणथम्भौर समेत सरिस्का आबाद हुए हैं|

 

मछली पर बनी थी कई फिल्में


T-16 बाघिन के परिवार के कारण आज रणथम्भौर में बाघों का कुनबा बढ़ा है| रणथम्भौर को आबाद करने के साथ ही इस बाघिन ने रणथम्भौर को विश्व मानचित्र पर प्रसिद्धी भी दिलाई है| इसने रणथम्भौर भ्रमण पर आने वाले देशी-विदेशी सैलानियों को अपनी और रिझाया| टाइगर क्वीन ऑफ रणथम्भौर के नाम से प्रसिद्ध मछली पर कई फिल्में भी बन चुकी हैं| इस पर रणथंभौर क्वीन, टाइगर फुटरेश, डेन्जर दा टाइगर पैराडाइस और क्वीन आफ दा टाईगर जैसे टाइटल्स पर फिल्मे बनी और इन्हे अवार्ड भी मिले हैं|  इस बाधिन को बीबीसी की ओर से लाइफ टाइम एचिवमेंन्ट अवार्ड से सम्मानित भी किया गया जोकि दुनिया में किसी भी बाघिन के लिये पहला पुरस्कार है|

 

लेडी ऑफ लेक, क्रोक्रोडाइल किलर नाम से जानी जाती थी मछली 


मछली की उपलब्धियों का सिलसिला लंबा है| राज्य सरकार ने इसके नाम से डाक टिकट भी जारी किया| रणथम्भौर का किस्सा बयान करने वाले बताते हैं कि एक बार अपने बच्चों की सुरक्षा के लिये मछली ने पानी में मगरमच्छ पर हमला कर दिया था, जिसकी वजह से इसके तीन दांत टूट गये थे| इसके बाद ये शिकार करने में असमर्थ हो गई थी| फिर भी आस-पास के इलाकों में  अपने तजुर्बे से इसने ना सिर्फ शिकार किये, बल्कि बच्चों को पाला| इसके चेहरे पर बने मछली जैसे निशान के कारण ही इस का नाम मछली रखा गया था| जानकार इस बाघिन को लेडी ऑफ लेक और क्रोक्रोडाइल किलर के नाम से भी जानते हैं|


रणथम्भौर में पूजा-अर्चना 


मछली की प्रसिद्धी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब पिछले साल यह बाघिन बीमार हुई थी, तो इसकी खबर सुनने के बाद श्रीलंका का एक पर्यटक दल रणथम्भौर आया था, जिसने दुर्ग पर त्रिनेत्र गणेश मंदिर में पूजा-अर्चना करवाई थी| मछली पर लिखी एक किताब का मई 2015 में श्रीलंका की राजधानी कोलम्बों में विमोचन किया गया था|


7 दिन में 2 बार पाडा जंगल में बांधते थे विभागीय अधिकारी 


ऐसा नहीं है कि रणथम्भौर की महारानी मछली पहली बार बीमार हुई थी| पहले भी यह बाघिन कई बार बीमारी से जूझ चुकी थी| साल 2015 में भी यह बाघिन कई दिनों तक बीमारी से जूझ रही थी| शिकार में असमर्थ होने के कारण विभागीय अधिकारी इस बाघिन के लिये सात दिन में दो बार पाडा लेकर जंगल में बांधकर आते थे, जिसे वो अपना शिकार बनाती थी| 

 

मछली पर बनी फर्स्ट इंडिया न्यूज़ की खास रिपोर्ट

 

  
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