धोरों की धरा में 'ज्ञान का विशाल भंडार', पीएम के हाथों शुभारंभ की ख्वाहिश

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/06/23 05:04

पोकरण। पानी के समंदर में आप को सीप मिल सकते हैं, मोती मिल सकते हैं। लेकिन जरा कल्पना कीजिए कि रेत के समंदर में आपको मिट्टी के सिवाय और क्या क्या मिल सकता है? दूर दूर तक नजर डालें तो खीप और कूचे आपको जरूर नजर आएंगे, लेकिन परमाणु नगरी के पास स्थित धोरों की धरा में बसे भादरिया गांव की बात करें तो यहां रेत के समंदर में 'ज्ञान का भंडार' भरा पड़ा है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान से सटी सरहदी सीमा में स्थित भादरिया गांव में ज्ञान की पूरी गंगा इस मरूस्थल में समाहित है। इस ज्ञान की गंगा बहाने में मात्र एक ही व्यक्ति ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिससे देश का सर गर्व से ऊंचा हो जाता है।

पोकरण के पास स्थित शक्ति पीठ भादरिया गांव में देश का ही नहीं, अपित एशिया महाद्वीप की प्रमुख पुस्तकों का संग्रह है। अगर इस पुस्तकालय को एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा पुस्तकालय कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। दुनिया के सभी धर्मों के ग्रन्थ हो या फिर भारत के तमाम उच्च न्यायालयों के निर्णयों की पुस्तकें, छोटे—बड़े लेखकों के आलेख हो या फिर महापुरूषों की जीवन कथाएं या फिर विश्व के संविधान की पुस्तकें या फिर दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह। यहां तक ही नहीं, भारत के संविधान की मूल प्रति भी इस संग्रहालय में मौजूद है।

इस पुस्तकालय में करीब आठ लाख पुस्तकों का संग्रह किया गया है। अपनी विशेषताएं समेटे यह पुस्तकालय कुछ ही महिनों में आमजन के लिए प्रारंभ कर दिया जाएगा, जिससे देश की युवाओं को एक ही छत के नीचे सारे ग्रंथों व महापुरूषों की जीवन कथाएं व विभिन्न देशों की पुस्तकों का अध्ययन करने का अवसर प्राप्त होगा। 

पोकरण के पास शक्ति पीठ भादरिया गांव में रेत के समंदर में ज्ञान की गंगा बहाने का श्रेय संत हरवंस सिह नर्मिल को जाता है, जिन्होने वन मेन मिशन के तहत कार्य कर रेगिस्तान में ज्ञान की पूरी गंगा ही समाहित कर दी। हरंवस सिह निर्मल का जन्म 1930 में पंजाब के फिरोजपुर जिले के समृद्ध परिवार में हुआ था। सिख धर्म निर्मल धरा में दीक्षित होने के बाद घर परिवार को छोड़कर हिमालय की कंद धराओं में एकांत वास में रहते हुए कठोर तपस्या की। वहीं 2016 में घूमते हुए वे भादरिया गांव पहुंचे व भादरिया का एंकात वास उनको पसंद आया। भादरिया शक्ति पीठ से ही सामाजिक सेवा, शिक्षा के क्षेत्र में अलख जगाने का कार्य प्रारंभ किया। वहीं भारत व विश्व के नागरिकों के गिरते मानवीय स्तर एवं बढ़ते हुए अवगुणों की रोकथाम के लिए इन्होंने 14 जिलों में प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर कुल 4000 हजार पुस्तकालयों की स्थापना करवाई।

शिक्षा के क्षेत्र में मिशन के तहत कार्य कर भादरिया शक्ति पीठ में 21 अप्रेल 1983 को विशाल ग्रन्थागार की स्थापना कर पुस्तकालय में प्रमुख ग्रंथों का संकलन प्रारंभ किया। देखते ही देखते पुस्तकालय में लाखों पुस्तकों का संग्रह होना प्रारंभ हो गया। विश्व के प्रमुख दर्शन, नीति, इतिहास, ज्ञान—विज्ञान, कानून, अर्थशास्त्र, जीव—जगत, चिकित्सा विज्ञान, शब्द कोष आदि विभिन्न विषयों पर विश्व की दुर्लभ पुस्तकों का संग्रह किया। वहीं उनकी यह सोच थी कि ग्रन्थागार को इतना समृद्ध बनाया जाए कि ज्ञान के शोधकर्ताओं को अन्यत्र नहीं जाना पड़े। 

भादरिया मंदिर परिसर के पास बने भूमिगत पुस्तकालय देखने जैसे ही पहुंचते हैं तो विशाल काय भवन में कदम रखते ही पुस्कालय की लाईटों का स्वीच स्वत: ही आॅन हो जाता है। वेसे ही पुस्तकों की अद्रभत दुनिया सामने होती है। वहीं अलमारियों में सजी पुस्तकें देखते ही लगता है कि ज्ञान के समंदर में पहुंच गये हैं। पुस्तक प्रेमियों ने इनके इस कार्य को बहुत ही अनुकरणीय बताया है।

मंदिर के किनारे बनी 15 हजार वर्ग फीट में बना विशालकाय पुस्तकालय में तीन गुना छ फीट के आकार की 562 अलमारियों, 16000 हजार फीट लम्बी रेस्क बनाकर करीब आठ लाख पुस्तकों को स्थान दिया गया है। वहीं पुस्तकालय में 18 कमरे बनाए गये हैं। बाहर से आने वाले शोधकर्ताओं व विधार्थियों के लिए अलग से व्यवस्था की गई है। पुस्तकालय में शोध भवन सेस्कृति संस्थान विश्व के राष्ट्रों की नई पुरानी मुद्राएं एवं राष्ट्र के नये पुराने नोटों के संग्रहण के लिए भवनों का भी निर्माण हो चुका है।

भादररिया सेवा समिति के अध्यक्ष जुगल किशोर का कहना है कि महाराज का यह सपना था कि इस विशालकाय पुस्तकालय का शुभारंभ ऐसे व्यक्ति के हाथों हो जो राष्ट्र भक्त हों। उनका यह सपना है कि हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एशिया के इस सबसे बड़े पुस्तकालय का शुभारंभ करे। उसके बाद हम यह पुस्तकालय आम लोगों के लिए प्रारंभ कर देंगे।

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