ब्रिटिश काल के भी पूर्व से चला आ रहा है विवादित भूमि मामला, अभी भी 'तारीख दर तारीख'

Pawan Tailor Published Date 2019/01/10 05:56

जयपुर। सुप्रीम कोर्ट में आज एक बार फिर से राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर सुनवाई की गई। हालांकि आज भी वही हुआ, जो बरसों से होता चला आ रहा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ दाय​र 14 अपीलों पर सुनवाई के लिए कोर्ट ने अब अगली तारीख मुकर्रर कर दी है। इस मामले में कोर्ट अब 29 जनवरी को सुनवाई करेगा। दूसरी ओर, यह भी उम्मीद की जा रही है कि अगली सुनवाई होने से पहले जजों की नई बैैंच गठित की जा सकती है और संभवतया नई बैैंच ही मामले की अगली सुनवाई करेगी।

बहरहाल, इससे इतर इस मामले को लेकर अब हर किसी के जहन में यह सवाल उठने लगा है कि आखिर इतने साल बीत जाने के बावजूद इस मसले का कोई समाधान या फिर कोर्ट का फैसला क्यों नहीं आ पा रहा है। हालांकि मामले और इसके इ​तिहास पर नजर डाली जाए तो समझा जा सकता है कि मामला कितना पैचीदा है और आखिर ये पूर मामला है क्या, जिस पर निर्णय करने में कोर्ट को बरसों लग गए और अभी भी तारीख दर तारीख का सिलसिला बदस्तूर जारी है। अयोध्या विवाद ने कई दशकों तक देश की राजनीति को प्रभावित किया है, लेकिन ये विवाद कोई एक दिन में उत्पन्न नहीं हुआ था। ऐसे में जानते हैं कि आखिर क्या हुआ था बाबरी विध्वंस से पहले?

उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक, दावा किया जाता है कि मुगल शासक बाबर के सेनापति मीर बाकी ने उसके सम्मान में अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था। हिंदुओं का मत है कि मीर बाकी ने बाबर के लिए इस मस्जिद का निर्माण एक मंदिर को तोड़कर किया था, जिसे बाद में बाबरी मस्जिद कहा जाने लगा। बाबरी मस्जिद निर्माण के लिए मीर बाकी ने जिस मंदिर को तोड़ा था, वह कोई आम मंदिर नहीं, बल्कि राम जन्मभूमि पर बना मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम का मंदिर था और इसी को लेकर पूरे विवाद ने जन्म लिया और सैकड़ों साल बीत जाने के बावजूद मामला अभी तक भी कोर्ट की तारीखों में उलझा हुआ है। इसी के चलते आज कोर्ट ने बाबरनामा समेत कई ग्रंथों को भी कोर्ट में मंगवाया है। ऐसे में अब सबकी नजर 29 जनवरी को होने वाली सुनवाई पर टिकी है।

दरअसल, यह विवाद 1949 का नहीं है, जब बाबरी ढांचे के गुम्बद तले कुछ लोगों ने मूर्ति स्थापित कर दी थी। यह विवाद 1992 का भी नहीं है, जब भारी तादाद में भीड़ ने विव‍ादित ढांचा ध्वस्त कर दिया था। वस्तुत: यह विवाद अब से करीब 491 वर्ष पूर्व यानि 1528 ईस्वी का है, जब एक मंदिर को तोड़कर बाबरी ढांचे का निर्माण कराया गया था। ऐसे में जन्मभूमि को लेकर फैसला वस्तुतः 1528 की घटना का होना है, न कि 1949 या 1992 की घटना को लेकर। 1949 और 1992 की घटनाएं 1528 की घटना से उत्पन्न हुए शताब्दियों के संघर्ष के बीच घटी तमाम घटनाओं के बीच की मात्र दो घटनाएं हैं, क्योंकि विवाद अभी भी समाप्त नहीं हुआ है और फैसला कोर्ट को करना है।

ये विवादित भूमि मामले की पूरी कहानी, तारीखों की जुबानी :
1528 :
कहा जाता है कि बाबर ने यहां एक मस्जिद का निर्माण कराया, जिसे बाबरी मस्जिद कहते हैं। हिंदू मान्यता के अनुसार इसी जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था।

1853 : हिंदुओं का आरोप है कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ। मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई।

1859 : ब्रिटिश सरकार ने तारों की एक बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिदुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दे दी।

1885 : मामला पहली बार अदालत में पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे एक राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की।

23 दिसंबर 1949 : विवादित ढांचे के केंद्र स्थल पर भगवान राम की मूर्ति रखी गई। इसके बाद उस स्थान पर हिंदू नियमित रूप से पूजा करने लगे, वहीं मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया।

16 जनवरी 1950 : गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद अदालत में एक अपील दायर कर रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष इजाजत मांगी।

5 दिसंबर 1950 : महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और विवादित ढांचे में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया। इसके साथ ही मस्जिद को 'ढांचा' नाम दिया गया।

17 दिसंबर 1959 : निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया।

18 दिसंबर 1961 : उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने विवादित ढांचे के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया।

1984 : विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने विवादित ढांचे के ताले खोलने और राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया। इसके लिए एक समिति का गठन किया गया।

1 फरवरी 1986 : फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी और ताले दोबारा खोले गए। दूसरी ओर, नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया।

जून 1989 : भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने वीएचपी को औपचारिक समर्थन देना शुरू कर मंदिर आंदोलन को नया जीवन दिया।

1 जुलाई 1989 : भगवान रामलला विराजमान नाम से 5वां मुकदमा दाखिल किया गया।

9 नवंबर 1989 : तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने विवादित ढांचे के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी।

25 सितंबर 1990 : बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली, जिसके बाद साम्प्रदायिक दंगे हुए।

नवंबर 1990 : आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। बीजेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

अक्टूबर 1991 : उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार ने विवादित ढांचे के आस-पास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने अधिकार में ले लिया।

6 दिसंबर 1992 : हजारों की संख्या में कारसेवकों ने अयोध्या पहुंचकर विवादित ढांचे को ढाह दिया। इसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए। जल्दबाजी में एक अस्थायी राम मंदिर बनाया गया।

16 दिसंबर 1992 : विवादित ढांचे की तोड़-फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।

जनवरी 2002 : तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यालय में एक अयोध्या विभाग शुरू किया, जिसका काम विवाद को सुलझाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत करना था।

अप्रैल 2002 : अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की।

मार्च-अगस्त 2003 : इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि विवादित ढांचे के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं। मुस्लिमों में इसे लेकर अलग-अलग मत थे।

सितंबर 2003 : एक अदालत ने फैसला दिया कि विवादित ढांचे के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाए।

जुलाई 2009 : लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी गई।

28 सितंबर 2010 : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहबाद हाई कोर्ट को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका खारिज करते हुए फैसले का मार्ग प्रशस्त किया।

30 सितंबर 2010 : इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा, जिसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े में जमीन बंटी। लेकिन अपराधियों पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। वहीं हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने इस निर्णय को मानने से अस्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

9 मई 2011 : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए कहा कि सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के फैसले को लागू करने पर रोक रहेगी। साथ ही विवादित स्थल पर 7 जनवरी 1993 वाली यथास्थिति बहाल रहेगी।

26 फरवरी 2016 : विवादित भूमि पर राम मंदिर के निर्माण को लेकर सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

जुलाई 2016 : बाबरी मामले के सबसे उम्रदराज वादी हाशिम अंसारी का निधन हो गया।

21 मार्च 2017 : सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की बात कही। कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने कहा कि वे बातचीत की मध्यस्थता कर सकते हैं। उनके इस सुझाव का लालकृष्ण आडवाणी सहित भाजपा के कई नेताओं ने स्वागत किया।

19 अप्रैल 2017 : सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित बीजेपी और आरएसएस के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया।

7 अगस्त 2017 : सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के दिए गए इस्माइल फारूकी फैसले को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के लिए तीन जजों की बेंच का गठन किया।

8 अगस्त 2017 : यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अयोध्या में विवादित जमीन से कुछ दूरी पर मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद बनाई जा सकती है।

11 सितंबर 2017 : सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को निर्देश देते हुए कहा कि अयोध्या में राम जन्मभूमि की निगरानी के लिए 10 दिनों के अंदर दो जजों को बतौर पर्यवेक्षक नियुक्त किया जाए।

20 नवंबर 2017 : यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि मंदिर अयोध्या में और मस्जिद लखनऊ में बनाई जा सकती है।

1 दिसंबर 2017 : 32 कार्यकर्ताओं ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फैसले को चुनौती देने के लिए हस्तक्षेप आवेदन दिए। इसमें फिल्म निर्माता अपर्णा सेन, श्याम बेनेगल और मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ समेत सुब्रमण्यम स्वामी के आवेदन शामिल थे।

5 दिसंबर 2017 : इस विवाद पर आज से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई।

8 फरवरी 2018 : सुप्रीम कोर्ट में दिवानी मामले की सुनवाई शुरू हुई।

14 मार्च 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी समेत सभी अंतरिम याचिकाओं को खारिज कर दिया। केवल सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका के बारे में अदालत ने कहा कि अब इसे एक अलग याचिका के रूप में सूचीबद्ध किया जाएगा।

6 अप्रैल 2018 : मुस्लिम पक्षकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि वो 1994 के अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजें।

6 जुलाई 2018 : उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि कुछ मुस्लिम संगठन 1994 के फैसले पर पुनर्विचार की मांग कर मामले की सुनवाई में देर कराने की कोशिश कर रहे हैं।

13 जुलाई 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अयोध्या में विवादित जमीन के मामले को लेकर 20 जुलाई से लगातार सुनवाई होगी।

20 जुलाई 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा।

27 सितंबर 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद से जुड़े 1994 वाले फैसले पर पुनर्विचार से इनकार किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 'मस्जिद में नमाज़ पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।' साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारुकी मामले को संवैधानिक पीठ के पास भेजने से भी इनकार कर दिया।

29 अक्टूबर 2018 : अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद के मामले में सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई जनवरी 2019 तक के लिए टल गई। कोर्ट ने कहा कि इस मसले पर अगली सुनवाई जनवरी 2019 में एक उचित पीठ के समक्ष होगी।

12 नवंबर 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में याचिकाओं पर शीघ्र सुनवाई से इनकार कर दिया। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की पीठ ने कहा कि उसने पहले ही अपीलों को जनवरी में उचित पीठ के पास सूचीबद्ध कर दिया है।

4 जनवरी 2018 : इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2010 के फैसले के खिलाफ दाय​र 14 अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस मामले अगली सुनवाई के लिए 10 जनवरी का दिन मुकर्रर किया गया।

10 जनवरी 2018 : इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनवाई करते हुए 29 जनवरी को अगली सुनवाई का निर्णय दिया है।

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