KeyNote by Pawan Arora: 20 मिनट में एक रेप केस...! जानिए अभिनेत्री तापसी पन्नू ने SUPER EXCLUSIVE INTERVIEW में क्या कहा?

जयपुरः फर्स्ट इंडिया न्यूज़ के CEO और मैनेजिंग एडिटर पवन अरोड़ा ने फिल्म अभिनेत्री तापसी पन्नू का KeyNote by Pawan Arora कार्यक्रम में SUPER EXCLUSIVE INTERVIEW लिया. जिसमें PR का खेल, बॉलीवुड में नेपोटिज्म का सच सहित कई सटीक सवालों का फिल्म अभिनेत्री तापसी पन्नू ने जवाब दिया. 

सवाल- हम फिल्म की बात कर रहे हैं, डायरेक्टर का नाम अनुभव सिन्हा हो अदाकारा तापसी पन्नू हो, नाम ऐसा रहस्यमय अस्सी हो तो लगता है कि सार्थक या अर्थपूर्ण फिल्म होगी. फिल्म की स्टोरी लाइन और इसका कथानक क्या है ?

जवाब- जब पहले ये नाम रखा गया तो काफी लोगों को कन्फ्यूजन हुआ. हमें भी लगा था कि ये अस्सी क्या है ? कहीं लोगों को ये नहीं लगे कि ये अस्सी घाट है, पंजाबी में भी अस्सी बोलते हैं. तो ये नाम मिस्ट्री क्रिएट करते हैं, मेरे हिसाब से अच्छा ही है. इसलिए पिक्चर का पहला कम्युनिकेशन निकाला गया था. वो पिक्चर के पोस्टर पर चेहरे की जगह हमने लिखा था...Per Day Every Day तो लोगों की समझ में आया कि अस्सी एक अंक है. फिर दूसरा पोस्टर राइटर के बारे में निकाला गया. ये पिक्चर कोंटेंट प्रधान सिनेमा है. जब ट्रेलर लोग देखने लग गए हैं तो उन्हें पता चला कि एक ऑफिशियल डेटा साल में आता है. जिसमें होता है कि हमारे देश में कितने केस रेप के रिपोर्ट हुए हैं. तो उसमें एवरेज निकाला जाए तो 80 एक दिन के हैं. यानि 20 मिनट में एक रेप केस दर्ज होता है. यही हमारी झकझोर देने वाली रियलिटी है. जिसने हमें ये मजबूर कर दिया है कि एक पिक्चर इस पर बनाते हैं. क्योंकि एक समय ऐसा आ गया है कि इतनी वारदातें देखने सुनने और पढ़ने को मिल जाती हैं. अब ये अमूमन सा लगने लग गया है कि ये है. हम इसको मान रहे हैं कि रेप भी तो अमूमन सी बात है. वो एक टाइम पर Normalize होने लग गया था. जब ये कहानी आई तो ऐसा लगा कि हमने क्यों Normalize कर दिया ? 80 का अंक बहुत ज्यादा बड़ा है, इसमें हम क्या कर सकते हैं ? जैसे पुलिस से Expect करते हैं कि वो हमारी सेवा करेंगे, वो तो करेंगे ही. आप अपने लेवल पर क्या कर सकते हैं, वो हमारे आस-पास से हैं. हमने ऐसा कैसे होने दिया वो ऐसे इंसान बनें. कुछ दिन पहले न्यूज आई थी कि 6 साल की बच्ची का रेप 10-11 साल के लड़कों ने कर दिया. हमारी Next Generation किस तरह की आ रही है ? हमने कहां गलत मोड़ ले लिया, हम दूसरे को ब्लेम कर रहे हैं, आप क्या कर रहे हैं ?

सवाल- मैंने आपकी फिल्म का ट्रेलर देखा, तो मुझे समझ आया कि ये एक रेप विक्टिम की कहानी है, जिसमें आप एक एडवोकेट हैं. और बाकी सब बातों के अलावा समाज ने जो ऐसे मामलों में चुप्पी साध रखी है. उसको भी आपने कटघरे में खड़ा किया है ? 

जवाब- जी बिल्कुल, पिक्चर का दृष्टिकोण बहुत सामाजिक है. जज की सीट पर एक जज की जगह समाज बैठेगा, ऑडियंस वो जज होगी. और बहुत डिफरेंस होता है एक जजमेंट में और जस्टिस में जजमेंट जज का काम है वो दलीलें सुनके फैसला देगा. लेकिन, जस्टिस वो कोर्ट से बाहर होती है, वो हम सब करते हैं. तो वो मुझे लगे कि ये फिल्म से कि हमने जस्टिस की क्या इन विक्टिम के साथ ? तो वो हमें क्वेचशन करना चाहिए, ये पिक्चर आपको उस दिशा में लेकर जाएगी. ये हमसे बात करेगी कि ये सब हमने होने क्यूं दिया इन सबके साथ तो ये उस बारे में है पिक्चर. 

सवाल- अभी जो नाम की बात कर रहे थे, तो जैसा आपने बताया कि अस्सी तो फिगर बता रहा है. लेकिन अंक ना भी बताएं तो भी चर्चा के लिए अच्छा है. क्योंकि जो अस्सी घाट वहां पर सभी तरह की चर्चा होती है. धर्म पर, कानून पर हो, न्याय या फिर सत्ता पर हो ? और उस बहस से कुछ ना कुछ समाधान निकल कर आता है मेरे ख्याल ये एक सहयोग अच्छा है.

जवाब- अनुभव सर के प्रोडक्शन का नाम भी बनारस है. तो उनको तभी ये डर था कि कहीं लोग अस्सी से वो बनारस तो नहीं समझेंगे. लेकिन एक बार ट्रेलर देख लेंगे तो समझ में आ जाएगा. मुझे लगता है कि जनता में इतनी तो बुद्धि है कि वो समझ लेंगे. वैल्यू समझेंगे इस तरह की फिल्म को देखने की. 

सवाल- तो ये इतने गंभीर विषय को लेकर ये फिल्म बनाई है. और आपके बारे में ये फेमस है कि आप बहुत इंटेंसिटी से अपने किरदार को जीती हैं. तो क्या कुछ ऐसा भी इस फिल्म को करने के बाद भी कोई सीन या घटना आपके जहन में रह गई. जिसको आप अभी भी नहीं भुला पाई हों.

जवाब- एक तो मैं दिल्ली से आती हूं. और 2016 में मैंने फिल्म की थी पिंक, जो कंसेंट के बारे में थी. एक दिल्ली की लड़की तो वैसे ही सारी जिंदगी इसी भय में बड़ी होती है कि कोई देख तो नहीं रहा, कोई पीछे तो नहीं है, आगे तो नहीं है, साइड में तो नहीं है. तो हम तो बड़े ही उस डर में होते हैं, तो मेरे लिए तो आप समझ लीजिए. कि इस तरीके के इश्यूज को रखना रोज की बात है. लेकिन, ये जो पिक्चर है इस फिल्म में मेरा किरदार इतना चैलेंजिंग इसलिए था. कि इसमें विक्टिम या सर्वाइवल का रोल प्ले नहीं कर रही थी. तो एक्टर के लिए तो मैंने कई फिल्में की हैं कि आपके साथ कुछ हुआ होता है. ऑडियंस के साथ कनेक्ट करना आसान रहता है, लेकिन इसमें मेरे साथ नहीं हुआ है. और मैं पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के तौर पर उसका केस लड़ती हूं. उसमें उस एक्टर के लिए ये चैलेंजिंग है कि मैं ऑडियंस को अपने साथ कैसे जोड़ूं. क्योंकि मेरे साथ नहीं हुआ है, तो वो आसानी से मेरे साथ जुड़ेंगी नहीं. वो एक चैलेंज था मेरे लिए, देखते हैं कि किस हद तक सफल हुई हूं इस फिल्म के बाद. मेरे पास वो सपोर्ट नहीं है, अब मेरे साथ ना होने के बावजूद मुझे ऑडियंस सिंपैथी चाहिए, वो देखते हैं.

सवाल-  जो दर्शक हॉल में जाएगा, वो मन में क्या सवाल लेकर आएगा ? क्या वो भी कुछ ना कुछ अपना रोल समझेगा कि मुझे क्या करना है ?

जवाब-  मुझे इतनी उम्मीद है कि जब दर्शक इस फिल्म को देखकर निकलेंगे. तो वो कुछ चर्चा करेंगे घर जाकर कि हमने कहां ये गलत मोड़ ले लिया ? हम कुछ कर सकते थे क्या जो हमने नहीं किया ? वो एक थोड़ी सी चर्चा भी हो गई ना एक बार सिनेमा हॉल से निकलने के बाद चाहे वो 2 मिनट की हो, वो भी बहुत बड़ी सफलता होगी हमारे लिए. क्योंकि आपने एक बार हमारे लिए सोचा तो सही. सोचना शायद कुछ भी करने की पहली स्टेज होती है. वो हमने करवा दिया तो हम अपने आप को सफल मान लेंगे.

सवाल-  अच्छा जब ये बॉलीवुड की बात है, सिनेमा की बात है. तो सबके मन में होता है कि सिनेमा हॉल जाएंगे. तो कोई ऐसी मूवी होगी, जिससे या तो बहुत ज्यादा एंटरटेनमेंट होगा, कॉमेडी होगी. या स्विटजलैंड देख रहे होंगे हम बैठे-बैठे, तो इस फिल्म को देखने मैं थियेटर में क्यों जाऊं? 

जवाब-  आप रोज तो दाल-चावल नहीं खा सकते या रोज तो आप कचौरी नहीं खाएंगे. मिठाई भी नहीं खा सकते, रोज पिज्जा-बर्गर नहीं खा सकते. कभी-कभी तो दाल-चावल खाना पड़ता है. तो सिनेमा की भी वैरायटी है, हमारे सिनेमा की ब्यूटी ही ये है कि इसमें बहुत सारे जोनर्स हैं. आप वो फिल्म देखिए जिसका ट्रेलर लगता है कि यार ये देखते हैं. मैं ये कभी नहीं कहूंगी की मेरी फिल्म है तो आप देखिए. हालांकि एक अभिनेता चाहता है कि स्टार की पदवी मुझे मिले. मैं चाहूंगी कि लोग मेरा नाम देखकर जाएं फिल्म देखने. लेकिन मैं इतना रिक्वेस्ट करती हूं कि आप मेरा ट्रेलर देखिए. एक फेयर चांस दीजिए, अगर आपको ट्रेलर पसंद आया तो मुझे मौका दीजिए.

सवाल- इस फिल्म में आपकी लड़ाई किससे है समाज से, कानून से ? व्यवस्था से या समाज की चुप्पी से किसके प्रति आपका आक्रोश है ?

जवाब-  मुझे लगता है कि हर समाज में Majority लोग अच्छे होते हैं. मेरा ये मानना है कि ज्यादातर लोग अच्छे होते हैं. थोड़े से ही लोग होते हैं, जो गलत होते या खराब होते हैं. लेकिन प्रॉब्लम ये होती है, ये नहीं है कि वो जो गलत लोग हैं वो जो चीजें कर रहे हैं. प्रॉब्लम ये है कि जो अच्छे लोग हैं वो चुप हैं. हर चीज को लेकर ये सच्चाई खरी उतरती है. चाहे वो इस फिल्म को लेकर हो या फिर सामान्य किसी भी मुद्दे को लेकर हो, अच्छे लोग और अच्छी सोच रखने वाले हमेशा ज्यादा होते हैं मेरा ये मानना है. लेकिन वो बोलना या कुछ करना उसके बारे में जरूरत महसूस नहीं करते कि कौन करे, नहीं-नहीं मुझे नहीं करना मेरे घर में तो नहीं हो रहा है ना मैं क्या करूं, मैं नहीं कुछ कर सकता.

सवाल- अभी तो देश में महिलाओं की शिक्षा अच्छी हुई है. देश विकास की तरफ भी जा रहा है, लोगों में भी पहले से ज्यादा जागरूकता आई है. सोशल मीडिया भी है, मैसेज भी है. तो इस तरह के अपराधों के लिए किस चीज को ज्यादा जिम्मेदार मानती हैं ? कोई मनोवृत्ति होती है इस तरह की साइक्लोजिकल इश्यूज होते हैं, या क्या है ? इसके पीछे फिल्म के दौरान इसके बारे में बहुत चर्चा हुई होगी. तो क्या चीज रिस्पॉन्सिबल है इस तरह की घटनाओं के पीछे ?

जवाब-  हर जो अपराधी होता है इस तरीके का वो सेम कारणवश ये अपराध नहीं करता. हर एक का अपना अपना कोई बैकग्राउंड रिस्पॉन्सिबल होता है. कोई आपकी अवैयरनेस रिस्पॉन्सिबल होती है. कोई मानसिक संतुलन ही हिला हुआ है ये रिस्पॉन्सिबल होता है. हर एक का एक तरीके से मापदंड नहीं हो सकता हर एक चीज का लेकिन हो तो हमारे आसपास रहा है या तो हमारे आसपास के लोग कर रहे हैं. या हमारे आसपास के लोग होने दे रहे हैं दोनों लोग रिस्पॉन्सिबल हैं इस चीज के ठीक है आप ये कह सकते हैं कि हमारे घर वाले में से तो किसी ने ऐसा नहीं किया. लेकिन आपके घर के किसी भी इंसान के आसपास ये हुआ और आंख मूंद ली या फिर ज्यादा कुछ जानने की जरूरत नहीं की वो भी शायद गलत है. क्योंकि वो शायद करते तो ये चीज रोकी जा सकती थी या आगे ना बढ़ती. तो समाज के नाते हम सब रिस्पॉन्सिबल हैं. किसी तरह की हमारी अपब्रिंगिंग में कुछ कमी रह गई है हम सबकी. 

सवाल- तो उसमें सुधार कैसे ला सकते हैं ? क्या कोई अपब्रिंगिंग की बात हो सकती है ? जैसे गुड टच, बैड टच की ट्रेनिंग देते हैं बच्चों को वो हो सकती है ? या और क्या ऐसे कारगर उपाय हो सकते हैं ? या कोई ऐसा उपाय हो जो अपराधियों को कड़ी सजा दी जाए. न्याय जल्दी मिले आपका खुद का तापसी का क्या व्यू है इस पर ?

जवाब- मेरा पर्सनल व्यू ये है कि हम डवलपिंग कंट्री हैं. हम उस दौड़ भाग के अंदर हैं कि सफल होना है, आगे बढ़ना है. बस पैसे कमाने हैं, हमे अपना कारोबार बढ़ाना है. हमारे लड़कों से ये उम्मीद है कि खुद कमाकर आगे बढ़ना ही बढ़ना है. उन पर रिस्पॉन्सिबिलिटी इस तरह की ला दी जाती है कि तुम आदमी हो तुम्हें इस तरीके से रहना है और ये करना है. मतलब वो जो हसल है हमारी लाइफ का वो इतना ज्यादा है कि जिसकी वजह है हम एक बेसिक ह्यूमन नैचर की लर्निंग होती है. कि आप इंसानियत जो होती है वो हम सिखाना भूल चुके हैं. एक दूसरे के प्रति प्यार, रिस्पैक्ट भूल गए हम सिखाना.

सवाल- आपका जो बेबाक अंदाज है कई बार आप अपने जो कमेंट होते हैं. उसकी वजह से चर्चाओं में रहते हो, और एक बात जो मैं पर्सनली कह सकता हूं. कि आप हिप्पोक्रेट नहीं हो, मैंने एक इंटरव्यू सुना था आपका उसमें आपने कहा था कि मैं वो रोल करती हूं, जो जनता मुझसे चाहती है. मैं वो रोल नहीं करती जो तापसी खुद चाहती है. तो आपको नहीं लगता कि आपकी बहुत सी फिल्मों में आपके कोर्ट रूम सीन्स और एडवोकेट वॉइज जोनर हो गया है पिंक कहिए, बदला कहिए, थप्पड़ कहिए. तो ये फिल्म कैसे डिफरेंट कि दर्शकों को कैसे नयापन लगेगा ?

जवाब- 'देखिए मुद्दे अलग हैं...पहले तो पिंक कंसेंट का इश्यू था. ये रेप का इश्यू है, काफी फर्क है शायद लड़कियों को ज्यादा पता होगा. और जहां तक कैरेक्टर की बात हो पिंक में हो या मुल्क में मेरे साथ हुए थे इश्यूज जैसे मैंने आपको पहले बताया, तो वो पर्सनल हो जाता है. इसमें मैं किसी और के लिए लड़ रही हूं, AS A LAWYER और समाज से बात कर रही हूं. जज से बात नहीं कर रही, इसमें मैं जनता को एड्रेस कर रही हूं. वो देखेंगे तो पता लगेगा कि क्या इसमें कुछ अलग है ? हां एक चीज सब में कॉमन है, जो किसी चीज को लेकर स्टैंड लेता है. जो चुप होकर नहीं रहता है, चलता है वाला एटिट्यूड नहीं होता मेरे ज्यादातर किरदारों में इसलिए शायद लग सकता है लोगों को कि यार इसमें भी खड़ी थी. उसमें भी खड़ी थी, मैं ये सोच रही हूं कि हीरो से तो कोई क्वेशचन नहीं करता. कि यार तू उसमें भी लड़ रहा था, इसमें भी लड़ रहा है. उसमें कभी मां को बचा रहा है तो कभी बहन को बचा रहा है. मैं तो कम से कम अलग अलग कहानियां तो लेकर आ रही हूं.

सवाल- तो मतलब टाइप्ड होने का कोई चक्कर नहीं है. आप सोचते हो कि इश्यू बेस्ड होना चाहिए ?

जवाब- 'मुझे ज्यादा मिलती हैं, अब मैं तो उसी में से चूज कर सकती हूं कि मेरे पास जो आता है, ऐसा हो ही गया मेरी पिक्चरों से साथ कि मुझे इश्यू वाली फिल्में ज्यादा आती हैं, मैं कई फिल्मों के लिए तो मना कर देती हूं. 20 पिक्चरों में से एक में लगता है कि इसमें कुछ नया कर सकते हैं.

सवाल- तो इसलिए जो लोग हैं वो बिना किसी औपरिकता घोषणा के आपको वीमन एम्पावरमेंट का ब्रेंड एंबेसेडर मान लेते हैं कि तापसी खड़ी हैं ?

जवाब- ये बुरा नहीं है, हां बहुत अच्छा है. कितने एक्टर्स आते जाते हैं, जिनका कोई रेलेवेंस नहीं होता. उनको किसी नाम या किसी तरीके से जाना नहीं जाता सालों बाद I'm glad कि मैंने कुछ तो इमेज मैंने कमाई.  

सवाल- आपने शादी कर रखी है बहुत ही गुप्त रखा और लोगों को पता भी नहीं होगा कि आपकी शादी किससे हुई है ? तो डेनमार्क के एक सफल बैडमिंटन प्लेयर हैं उनसे आपकी शादी हुई. तो अब आपका ये जो फिल्में करना है उसमें पतिदेव का कोई दखल या कोई ऑब्जर्वेशन.

जवाब- पति देव तो अब यहां रहते हैं, उनकी विदाई हो चुकी है डेनमार्क से

सवाल-16. तो बड़े लंबे समय 9 साल तक आपकी कोर्टशिप चली

जवाब- 'वास्तव में तो 10 हो गए हैं, शादी करने से पहले 10. अब हो गए शायद 2013 से हम साथ हैं तो आज 13 साल हो गए. मैं फिल्म इंडस्ट्री में आई थी तो तब से उनको जानती हूं.

सवाल- आपको क्या लगता है लव मैरिज ज्यादा प्रीफर्ड है या अरेंज मैरिज ?

जवाब- बस आपको कोई इंसान ठीक-ठाक सा मिल जाए वो ही बड़ी बात है. जैसे ही आपकी फ्रीक्वेंसी मैच होती है.

सवाल- मैं जिस संदर्भ में कह रहा हूं उसमें थोड़ा सा अंतर होता है, इंडियन कंटेक्ट में वो इसलिए कि अगर लव मैरिज है तो हो सकता है वो इंटरकास्ट भी होगी. डाउरी फ्री भी होगी, हो सकता है वो बाकी अटैचमेंट्स भी उसमें नहीं होंगे. हो सकता है वो ठीक-ठाक सा होगा, अरैंज मैरिज में आजकल इतनी हाई बजट मैरिजेज होती हैं.

जवाब- सर लव मैरिज में भी कई तरह की प्रॉब्लम्स आतीं हैं. इंसान इंसान है पेड़ थोड़ी ना है, वो बदल जाता है. तो ऐसी भी देखी हैं अपने आस-पास भी, तो ये कोई गारंटी नहीं है. कि लव मैरिज में कोई 100 परसेंट सक्सेस रेट होगा. अरेंज मैरिज में कोई फेलियर नहीं होगा, इसकी भी गारंटी नहीं होती. बात ये होती है कि आपको खुद नहीं मिला तो मां-बाप ढूंढ देते हैं. तो वो हमारा इन हाउस मैट्रोमोनियल सिस्टम सदियों से चला आ रहा है. एक चीज जरूरी है कि आप देख लें कि डिपेंडेंसी का रिलेशन नहीं होना चाहिए. आप उस इंसान की प्रजेंस के बिना भी अपनी लाइफ व्यतीत कर सकते हों. तभी शादी करना, इतने साल हो गए हमें साथ रहते हुए. हम दोनों के बीच कोई भी फाइनेंशियल ट्राजेंक्शन एक के अकाउंट से दूसरे के अकाउंट में नहीं गया. अब सिर्फ जब प्रॉपर्टी साथ में लेते हैं तो कॉन्ट्रीब्यूशन हो जाता है. आज तक एक-दूसरे को पैसे नहीं दिए. इसी तरह का इंसान शायद ढूंढा उसने भी और मैंने भी, लड़कियों को मेरी ये राय होती है.

सवाल- किसी औरत की मजबूरी में, उसके फाइनेंशियल इंडिपेंडेंट होने को भी बड़ी बात मानते हैं.

जवाब- बिल्कुल 100 पर्सेंट, जब तक कोई लड़की फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट नहीं है. तो शादी मत करना, किसी पर डिपेंडेंट मत होना.

सवाल-20. बहुत अच्छा मैसेज दिया आपने तो  आपके पति देव तो डेनमार्क से इंडिया आगे तो मैंने सुना है. आपने बैडमिंटन टीम भी खरीदी है और वेडिंग इवेंट कंपनी भी आप चलाते हैं. तो क्या यह फाइनेंशली इंडिपेंडेंट होने की तरफ कदम हैं ? 

जवाब- वो वेडिंग प्लानिंग कंपनी तो मैं अपनी सिस्टर के साथ शुरू की है. वो चलाती हैं और मैंने उसमें इनवेस्टमेंट की है तो मैं उसमें को-ऑनर हूं. और लेकिन एक आईडिया था कि एक ऐसा बिजनेस शुरू करूं कि जो रिसेशन में न जाएं. वो शादियां हैं और भारत की तरफ मेरा झुकाव काफी सालों से रहा है. जब मुझे मौका मिला तो मैंने फायदा उठा लिया, क्रिकेट तो बहुत महंगा है और इतने पैसे नहीं है मेरे पास.

सवाल- राजस्थान में तो आप काफी समय से हैं शायद. 

जवाब- मैं करीब महीने से राजस्थान में हूं. मंडावा, झुंझुनं, सीकर काफी बार मैंने क्रॉस किए हैं.

सवाल- उस फिल्म में एक बुलेट मोटर साइकिल चलाते हुए आपका सीन काफी पॉपुलर हुआ था.

जवाब- वो पिक्चर का टाइटल डिसाइड नहीं हुआ है. ऑफिशियल अनाउंसमेंट नहीं हुआ है तो ज्यादा डिटेल तो नहीं दे पाऊंगी. लेकिन हां पूरी फिल्म हमने राजस्थान में शूट की है.

सवाल- यहां का आर्किटेक्चर, हवेलियां वो सब फिल्मों के हिसाब से हैं ?

जवाब- जी बिल्कुल, बहुत सुंदर जगह है. तभी तो बार-बार मन करता है आने का तो लगता है आ ही जाओ. कुछ ना कुछ अच्छा देखने को मिलेगा. 

सवाल- फिल्मों में मर्जी से आए या किस्मत ले आई ?

जवाब- किस्मत ले आई.

सवाल- आप तो सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे.

जवाब- जी मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी बोल सकते हैं. भूल गए कोडिंग करना, अब तो 15 साल हो गए. लेकिन, मेरा इंफोसिस का अपॉइंटमेंट लेटर संभाल कर रखा है.

सवाल- सुना है एप्पल के लिए भी आपने बनाई थी ?

जवाब- नहीं एप्पल के लिए नहीं, मेरा फाइनल ईयर का जो प्रोजेक्ट सबमिशन था. तो उसमें मैंने ऑब्जेक्टिव सी में कोडिंग करके एक एप बनाई थी. जो उस समय में काफी लिमिटेड एप्स थीं, एप स्टोर पर बहुत लिमिटेड लोग थे. जो कर सकते थे कोडिंग, तो मैंने अपने दो और दोस्तों के साथ हमने ये प्रोजेक्ट सबमिशन किया था एक एप का.

सवाल- शुरू में आपने मॉडलिंग भी की. 

जवाब- जी वो पॉकेटमनी के लिए, क्योंकि घरवाले पॉकेटमनी नहीं देते थे. तो मैंने सोचा कि अब खुद कमाना पड़ेगा, इसलिए.

सवाल- जब फिल्में शुरू कीं, तो आपने दक्षिण भारत की फिल्मों से शुरू किया तो मेन स्ट्रीम सिनेमा में कब तक मेन स्ट्रीम यानि बॉलीवुड ?

जवाब- उधर मेन स्ट्रीम फिल्मों में ही मैं काम कर रही थी. बॉलीवुड इसलिए कि एक तो वहां मैंने कोशिश भी नहीं की आने की. और जो ऑफर आ रहे थे, वो साउथ के काफी बड़े नामों के ऑफर्स थे मेरे पास. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री कोई ऑफर नहीं था और जो आ रहे थे वो बिल्कुल न्यू कमर वाले लोग थे. जिनका मैंने कभी नाम ही नहीं सुना, तो इसलिए इंसान वहां ट्राई करने नहीं जाएगा. यहां मुझे लगा कि इन लोगों ने इतनी अच्छी फिल्में बना रखीं हैं इनसे कुछ सीखने को मिलेगा. हालांकि मैंने इतना लंबा करियर इमेजिन नहीं किया था. मैंने सोचा था एक साल दो साल कुछ नया सीख लेंगे. फिर आकर MBA कर लेंगे, तो फिर भगवान ने डिसाइड किया तो कुछ और बन गए.

सवाल- आपने अपनी मेहनत से, अपने स्ट्रगल से, अपने बलबूते पर अपनी जगह बनाई. तो कई बार कहते हैं कि बॉलीवुड में कोई गॉडफादर नहीं हो तब तक आप आगे नहीं बढ़ सकते तो कितनी सच्चाई लगती है आपको इस बात में ? 

जवाब-  देखिए ये नहीं कहूंगी कि आगे नहीं बढ़ पाएंगे. बढ़ तो जाएंगे समय ज्यादा लगेगा, थोड़ी मेहनत ज्यादा लगेगी, थोड़ी लड़ाई ज्यादा लगेगी. अगर हिम्मत रही तो आगे बढ़ जाओगे और अगर थकोगे नहीं जल्दी तो आगे बढ़ोगे. गॉड फादर होने से थोड़ा आसान हो जाता है. आपको आगे आने वाली फिल्म का डर नहीं रहता है कि पता नहीं मिलेगी या नहीं मिलेगी. अगर एक फ्लॉप हो गई तो पता नहीं कोई आएगा या नहीं आएगा देने तो वो डर खत्म हो जाता है. अगर वो डर खत्म हो जाता है तो उसके बाद आप बेबाकी से पिक्चर्स कर सकते हो, वो डिफरेंस रहता है.

सवाल- तो इतनी फिल्म आपने कर ली, सब नामी गिरामी डायरेक्टर्स के साथ आपने काम कर लिया अभी भी कोई ऐसा ड्रीम रोल लगता है जो तापसी को करना बाकी रह गया है अभी?

जवाब-  मेरा तो मन था कि इंडिया का एक बहुत बड़ा सुपरहीरो प्रोजेक्ट बनना चाहिए एवेंजर्स की तरह जिसमें मुझे एक इंडियन स्टाइल ऑफ सुपर वुमन कैरेक्टर निभाना चाहिए, तो वैसे कुछ बनना चाहिए जितना पैसा वो फिल्म में लगाते हैं हम उतना इमेजिन नहीं कर सकते अभी तो शायद दिल्ली दूर है. उसके अलावा तो अभी नहीं तो कुछ टाइम बाद मुझे लगता है मुझे मिल ही जाएंगे. अगर नहीं मिले तो मैं बनवा लूंगी, क्योंकि मैंने आज तक देख लिया. वेट करने से या ये एक्सपेक्ट करने से कि कोई मुझे काम देगा. इस तरीके के रोल मेरे को नहीं मिलेंगे इतनी आसानी से तो कई बार मुझे लगता है कि मुझे करना है मुझे कोई स्टोरी दिख गई. अच्छी या कोई किरदार दिख गया है अच्छा तो मैं वो करवा लेती हूं फिर क्यों कि मैं नहीं करूंगी खुद के लिए तो और कौन करेगा ?  मतलब हाथ पैर मारना पड़ता है थोड़ा सा थोड़ी ज्यादा लड़ाई है लेकिन हिम्मत रखो तो हो जाएगा.

सवाल-  'एक जमाना था कि जब मॉडलिंग को और फिल्मों में काम करने को इतना अच्छा नहीं मानते थे, घरवाले भी मना करते थे. खासतौर पर लड़कियों के लिए खास तौर पर उनका जाना. अब तो बहुत अपॉर्चुनिटीज हैं,  OTT प्लेटफॉर्म आ गए हैं. फिल्में भी हैं मॉडलिंग के बहुत बड़े प्लेटफॉर्म आ गए हैं. तो जो नए बच्चे भाग भागकर बॉम्बे जाते हैं. उनके बारे में आप क्या मैसेज देना चाहती हैं, उनको क्या कहना चाहती हैं दिल की बात ? जिससे वो परेशान न हो कष्ट नहीं पाएं 

जवाब-  तब भी मैं कहती थी जब मैं नई नई थी. अब भी कहती हूं कि प्लान B रेडी रखो. मेरा तो प्लान B,C,D कुछ भी नहीं था. मेरे तो प्लान सारे A से लेकर Z तक कोई ना कोई पढ़ाई या जॉब से रिलेटेड थे. अगर मेरे पास मेरी इंजीनियरिंग की डिग्री नहीं होती और ये कॉन्फिडेंस नहीं होता कि मेरे पास एक बार में इंफोसिस की नौकरी मिल सकती है मुझे दोबारा मिल सकती है, मुझे ये कॉन्फिडेंस नहीं होता तो मैं इतनी बेबाकी से पिक्चरें सलेक्ट नहीं कर पाती. इतने बड़े-बड़े रिस्क नहीं ले पाती, तो वो जो सैंस ऑफ सिक्योरिटी है. वो इसलिए मिली कि मेरे पास एक एजुकेशन क्वालिफिकेशन थी. मेरे पास कॉन्फिडेंस था, मैं सबको बोलती हूं कि मेहनत रंग लाती है. But luck is a very very big factor- मैं झूठ नहीं बोलूंगी किसी को भी मुझसे बहुत ज्यादा टैलेंटेड लोग ऐसे हैं. जिनको सही समय पर सही मौका नहीं मिला, इसलिए सिर्फ टैलेंट यहां पर काम नहीं करता.

सवाल- अभी आपने कहा था कि हीरो को तो कोई नहीं पूछता कि तूने कल भी मारा था आज भी मारा है. ऐसे ही आपने एक बयान दिया था कि बॉलीवुड में हीरो और हीरोइन की काफी असमानता चलती है. उनके मान सम्मान में भी चलती है, तो ये क्या है इसके बारे में थोड़ा खुलकर बताएं ?

जवाब- 'सिर्फ हमारी इंडस्ट्री में ही नहीं मुझे लगता है कि हॉलीवुड में भी और अन्य इंडस्ट्री में भी ये जो पलड़ा एक साइड का भारी और एक साइड का हल्का वाला हिसाब चल ही रहा है. हमारी इंडस्ट्री चाहे अमेरिका की इंडस्ट्री सब में प्रॉब्लम है ही. हमारी रिम्यूनरेशन डिसाइड होती है इस पर कि बॉक्स ऑफ कलेक्शन कैसा चल रहा है ? ओपनिंग नंबर कैसा चल रहा है किसी एक्टर का कितनी बड़ी भी हिरोइन हो उसकी फिल्म सिंगल डिजिट पर ही खुलती है. बहुत कभी 10,11,12 पर खुल गया हो जब कोई बड़ा डायरेक्टर हो साथ में बहुत स्ट्रगल है बहुत ज्यादा मुश्किल है. अगर आप ठीक-ठाक सी फिल्म बना लो तो 100 तक तो हो ही जाता है. बहुत खराब है तो आप कुछ नहीं कर सकते उसका लेकिन यहां पर क्या होता है कि लड़की की फिल्म जब तक 100% सुपर फिल्म नहीं होती. तब तक उसका नंबर कलेक्शन और ऑपनिंग नंबर नहीं लगता हम लोगों का सबसे बड़ी प्रॉब्लम ये है क्योंकि स्टार की रिम्यूनरेशन इस हिसाब से डिसाइड होती है. कि कितनी लोग आपकी पिक्चर क्यों की, आप हैं पिक्चर में इसलिए देखने जाते हैं. ज्यादार हीरो की फिक्चर के लिए एडवांस बुकिंग बहुत ज्यादा होती है. अरे इस हीरो की पिक्चर आ रही है शाहरूख, सलमान सर की फिक्चर आ रही है हम तो देखेंगे ही देखेंगे. वो ओपनिंग फिगर लग जाती है, हम लोगों की ऑपनिंग फिगर नहीं लगती है. हम लोगों का ऐसा नहीं होता, तुमने देखा क्या रिव्यू ?तुमने देखी क्या पिक्चर तो ही मैं जाऊंगी, वो सब देखने के बाद हमारी कलेक्शन होती है. मैं आपको एक उदाहरण देती हूं एक पिक्चर का मेरी पिक्चर आई थी काफी साल पहले दिवाली पर रिलिज हुई थी. सांड की आंख' नाम था पिक्चर का ये पिक्चर 2 और फिल्म के साथ रिलीज हुई थी. हम लोगों को हमारी फिल्म  'सांड की आंख' को सबसे कम स्क्रीन मिले थे. सबसे कम शो मिले थे और हमारी पिक्चर खुली थी 50 लाख में और फाइनल कलेक्शन उस फिक्चर का कुछ 21 या 24 करोड़ था. वो पिक्चर का आप सोचिए कितना मोमेंटम उसने खींचा होगा. अगर आपने हमे स्टार्टिंग में स्क्रीन दे दी होती तो कितना होता ? लेकिन हमें वेट करना पड़ा, तो इस वजह से हमारे साथ थोड़ा सा अनफेयर हो जाता है. टाइम लगेगा ठीक होने में ये ही चीज कई बार क्रिकेट टीम के बार में भी कहते हैं. थोड़ा सा भेदभाव अभी भी बाकी है. ऑनेस्टली बोलूं तो अपने लाइफटाइम में ठप लग रहा है इक्वालिटी देखना. लेकिन अगर हमने छोड़ दिया काम करना उस दिशा में तो आने वाली जनरेशन भी नहीं देखेगी. तो मेरे लिए ये मॉटिवेशन काफी है कि अभी नहीं पर आगे आने वाली जनरेशन तो इक्वालिटी देख सकती है. इस वहज से चलते चलो कहां तक जाता है.  

सवाल- फिटनेस आपकी इतनी कैसे मेंटेन होती है ? जो वो पिक्चर सूरमा हमने देखी थी, तो आप हॉकी प्लेयर बन गईं. कभी कुछ तो इतनी फिटनेस कैसे रख पातीं हो और जनरल एक होता है. जिम रूटीन या डाइट वो नहीं एक कुछ और हटकर बताएं सबको ?

जवाब- मुझे खाना खाना बहुत पसंद है. मैंने ये डिस्कवर किया है मेरे बारे में कि अगर खाना खाते रहना है. तो बिना सोचे कि इसमें कितनी कैलेरिज है, तो फिर वर्कआउट करते रहे साथ-साथ में. कुछ भी करो मैं खेलती हूं, जिम जाना पड़ता है और मैं योगा करती हूं. मैं एरियल योगा करती हूं, पता नहीं लोगों को पता है कि नहीं एरियल योगा क्या होता है ? एक कपड़ा लगा होता है सिलिंग से, योगा पोज होते हैं सारे लेकिन वो हवा में एक कपड़े के ऊपर होते हैं, वो रिंग से करती हैं मैं कपड़े से करती हूं. तो मैं ये 2-3 अलग-अलग तरह की चीजे करती रहती हूं अपनी फिटनेस के लिए जिम बहुत बोरिंग हो जाता है रोज करना लेकिन मेरी मॉटिवेशन एक ही कि मुझे खाना खाना है. मुझे सोचना ना पड़े खाना खाने से पहले कि यार अब ये खाया ना तो मोटी हो जाऊंगी. या ये खाया तो मेरी स्किन खराब हो जाएगी तो मुझे ये सोचना नहीं है. इसलिए मैं वर्कआउट करतीं हूं. 

सवाल- तो क्या रखना होता है आइडियल वेट आपका ?

जवाब- मैं अपना वेट बताऊंगी तो आप शॉक्ड हो जाएंगे. मेरा वेट इतना कम नहीं है, मैं अभी इस हालात में आपको जो दिख रहीं हूं 60-62  के बीच में रहती हूं. मेरा मिनिमम वेट आज तक जो गया है मैं सही बताऊं तो 56 मतलब जब मैं एकदम स्किन एंड बोन्स हो गई थी. मतलब एकदम अन हेल्दी था वो, नहीं मैं कहना चाहूंगी मेरे में मसल मांस बहुत है.