खौफ के साये में 'एक मंजिला' गांव, कोई नहीं बनाता दो मंजिला मकान

FirstIndia Correspondent Published Date 2018/12/29 07:00

सरदारशहर (चूरू)। कुछ कहा नहीं जा सकता कि ये डर है या फिर परंपरा, या यूं कहें कि गांव वालों की आस्था, लेकिन इस गांव की यह दास्तां जो भी सुनता है, दंग रह जाता है। एक ओर जहां हमारे देश में बड़ी बड़ी इमारतें बनाने वालों में जैसे होड़ सी लगी रहती है, वहीँ दूसरी ओर चूरू जिले के सरदारशहर में एक गांव उड्सर में लोग आज भी दो मंजिल का मकान बनाने से डरते हैं। ऐसी बात नहीं है कि यहां भूंकप का खतरा रहता है। दरअसल, यहां दूसरी मंजिल पर मकान नहीं बनाने के पीछे एक अजीब सा खौफ है। इस बारे में जब संवाददाता ने पड़ताल की तो गांव की रहस्यमयी सच्चाई सामने आई, जिसे जानकर आप भी दंग रह जाएंगे। 

सबसे पहले इस गांव का इतिहास जान लेते हैं। गांव के रायचंद पारीक ने बताया कि करीब 1309 साल पहले इस गांव को उड़ सारण नाम के व्यक्ति ने अपने नाम पर बसाया था। इस गांव में वर्तमान में तकरीबन 450 के घर हैं और गांव में सदैव ही सौहार्दपूर्ण माहौल बना रहता है। जबकि उड़सर गांव से अलग होकर अब तक 12 गांव बन चुके हैं। उड़सर गांव सरदारशहर तहसील से महज 6 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। फर्स्ट इंडिया ने जब इस पूरे मामले में पडत्रताल की तो एक ही बात सामने आई कि ये पूरा गांव दूसरी मंजिल से भयभीत है। इस गांव के लोग अब दूसरी मंजिल पर मकान बनाने की सोचते तक नहीं है।

700 सालों से नहीं बनते इस गांव में दूसरी मंजिल के म​कान :
गांव के कुछ जानकार लोगों ने बताया कि पिछले 700 सालों से इस गांव में कोई दो मंजिल का मकान नहीं बना है, जिसे यहां की स्थानीय भाषा में मालिया बोलते हैं। गांव के लोग इसके पीछे कई किवदंतियां बताते हैं। गांव वालों का मानना है कि 700 साल पहले भोमिया नाम का व्यक्ति था, जो परम गोभक्त था। पास ही के गांव आसपालसर उनका ससुराल था। भोमिया जी की गायों में गहरी आस्था थी। एक समय गांव में कुछ लुटेरे आए और वह गायों को चुराकर ले जाने लगे। इस पर भोमिया जी का उन लुटेरों से भीषण युद्ध हुआ, जिसमें भोमिया जी बुरी तरह घायल हो गए और घायल अवस्था में  ससुराल में बने मालिये में छुप गये।

उन्होंने ससुराल वालों को बोल दिया कि कोई आये तो बताना मत, लेकिन लुटेरे आये और ससुराल वालों से जब मारपीट की तो ससुराल वालों ने बता दिया कि भोमिया मालिये में छिपा हुआ है। उन लोगों ने भोमिया का सिर धड़ से अलग कर दिया, लेकिन भोमिया सर हाथ में लिए हुए उनसे लड़ता रहा और और लड़ते-लड़ते अपने गांव की सीमा के समीप आ जाता है। इस दौरान भोमिया का लड़का भी युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो जाता है। अंतत: भोमिया का धड़ उड्सर गांव में आकर गिर जाता है, जहां भोमिया का धड़  गिरता है, वहां आज भी भोमिया का मन्दिर बना हुआ है।

इसी दौरान भोमिया की पत्नी गांव वालों को श्राप देती है कि आज से घर पर कोई मालिया नहीं बनाएगा और फिर भोमिया की पत्नी सती हो जाती है। गांव के लोगों का मानना है कि ये श्राप इसलिए दिया गया कि आगे से अगर मालिया नहीं होगा तो किसी पर वो नोबत दोबारा नहीं आएगी, जो भोमिया पर आई थी। अब अगर कहीं छिपाएंगे तो अपनों के बिच ही छिपाएंगे।

गांव के लोगों ने बताया कि उस दिन के बाद जिस किसी ने मालिया बनाया, उस घर की औरत मर गई और एक का तो पूरा परिवार ही खत्म हो गया। इसके बाद डर से लोग आज भी अपने घरों पर दूसरी मंजिल, मतलब मालिया नहीं बनाते हैं। हालांकि इस गांव में कई शिक्षित लोग भी है, लेकिन वो भी इस परंपरा को मानते हैं। उन लोगों का कहना है कि वो लोग इसे अंधविश्वास नहीं मानते हैं, ये वर्षों से चली आ रही परम्परा है, जिसे वो लोग तोड़ना नहीं चाहते।

भोमिया जी का मंदिर आज भी गांव में है और गांव के लोग इस मंदिर में गहरी आस्था रखते हैं। हर दिन इस मंदिर की पूजा की जाती है। इसी प्रकार गांव से 2 किलोमीटर दूर रेतीली धोरों (माटी के टीलों) के बीच माता सती का मंदिर है। माता सती भोमिया जी व अपने बेटे की मौत के बाद सती हो गई थी। माता सती के मंदिर में बांस की झाड़ू चढ़ाई जाती है। इस मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं और मंदिर में आए हुए हर श्रद्धालु की मनोकामना पूरी होती है।

सरदारशहर चूरु से गजेंद्र सिंह की रिपोर्ट

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