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13 साल, 6 आंदोलन, 72 मौतें, अब भी आरक्षण की 'पटरी' पर गुर्जर

13 साल, 6 आंदोलन, 72 मौतें, अब भी आरक्षण की 'पटरी' पर गुर्जर

जयपुर (पवन टेलर)। राजस्थान में गुर्जर समाज एक बार फिर से आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन है और रेलवे के साथ साथ सड़क मार्ग जाम कर धरना—प्रदर्शन कर रहे हैं। गुर्जर आरक्षण का यह​ मसला कोई नया मुद्दा नहीं है, क्योंकि इससे पहले भी गुर्जरों ने आरक्षण के लिए आंदोलन किए हैं। लेकिन इसके करीब 13 सालों के बाद भी गुर्जर एक बार फिर से आरक्षण की 'पटरी' पर बैठे हैं और इन पर चलने वाली ट्रेनें बेपटरी हो गई है। ऐसे में एक बार फिर से उन्हें पटरियों पर आकर गुर्जर एक प्रकार से वापस 13 साल पीछे चले गए हैं। जबकि इतने सालों में 6 बार आंदोलन हुए, जिसमें 5 बार रेलवे ट्रैक रोके गए और 72 लोगों को भी खोना पड़ा।

राजस्थान में गुर्जर समाज ने एक बार फिर से आरक्षण के लिए आंदोलन का रुख अख्तियार किया है। समाज के लोगों ने आंदोलन के लिए फिर वहीं राह चुनी है, जो उन्होंने 13 साल पहले भी किया था। आंदोलन के ट्रैक पर आए गुर्जरों के धरने को लेकर रेलवे के कई मार्ग बाधित है और सड़क मार्ग जाम किए जाने के कारण लोगों को आवागमन में भी परेशानियों को सामना करना पड़ रहा है। खास बात यह है कि आरक्षण के लिए गुर्जर समाज कई सालों से संघर्षरत है। जबकि इसके लिए गुर्जरों ने अब तक 6 बार आंदोलन किया और 5 बार रेलवे ट्रैक को रोका और 72 लोगों की जानें गईं। ऐसे में गुर्जर समाज आज भी उसी ट्रैक पर दिखाई दे रहा है, जहां का उसने पहले भी कई बार रुख किया है।

गुर्जर आरक्षण के लिए आंदोलन की अगुवाई कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला कर रहे हैं, जिनके अनुसार, गुर्जर समाज पिछले 14 सालों से आरक्षण की मांग कर रहा है। बता दें कि आरक्षण के लिए गुर्जर आंदोलन का अपना इतिहास रहा है। गुर्जर आरक्षण को लेकर पहली बार साल 2006 में मांग उठी थी। हालांकि गुर्जर आंदोलन देशभर में सुर्खियों में 2007 में उस वक्त आया, जब आरक्षण का उनका आंदोलन उग्र हो गया था और पुलिस कार्रवाई में 23 मार्च को 26 लोग मारे गए थे।

आंदोलन का यह सिलसिला वहीं नहीं थमा, अगले ही साल 2008 में भी गुर्जर सड़कों पर उतरे और आंदोलन फिर से शुरू हुआ। इस दौरान आंदोलनकारी दौसा से भरतपुर और अलवर तक पटरियों और सड़कों पर बैठ गए। कई जगह पटरियां उखाड़ फेंक दी गई और आंदोलन इतना उग्र हुआ कि कई दिनों तक रेल मार्ग बाधित रहा एवं देश के अन्य हिस्सों से पूरा इलाका कट गया। आंदोलन के दौरान गुर्जरों और पुलिस के बीच कई बार झड़पें भी हुईं, जिनमें एक बार से 38 लोग मारे गए।

गुर्जर के आरक्षण आंदोलन का सिलसिला जारी रहा और साल 2011 में फिर से आंदोलन हुआ। इसके बाद 5 प्रतिशत आरक्षण की मांग पर साल 2015 में फिर से आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें गुर्जर समाज 'करो या मरो' की नीति के साथ सड़कों पर उतर आया। प्रदर्शनकारियों ने जमकर उत्पात मचाया, गाड़ियों में आग लगा दी गई और रास्ते जाम कर दिए गए। फिर से रेल की पटरियां उखाड़ दी गईं और रेलवे ट्रैक पर कब्जा कर आंदोलनकारी वहीं बैठ गए। करीब सप्ताहभर चले आंदोलन के दौरान जमकर तांडव हुआ। 2015 में हुए इस आंदोलन में अकेले रेलवे को करीब 200 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान उठाना पड़ा। राजस्थान मंत्रिमंडल की उप-समिति और राजस्थान गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के बीच समझौता होने के बाद प्रदेश में 17 दिनों तक चला गुर्जर आरक्षण आंदोलन समाप्त हुआ था।

आरक्षण की राह में कानूनी पेंच :
मामले में एक कानूनी पेंच भी है। पूर्व में राज्य सरकार ने गुर्जर सहित पांच जातियों को एसबीसी में 5 फीसदी आरक्षण दिया, लेकिन राजस्थान हाईकोर्ट ने उस पर रोक लगा दी क्योंकि ऐसा करने से प्रदेश में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक हो गया। नियमों के अनुसार, 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश के कहा कि विशेष पिछड़ा वर्ग (गुर्जर, गाड़िया लुहार, बंजारा और रेबारी) को चार प्रतिशत आरक्षण देने के लिए इन जातियों का छह महीने में सर्वे कराया जाएगा। इन जातियों को मौजूदा समय में मिल रहा एक प्रतिशत आरक्षण जारी रहेगा।

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