मौत का पर्याय बनी 'पत्थर की खानें'

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/01/01 06:38

नागौर। गरीबी, मजबूरी और मौत का दूसरा नाम है पत्थर की खानें। जी हां, हम बात कर रहे हैं नागौर जिले के बड़ी खाटू क्षेत्र स्थित पत्थर की खानों की। यहां काम करने वाले मजदूर जवानी में ही बेमौत मारे जा रहे हैं। खाटू में काम करने वाले प्रत्येक परिवार में यही कहानी है, लेकिन बावजूद इसके खान विभाग कतई गंभीर नजर नहीं है।

खानों में सिलिकोसिस बीमारी की वजह से मौत का आंकड़ा एक ही गांव में 80 से ज्यादा हो गया है। कई अभी भी जिंदगी और मौत से जूझ रहे है। अब क्षेत्र की खानों में गतिविधियों पर विराम लग गया है और चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ है। बताया गया कि इन खानों में लगाार काम करने वाला मजदूर 2 साल में मौत का शिकार हो जाता है।

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