दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर देंगे वन्यजीव गणना के आंकड़े

Nirmal Tiwari Published Date 2018/10/12 08:51

जयपुर (निर्मल तिवारी)। आखिरकार वन विभाग ने वन्यजीव गणना के आंकड़े जारी कर दिए हैं। 2015 के बाद से राजस्थान में वन्यजीवों के आंकड़े जारी ही नहीं किये गए थे, तीन साल के इंतजार के बाद अब वन विभाग ने 2016 और और 2017 के वन्यजीव गणना के आंकड़ों को जारी कर किया है। इनमें सबसे खास बात यह है कि पैंथर की तादाद बहुत तेजी से प्रदेश में बढ़ी है, लेकिंन साथ ही साथ उनकी मृत्युदर भी।

ये है 2 साल के आंकड़े :
— भालू 2 वर्ष में 815 से बढ़कर 919 हुए
— भेड़िये 2 वर्ष में 1044 से घटकर 888 हुए
— बिज्जू 2 वर्ष में 1488 से घटकर 1716 हुए
— जरख 2 वर्ष में 2367 से बढ़कर 2599 हुए
— काला हिरन 2 वर्ष में 17697 से बढ़कर 26658 हुए
— लंगूर 2 वर्ष में 23740 से घटकर 8259 हुए
— लोमड़ी 2 वर्ष में  7002 से बढ़कर 7409 हुईं 
— नेवला 2 वर्ष में 2150 से घटकर 1508 हुए
— सियार 2 वर्ष में 21557 से बढ़कर 22808 हुए
— सियागोश 2 वर्ष में 30 से बढ़कर 76 हुए 

पिछले तीन साल में राजस्थान वन्यजीवों की तादाद के मामले में एक अजीब सा अंधकार छाया हुआ था। दरअसल, ये अंधकार वन विभाग की उस लापरवाही या कहें पारदर्शिता को छिपाने की प्रवृति का नतीजा, जो वन विभाग राजस्थान की जनता के सामने लाना नहीं चाहता था। इससे पहले हर साल प्रदेश में वन्यजीवों की गणना की जाती थी और हर साल आंकड़े जनता के सामने सार्वजनिक किये जाते थे। वन्यजीवों की घटती या लगातार बढ़ती संख्या सामने होती थी, लोग विचार मंथन किया करते थे, लेकिन विभाग ने 2015 के बाद आंकड़े अब 2018 में जारी किये हैं।

आंकड़ों के मुताबिक, बहुत से वन्यजीवों को लेकर सामने सवालिया खड़ा हुआ है। प्रदेश में बघेरों की संख्या जिस तेजी बढ़ रही थी वो थम गई है। वो इसलिए कि 2015 में प्रदेश में 434 बघेरे थे वो 2016 में बढ़कर 507 हो गए, लेकिन 2017 में उनकी तादाद में यह इजाफा हुआ कि महज़ एक बघेरा बढ़ा। मतलब 2017 की सेंसस रिपोर्ट के मुताबिक 508 बघेरे प्रदेश में हैं, इसका मतलब ये है कि जिस तेजी पहले पैंथर की तादाद बढ़ी, उसी तेजी अब इनकी मृत्युदर भी बढ़ रही है। इस कारण एक साल में महज एक बघेरा बढ़ा, कभी मदारियों के डमरू पर नाचने वाले देसी भालू या कहें रीछ को राजस्थान का फीस रास आ रहा है, राजस्थान में अब भालुओं की संख्या 919 को पार कर गई है।

पहले भालु कभी 400 से भी कम रह गए थे और अब तीनों टाइगर रिजर्व को भी शामिल कर लिया जाए तो भालूओं की तादाद 1500 के भी पार होगी। वहीं किसानों की जान पर जंजाल बनी नीलगाय की तादाद भी थमने का नाम नहीं ले रही है और इनकी तादाद अब बढ़कर गैर संरक्षित इलाकों में ही 80 हजार के आसपास पहुंच गई है। टाइगर रिजर्व समेत ये सवा लाख के पार होगी। प्रदेश में कभी आसानी से पाये जाने वाले भेड़िये अब लगातार घट रहे हैं। दस साल पहले तक जो भेडिये तीन हजार के करीब थे, वो अब सिमट कर 898 तक पहुंचे हैं। वहीं चौसिंघा 532 से घटकर 360 ही रह गए हैं।

पिछले तीन साल में सेंसस रिपोर्ट सामने आने सबसे ज्यादा खामियाजा अगर किसी प्रजाति ने उठाया है, तो वो लंगूर है। क्योंकि लंगूरों की तादाद में अचानक बहुत तेजी से गिरावट आई है और 2015 के मुकाबले इनकी संख्या 23,740 से भयंकर घटकर 2017 में 8,259 पर सिमट गई है। उम्मीद है वन्यजीवों में आई ये भयंकर तब्दीली पर गौर किया जाएगा और वन विभाग इन्हें बचाने की कवायद तेज़ करेगा।

बहरहाल, प्रदेश में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए चलाई जा रही योजनाएं असरदार है या बेअसर है, इसका पता वाइल्ड लाइफ सेंसस रिपोर्ट से पता चल रहा है। कई नई बातें सामने आई हैं। संकटग्रस्त वन्यजीवों की संख्या घट रही है या और मुसीबत बन रहे जीवों की संख्या बढ़ रही है, कई नये वन्यजीव संकटग्रस्त वन्यजीवों श्रेणी में रहे हैं। ऐसे में ये संरक्षण का काम विभाग के अकेले के बस का नहीं रहा है, उम्मीद है कि पूरा प्रदेश इसमें सहयोग करेगा।

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