अपने आप में अनोखी होती है राजस्थान के शेखावाटी की होली

FirstIndia Correspondent Published Date 2019/03/19 02:36

बिसाऊ(झुंझुनू)। शेखावाटी की सांस्कृतिक छटा अत्यन्त अनुपम है। यहां के हर पर्व-त्योहार में लोक जीवन की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यहां के मस्ती भरे लोकोत्सव व उन्हें मनाने का तरीका देशभर में अनुठा है। शेखावाटी अंचल में होली ऐसा लोक पर्व है जो पूरे देश से अलग ही ढंग से मनाया जाता है। उमंग व मस्ती भरे पर्व होली की शुरुआत तब होती है जबकि बसन्त अपने पूर्ण यौवन पर होता है और बांसुरी की मदहोश करती धून, नगाडे और चंग की थाप पर मानव का मन-मयूर नाचने लगता है। धमाल की धूम मच जाती है, गाँव-शहर में चंग की थाप और नगाडों पर फागुन के मस्ती भरे लोकगीत झरने लगते हैं। चारों ओर मस्ती का आलम छाने लगता है। होलीपर विभिन्न रसों के धमाल गीत सुरीले कंठों से फूटते हैं, धमाल के स्वर, नर्तकों के ठुमके व बांसुरी की कर्ण प्रिय धुन, नगाडे की चोट और चंग की थाप, घुँघरूओं की झंकार सभी मिलकर एक ऐसा समा बाँध देते हैं कि दर्शकों पर जादू सा छा जाता है। 

फागोत्सव में अपना विशेष महत्व रखता है। फाल्गुन माह की शुरुआत से ही जहां रसिये व सामाजिक संस्थाऐं फाग उत्सव के आयोजन में सक्रिय हो जाते है वहीं इस वाद्य यंत्र को बनाने वाले परिवार होली के एक महीने पहले से ही इसके निर्माण में जुट जाते हैं। एक परिवार ऐसा भी है जो लोक वाद्य ढप के निर्माण की परंपरा का निर्वहन 90 साल से कर रहा है, इनके द्वारा बनाये गये ढप ना केवल कोलकता, सूरत जयपुर, सीकर, झुन्झुनु अपितु विदेशों में भी खरीदे जाते हैं।   

मस्ती के त्यौहार होली का शेखावाटी अंचल में विशेष महत्व है हंसी ठिठोली के साथ यहां होली पर खेले जाने वाले गिंदड़ व ढप नृत्य की अलग पहचान है । यहां के युवाओं ने मंडल बनाकर इस कला को देश में अनुठी पहचान दी है । नए कलाकारों का कला के प्रति कम होते रुझान के चलते क्षेत्र में हर गली मोहल्ले में होने वाले आयोजनों में कमी आई है लेकिन मंडलों के माध्यम से देश के महानगरों में यहां के फाग के गीत के साथ और धमाल के रंग बरस रहे हैं । चार दशक पहले की बात करें तो होली के 1 माह पहले ही शेखावाटी अंचल के हर कस्बे और गांव में चंग धमाल और गीदड़ शुरू हो जाता था । परंपरा से जुड़ी यह लोक कला भी बदलाव की चपेट में आई ऐसे में धमाल चौराहों से ज्यादा कैसेट के माध्यम से बजाई जा रही है । 

बसंत पंचमी से होता था आगाज 
कस्बे में होली की मस्तियां करीब 1 माह पूर्व बसंत पंचमी से शुरू हो जाती थी कस्बे में करीब 10 स्थानों पर नृत्य और आधा दर्जन स्थानों पर गिंदड़ का आयोजन होता था। दोनों ही नृत्यों में परंपरागत धोती कुर्ता, कुर्ता पायजामा के परंपरागत परीधानों के साथ समांग के तौर पर महिलाओं देवताओं और राक्षसों सहित विभिन्न बनाकर नृत्य की प्रस्तुति देते थे तो सुनने में देखने वाले भी खुद को झुमने से नहीं रोक पाते थे । आज तक यह करम बना हुआ था बांसुरी की मधुर लहरियों तथा ढप व नगाड़े की जोशीली धुनों का क्रम रात्रि के बाद तक चलता था खो गई चुहलबाजिया ढप नृत्य के साथ हंसी मजाक का दौर भी चलता था। जिसमें राहगीरों के पीछे डिब्बा बजाना पटाखे फोड़ना मिमिक्री करना कटक बाजी आदि प्रमुख गतिविधियां थी। बुजुर्गों के अनुसार दो दशक पूर्व तक के दौर में होली के त्यौहार एक माह तक पटक बाजी और छेड़छाड़ के भय से ग्रामीण अंचल के लोग कस्बे में कम ही आते थे साथ ही कस्बे में भी एक मोहल्ले के लोग अकेले दूसरे मोहल्ले में जाने से कतराते थे देश विदेश तक पहुंची चमक परिवर्तन के इस दौर का सकारात्मक पहलू यह है कि पहले शेखावाटी अंचल तक ही सिमटी है । 

कला अब देश विदेश तक पहुंच गई कलाकार प्रतिवर्ष अन्य प्रदेशों तक दूसरे देशों में जाकर प्रवासी राजस्थानी यों के यहां कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। इस दौरान युवा सूरत कोलकाता बेंगलुरु चेन्नई सहित लगभग एक दर्जन बड़े महानगरों में प्रवासियों के बुलावे पर जाकर शेखावाटी की लोक कला संस्कृति को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं । बदलते परिवेश में विदेशों में बैठे शेखावाटी के लोग यूट्यूब या अन्य साइटों के माध्यम से देखकर अपना मनोरंजन करते हैं। 

...अशोक सोनी, बिसाऊ झुंझूनू 

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