जयपुर Rajasthan: गहलोत सरकार ने साढ़े 3 साल में 5000 से ज्यादा अफसरों को किया इधर-उधर, ये हुए चौंकाने वाले या प्रमुख तबादले

Rajasthan: गहलोत सरकार ने साढ़े 3 साल में 5000 से ज्यादा अफसरों को किया इधर-उधर, ये हुए चौंकाने वाले या प्रमुख तबादले

जयपुर: कुछ प्रशासनिक व्यवस्था के लिए...कुछ गुड गवर्नेंस और सरकारी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन और कुछ सियासी संकट व स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मांग के चलते गहलोत सरकार (gehlot government) को साढ़े 3 सालों में खासे तबादले करने पड़े हैं. इसके तहत 450 से ज्यादा तबादला सूची जारी करके 5000 से ज्यादा अफसरों को इधर-उधर (transfer in gehlot government) किया गया है. 

दिसंबर 2018 में राज बदला और वसुंधरा राजे के बाद अशोक गहलोत ने राज्य की सत्ता संभाली. सत्ता संभालने के साथ CMO के आला अधिकारी और वित्त व कार्मिक विभाग सहित प्रमुख विभागों के प्रशासनिक मुखिया से लेकर अन्य अधीनस्थ अधिकारियों को इधर-उधर किया गया. 

ये हुए चौंकाने वाले या प्रमुख तबादले:-
गहलोत सरकार के डेढ़ साल लगातार तबादलों के जरिए प्रशासनिक तंत्र के बड़े चेहरे बदलने और सरकार की जनवादी छवि के अनुरूप अधिकारियों को लगाने में बीता. इन तमाम बदलावों के बीच वसुंधरा सरकार में सीएस बने डीबी गुप्ता 2 जुलाई 2020 तक इस पद पर बने रहने में कामयाब रहे लेकिन 2 जुलाई 2020 की मध्यरात्रि को अचानक उन्हें मुख्य सचिव पद से हटाकर राजीव स्वरूप को यह जिम्मेदारी सौंप दी जिसे ब्यूरोक्रेसी का सबसे चौंकाने वाला फैसला माना गया. 

3 दिन तक उनके बारे में सस्पेंस रहा और फिर उन्हें 5 जुलाई की मध्यरात्रि को सीएम का सलाहकार बनाया गया. 30 सितंबर 2020 को उनका आई ए एस से रिटायरमेंट हो गया लेकिन फिर भी उन्हें सरकार ने सीएम सलाहकार के रूप में उनका 1 वर्ष तक का और कार्यकाल रखा. उन्हें इकोनॉमिक ट्रांसफॉर्मेशन सलाहकार परिषद में  सदस्य भी नियुक्त किया गया. वे सीएम सलाहकार के रूप में अपना काम कर रहे थे और इसी दरम्यान 4 दिसंबर 2020 को उन्हें राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त बना दिया. 

गहलोत सरकार के आने के बाद कुलदीप राका को सीएम का प्रमुख सचिव बनाने और निरंजन आर्य को पीएसएफ बनाने के प्रमुख आदेश हुए. फिर आर्य ACS बने और फिर उन्हें बाद में सीएस भी बनाया. इसी तरह IPS भूपेंद्र सिंह को डीजीपी बनाया लेकिन उनके VRS के बाद उन्हें RPSC में चेयरमैन बनाया गया और ML लाठर को डीजीपी पद की जिम्मेदारी दी गई.

5000 से ज्यादा अफसर हुए इधर-उधर:-
 - करीब 110 बार आईएएस अफसरों की तबादला सूची जारी हुई जिसमें करीब 367 अफसरों को बदला गया.
- 31 बार आईएफएस अफसरों की तबादला सूची जारी हुई जिसमें करीब 300 अफसरों को बदला गया.
- करीब 66 बार आईपीएस अफसरों की तबादला सूची जारी हुई जिसमें 635 से ज्यादा अफसरों को बदला गया. 
- करीब 157 बार आरएएस अफसरों की तबादला सूची जारी हुई जिसमें  2090 से ज्यादा अफसरों को बदला गया .
- गृह और पुलिस मुख्यालय ने 120 से ज्यादा तबादला सूची जारी कर 1250 से ज्यादा अन्य पुलिस अधिकारियों के तबादले किये. 

पिछली सरकार से तुलना करें तो वसुंधरा सरकार में पांच साल में करीब 144 बार आईएएस, करीब 58 बार आईएफएस, करीब 71 बार आईपीएस और 262 बार आरएएस अफसरों की तबादला सूची जारी की. यानी पांच साल में 535 तबादला सूची जारी की गई थी. वहीं गहलोत सरकार में साढ़े तीन साल में ही साढ़े चार सौ से ज्यादा तबादला सूची जारी की जा चुकी है. गहलोत सरकार पर आय सियासी संकट के बाद इन तमाम सूचियों में जनप्रतिनिधियों की मांग और दबाव का भी असर देखा गया. 

क्या होता है नुकसान:- 
बार बार जनप्रतिनिधियों की सिफारिश पर तबादले से अफसर महज कठपुतली से नजर आते हैं और दबाव के चलते नियमपूर्वक और ठीक तरह से सर्विस डिलीवरी नहीं कर पाते. साथ ही प्रशासन में कामकाज कर रहे अफसर जनता से सीधे जुड़ाव के चलते नब्ज जानते हैं और सरकार के वापस सत्ता में आने की संभावना कम दिखने के साथ ही अपने तेवर बदलते हैं जिससे आम जनता का काम प्रभावित होता है.

एक ही अफसर के बार-बार तबादले से सरकार पर उसे परेशान करने को लेकर आरोप लगते रहते हैं, तो वहीं दबाव के चलते ब्यूरोक्रेसी को भी काम करने में दिक्कतें होती हैं... लेकिन 1 ही पद या स्थान पर बने रहने से अफसर के बने वर्चस्व के चलते भ्रष्टाचार और अनियमितता का अंदेशा भी रहता है.

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