कर्नाटक में येदियुरप्पा ही क्यों, देश को आखिर मिला जवाब 

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/05/15 02:03

बेंगलुरु। साल 2011 में प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद पद से हटने वाले बी॰ एस॰ येदियुरप्पा के लिए निश्‍चित ही कर्नाटक में कमल खिलाना एक बड़ा करिशमा है। लोग ये सवाल कर सकते हैं कि कर्नाटक में आखिर येदियुरप्पा ही क्यों?, लेकिन अगर आप उनके जीवन के इतिहास पर नजर डाले तो पाएंगे कि प्रदेश की राजनीति में वो इतने अहम क्यों हैं। 

कर्नाटक में येदियुरप्पा हमेशा खास रहे हैं और इसका प्रमाण हमे आज से पहले भी कई बार मिल चुका है। 2013 के उस नजारे को कौन भूल सकता है जब विधानसभा चुनावों में येदियुरप्पा के बीजेपी से हटते ही पार्टी को बड़ा नुकसान हो गया था और पार्टी 112 से सिमटकर मात्र 40 सीटों पर आ गई थी। शायद वो पहला मौका रहा होगा जब बीजेपी को यह बात समझ आया होगा कि येदियुरप्पा के बिना प्रदेश को नहीं जीता जा सकता।

इस बार के चुनाव में उन्हें अपनी पार्टी से जोड़ना और भी अहम बीजेपी के लिए इसलिए भी था क्योंकि पार्टी जान गई थी कि येदियुरप्पा राज्य के सबसे प्रभावशाली और राजनीतिक रूप से सक्रिय लिंगायत समुदाय के एकमात्र नेता हैं और उनके व्यक्तित्व का जादू कुछ ऐसा है कि वो जहां जाते हैं उनके समुदाय के वोट भी उधर ही चले जाते हैं।

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