KeyNote by Pawan Arora: रिटायरमेंट के बाद कैसे मिली चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी ? जानिए राज्य निर्वाचन आयोग के आयुक्त राजेश्वर सिंह ने SUPER EXCLUSIVE INTERVIEW में क्या कहा ?

जयपुरः फर्स्ट इंडिया न्यूज़ के CEO और मैनेजिंग एडिटर पवन अरोड़ा ने राज्य निर्वाचन आयोग के आयुक्त राजेश्वर सिंह का KeyNote by Pawan Arora कार्यक्रम में SUPER EXCLUSIVE INTERVIEW लिया. जिसमें सटीक सवालों का राजेश्वर सिंह ने जवाब दिया.   

राजस्थान कैडर में किन-किन पदों पर काम किया   
राजेश्वर सिंह ने कहा कि मैं उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले का निवासी हूं. और मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से MA आधुनिक इतिहास से किया है. उसके तुरंत बाद में मेरा IAS में सलेक्शन हुआ, मेरा 1989 बैच है. प्रेरणा की बात है कि जनसामान्य और देश के लिए कुछ करने की इच्छा, यही मूल प्रेरणा थी. इलाहाबाद विश्वविद्यालय का माहौल प्रेरणाओं से ही जुड़ा हुआ था. तो ये सारे कारक रहे हैं, जिसकी वजह से मेरे इसमें आने की प्रेरणा प्राप्त हुई. राजस्थान में मैंने SDO माउंट आबू, कलेक्टर, जालोर और जयपुर, डिविजनल कमिश्नर उदयपुर, भरतपुर और जयपुर में इन पदों पर फील्ड में काम किया है. सचिवालय में पर्यटन, परिवहन, पशुपालन, लघु उद्योग इन विभागों का मैं प्रमुख सचिव रहा हूं. और अतिरिक्त मुख्य सचिव ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के पद पर रहा. तीन साल तक मैं रेवेन्यू बोर्ड का चेयरमैन रहा और लगभग ये फील्ड वाले जितने पद हैं. और ग्रामीण विकास और राजस्व प्रशासन का जो क्षेत्र है, वो रुचि का भी विषय है. और जो उसमें काम करके मैंने Enjoy किया. सबसे ज्यादा संतुष्टि हमें रूरल डवलपमेंट और पंचायती राज में मिली और रेवेन्यू बोर्ड में भी मिली. वहां ग्रामीण विकास के लिए हमने बहुत काम सफलतापूर्वक संचालित किए. एक हमारी योजना थी, एक ग्राम, चार काम तो उसमें हमें एक ग्राम में एक मॉडल तालाब, श्मशान, कब्रिस्तान विकास, खेल मैदान विकास इस तरह के काम हाथ में लिए थे. रेवेन्यू बोर्ड में भी काश्तकारों के मुकदमे हैं उनसे सीधा-सीधा रू-ब-रू होने का मौका मिला. हमने बहुत से ऐसे नवाचार किए, जिससे उनके निस्तारण को गति प्राप्त हुई. 

राजस्व अधिकारियों की ट्रेनिंग से फैसलों में आया सुधार   
राजेश्वर सिंह ने कहा कि हां, हमारे जो एडिशनल कमिश्नर हैं, ADM, SDM हैं. इनमें से जो चुनिंदा अधिकारी थे, उन्हें राज्य स्तर पर प्रशिक्षण दिया गया और फिर से इन लोगों ने वापस जाकर राज्य स्तर पर प्रशिक्षण दिया. और उसके बाद इन लोगों ने वापस जाकर जिलों में प्रशिक्षण दिया. इससे जो फैसले लिखे जाते हैं, उनकी गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ. 

इतिहास और अध्यात्म में कैसे बढ़ी राजेश्वर सिंह की रुचि  
राजेश्वर सिंह ने कहा कि साहित्य, इतिहास, राजनीति, दर्शन, लोक प्रशासन ये शुरू से हमारी रुचि के विषय रहे हैं. और उसका कारण ये था कि घर का माहौल ऐसा था कि जो हमारे ग्रैंडफादर थे. जो हमारे फादर थे, वो दोनों लोग इन सभी विषयों में रुचि रखते थे. फिर जो इलाहाबाद विश्वविद्यालय का साहित्यिक और दार्शनिक माहौल है. उसका भी असर पड़ा और दूसरा मैं बहुत ज्यादा सामाजिक व्यक्ति नहीं हूं, थोड़ा अंतर्मुखी हूं. तो यहीं स्वाभाविक है कि व्यक्ति थोड़ा अध्ययन की तरफ उन्मुख हो जाता है. 

राजेश्वर सिंह की साहित्यिक सोच और पसंदीदा कवि  
राजेश्वर सिंह ने कहा कि अभी आपने कहा ना कि जो अंतर्मुखी व्यक्ति होता है. उसका सामाजिक दायरा जरूर सीमित होता है. लेकिन उसका दृष्टिकोण जरूर व्यापक होता है. वो छोटे से दायरे में खुद को सीमित नहीं रखता है. वो उस दायरे के परे जाकर समाज की समस्याओं को झेल रहा है. उनको गहराई से महसूस करता है, इसीलिए उन चीजों को गहनतापूर्वक अनुभूत करना और उनको अभिव्यक्त करना, ये हम लोगों के लिए सरल और सहज हो जाता है. उसमें आपको एक नई अंतर्दृष्टि भी मिलती है. अब कविता तो इस समय स्मरण नहीं आ रही, लेकिन मैं दिनकर जी को बड़ा पसंद करता हूं. अब मैं अपनी कविता तो क्या सुनाऊं ? किसी महान कवि की कविता सुना देता हूं. आप देखिए कि ये परिवर्तन की प्रक्रिया है वो निरंतर प्रवाहमान और विकासमान है. और उस प्रक्रिया के साथ जो चलते हैं, वही प्रगति के रथ पर आरूढ़ होते हैं. उन्होंने कहा है कि ''ये जीवन गति है वह नित अरुद्ध चलता है. 
''पहला प्रमाण पावक का, वह जलता है, सिखला निरोध-निर्ज्जलन धर्म छलता है''
''जीवन तरंग-गर्जन है चंचलता है, धधको अभंग, पल-विपल अरुद्ध चलो रे !''
''धारा रोके राह तो निरुद्ध चलो रे !''
दिनकर जी हुए, बच्चन जी हुए, धूमिल जी हुए, ये लोग हमारे पसंदीदा कवि रहे हैं. इन्हीं से कुछ थोड़ा-बहुत सीख करके थोड़ा-बहुत लिख लेते हैं

रिटायरमेंट के बाद कैसे मिली चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी  
राजेश्वर सिंह ने कहा कि देखिए ऐसा है कि मुझे पता नहीं था कि मुझे इस पद पर लगाया जाएगा. ना ही मैंने कोई प्रयास किया, आप मेरे स्वभाव से भली-भांति परिचित हैं. और जो अवकाश प्राप्ति के बाद मेरा उद्देश्य है वो ये था कि मैं अपने आपको साहित्य, इतिहास, राजनीति दर्शन जो रुचि के विषय रहे हैं. इनके अध्ययन की तरफ और सृजनात्मक लेखन की तरफ खुद को समर्पित कर दूंगा. ये हमने ठान रखा था और एक साल मेरा बड़ा आनंदपूर्ण गुजरा. आधे समय अध्ययन करता था, आधे समय में सृजनात्मक लेखन करता था. हमारी कविताएं आप कृपापूर्वक छापते भी हैं. तो कहने का मतलब ये है कि हमको कोई बहुत ज्यादा इच्छा नहीं थी. और मैं बड़े आनंद में जीवन जी रहा था लेकिन अब ये मौका मिला. और जैसा मैंने आपको कहा भी कि ग्रामीण विकास, पंचायती विकास ये मेरी रुचि के विषय हैं. राजस्व प्रशासन के अलावा और जब ये मौका मिला. तो हमें लगा कि मैं निश्चित रूप से एक निष्पक्षतापूर्वक, त्रुटिहीन तरीके से और नियमानुकूल तरीके से चुनाव संपन्न कराने में सफल हो जाऊंगा. तो उस दृष्टि से मैंने इस जिम्मेदारी को स्वीकार किया. 

राजस्थान में निकाय-पंचायत चुनाव में देरी क्यों हुई  
राजेश्वर सिंह ने कहा कि 9 मई 2025 को यह जो OBC कमीशन फॉर पॉलिटिकल रिजर्वेशन है इसका गठन हुआ. और उसके बाद से ये आयोग जो है कार्य कर रहा था. अभी आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश नहीं की समय पर, उनके बीच में और राज्य सरकार के बीच में पत्राचार चलता रहा. कि हमको समुचित आंकड़े उपलब्ध कराए जाएं, वह उनके आंतरिक विषय हैं. तो जो भी रहा हो कारण विलंब का. लेकिन यह आयोग समय पर अपनी रिपोर्ट पेश नहीं कर सका. इसके बाद जब कुछ लोग राजस्थान उच्च न्यायालय के सामने गए. और उन्होंने याचिका दाखिल की तो राजस्थान उच्च न्यायालय ने यह कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ही आया हुआ है कि अगर आपके पास OBC कमीशन की रिपोर्ट नहीं है. तो आप उसको दरकिनार करके DONE AWAY WITH करके आप उसको जनरल की सीट मानते हुए चुनाव करा सकते हैं. तो माननीय उच्च न्यायालय ने अपने पिछले फैसले में ये कहा कि अगर OBC कमीशन अपनी रिपोर्ट नहीं दे रहा है. तो आप लोग इसको जनरल मानकर जैसा सुप्रीम कोर्ट का निर्णय है उसके आधार पर आप चुनाव करा सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट का निर्णय 'लॉ ऑफ द लैंड' होता है तो लेकिन ये जो इसमें सबसे बड़ी समस्या है. जो विभिन्न पदों, विभिन्न वार्डों का रिजर्वेशन है वह राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है. राजस्थान पंचायती राज इलेक्शन रूल है जो राजस्थान म्युनिसिपल रूल्स हैं. और दोनों की धारा 5 और 6 उसमें राज्य सरकार के द्वारा जो नॉमिनेटेड अधिकारी होते हैं. वही इन वार्डों की लॉटरी निकालते हैं और पोस्ट जो हैं चेयरपर्सन और वाइस चेयरपर्सन उनकी लॉटरी निकालता है. तो वो अब राज्य सरकार OBC कमीशन की रिपोर्ट का इंतजार कर रही थी. हमने इनको बार-बार चिट्ठियां लिखीं, चिट्टियां ये लिखीं कि आप जो है. या तो ST-SC, OBC और महिला सबका रिजर्वेशन तय करके दीजिए. और फिर नहीं तो आपको OBC को दरकिनार करना है तो आप निर्णय लीजिए. हमको ST-SC और महिला आरक्षण तय करके दे दो. तो उसके जवाब में उन्होंने यही अवगत कराया कि OBC कमीशन का गठन हो चुका है. वह काम कर रहा है, उसकी रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं और उसके बाद हम आपको रिपोर्ट दे देंगे. अभी माननीय उच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला दिया है जिसके आधार पर चुनाव हो रहे हैं. उसमें उन्होंने 3 बातें कही हैं, पहले तो यह कि OBC कमीशन 5 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट दे देगा. राज्य सरकार 14 अगस्त तक उसकी लॉटरी निकाल देगी. और राज्य चुनाव आयोग 15 अगस्त को इन चुनावों की घोषणा कर देगा. हम माननीय उच्च न्यायालय के बड़े आभारी हैं. हमने ये कहा था कि हमको 3 महीने का समय चाहिए चुनाव कराने के लिए ढंग से. क्योंकि आप यह देखिए हम म्युनिसिपल इलेक्शन जो हैं वह दो चरणों में करा रहे हैं. और पंचायती राज इलेक्शन हम 4 चरणों में करा रहे हैं. पहले म्युनिसिपल इलेक्शन कराएंगे, फिर पंचायती राज इलेक्शन कराएंगे. इसमें पहले चरण के लिए 60,000 तो हमको राज्य कर्मचारी चाहिए. और 50000 चाहिए पुलिस कर्मचारी तो कुल संख्या 1,10,000 कर्मचारी हुई. 

क्या ‘एक राज्य, एक चुनाव’ से हुई चुनाव में देरी 
राजेश्वर सिंह ने कहा कि नहीं देखिए ऐसा है, जो संवैधानिक प्रावधान हैं वह तो यही कहते हैं. जब भी किसी नगरीय निकाय या पंचायती राज का कार्यकाल समाप्त होता है. तो उसके तुरंत बाद चुनाव कराना चाहिए, संविधान सर्वोच्च है और इससे ज्यादा तो मैं क्या कहूं' ? 

केंद्रीय और राज्य निर्वाचन आयोग में क्या अंतर है  
राजेश्वर सिंह ने कहा कि इसमें ऐसा है कि जो केंद्रीय चुनाव आयोग है. वो तो आपके लोकसभा और विधानसभा हैं उनके चुनाव संपन्न कराते हैं. और जो राज्य चुनाव आयोग है वो पंचायती राज संस्थाओं और नगरी निकायों के चुनाव संपन्न कराता है. दोनों समानांतर संस्थाएं हैं और राज्य चुनाव आयोग किसी भी तरह से केंद्रीय चुनाव आयोग के अधीन नहीं है. ये स्वतंत्र संस्था है और हमारे जो सचिव हैं वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी होते हैं. और वही पंचायती राज और म्युनिसिपल इलेक्शन के लिए मुख्य चुनाव अधिकारी होते हैं. वो यही होते हैं और जो राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी हैं वह राज्य में केंद्रीय चुनाव आयोग के प्रतिनिधि हैं. और वो उत्तरदायी हैं उन संसदीय चुनाव और विधानसभा चुनाव के लिए है.

राज्य निर्वाचन आयोग की शक्तियां कहां से शुरू होती हैं 
राजेश्वर सिंह ने कहा कि संविधान और विधि के द्वारा जो दायित्व निर्धारित हुए हैं. उसमें चुनाव कराना पंचायती राज संस्थाओं और जो लोकल बॉडीज हैं, म्युनिसिपल बॉडीज हैं. उनका चुनाव कराना राज्य सरकार की और राज्य चुनाव आयोग की शेयर्ड रिस्पांसिबिलिटी है. और इसमें क्या है कि जो वार्डों के डिलिमिटेशन से लेकर निकायों का गठन जैसे ग्राम पंचायत का सृजन करना हो या नई ग्राम पालिका बनानी हो. या नगर पालिका में नए वार्ड बनाने हैं, नई जिला परिषद बनानी है, इसके लिए राज्य सरकार सक्षम है. उन वार्डों और पदों का रिजर्वेशन करने के लिए भी राज्य सरकार सक्षम है. हमारी भूमिका उसके बाद शुरू होती है, जब वह लोग लॉटरी निकालकर हमको दे देते हैं. उसके बाद हमारी भूमिका शुरू होती है. अब ये जो है संविधान और विधि के द्वारा निर्धारित दायित्व हैं. और उस पर कोई टिप्पणी करना मैं उचित नहीं समझता. 

क्या सरकार पर निर्भर है राज्य निर्वाचन आयोग  
राजेश्वर सिंह ने कहा कि राज्य सरकार जनता के द्वारा चुनी हुई संस्था है. और राज्य चुनाव आयोग भी एक संवैधानिक संस्था है. किसी भी देश में या किसी राज्य में लोकतंत्र है या लोकतांत्रिक संस्था तभी सही ढंग से संचालित हो पाती है. जब जितनी भी संवैधानिक संस्थाएं हैं वो एक सहयोग, समन्वय और सामंजस्य की भावना से काम करें. कोई चीज है उसमें रोड़े अटकाना वो एक अलग चीज होती है. लेकिन ये लोकतंत्र की मूलभावना के विपरीत है. जैसे हमने तीन संस्थाएं बना रखी हैं कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका. ये सब संविधान के मूल तत्व हैं उसके मुताबिक ही काम करते हैं. तो आपस में कोई विरोध-अवरोध की स्थिति उत्पन्न होने की कोई संभावना नहीं है. अगर हर व्यक्ति अपने दायित्व और कर्तव्य के प्रति सचेत है.     

चुनाव से ठीक पहले आरक्षण तय होना कितना सही 
राजेश्वर सिंह ने कहा कि वो तो इस समय की परिस्थिति ऐसी है कि जिसमें 14 अगस्त तक आरक्षण तय होना है. और वैसे हमारे ग्राम पंचायतों के चुनाव निर्दलीय आधार पर होते हैं. जिला परिषद, पंचायत समिति से लेकर नगरीय निकायों के चुनाव पार्टी बेसेस पर होते हैं. उसमें पार्टी का सिंबल यूज किया जाता है. तो पॉलिटिकल पार्टियों में कार्यकर्ता जो हैं तो बहुत दिनों से उनको इस चीज के लिए तैयार किया जाता है. कि उसकी क्या लोकल रिस्पांसिबिलिटी रहेगी ? और उनको कौनसी महत्वपूर्ण भूमिका दी जा सकती है ? तो मेरे हिसाब से कोई बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं आएगी. 

इन चुनावों के लिए भी आचार संहिता लगेगी
राजेश्वर सिंह ने कहा कि एक तो हम लोगों ने ये किया है कि जैसे नगरीय निकाय चुनाव की जब हम घोषणा करेंगे. तो उसी समय नगरीय क्षेत्र में आचार संहिता लगेगी

तो ये दोनों ही चुनाव इस बार EVM से होंगे ? 
राजेश्वर सिंह ने कहा कि नहीं हमारे जो वार्ड पंच और सरपंच के चुनाव वो तो बैलेट बॉक्स से होंगे.

पर्याप्त मात्रा में  EVM हैं, उनकी जांच, स्ट्रॉन्ग रूम वो सब प्रक्रिया चल रही है ? 
राजेश्वर सिंह ने कहा कि वो हमने मध्य प्रदेश से EVM मंगवाई हुई है. केंद्रीय चुनाव आयोग से भी हमने लोन बेसेस पर ली हुई है, हमारे पास पर्याप्त EVM हैं. जिससे कम से कम नगरीय निकाय चुनाव और ये पंचायत समिति, जिला परिषद चुनाव संपन्न हो जाएंगे. जो बैलेट बॉक्स है वो राजस्थान में अवेलेबल हैं पर्याप्त संख्या में. एक लाख के आसपास हमारे पास हैं, तो उससे ये सारे चुनाव हम संपन्न करवा लेंगे. 

जो SIR का डेटा आएगा, उसमें और इन चुनावों के लिए जो मतदाता सूचियां तैयार हो रही हैं उसमें अंतर आएगा, तो हो सकता है कि बढ़ा हुआ आए, हो सकता है कम होकर आए ? 
राजेश्वर सिंह ने कहा कि नहीं बढ़ा हुआ ही है, हम ये मानते हैं कि जो ऑर्डिनरीली रह रहा है वहां पर जो हमारे BLO हैं, प्रगणक कहते हैं हम उनको अपने आयोग की भाषा में तो उन प्रगणकों को हमने इसके लिए स्पेशली इम्पावर किया. और प्लस हमारे जो ERO हैं उनको किया तो हमारे लगभग 5 करोड़ 43 लाख तो ग्रामीण क्षेत्र में मतदाता हैं. और एक करोड़ 2 लाख ये नगरीय क्षेत्रों में हैं, तो कुल 5 करोड़ 45 लाख हमारे कुल मतदाता हैं. हम जो है चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ होने के 10 दिन पहले तक जोड़ने-हटाने का काम है वो अभी भी चल रहा है.      

क्या स्थानीय चुनाव में भी चलेगा विशेष जागरूकता अभियान  
राजेश्वर सिंह ने कहा कि हम आपसे बात कर रहे हैं ये भी एक उसी प्रक्रिया का हिस्सा है. क्योंकि आपका चैनल बहुत ज्यादा लोकप्रिय है. हम आपसे बात कर रहे हैं ये चर्चा संपन्न हो रही है. तो लोगों को एक इस पूरी प्रक्रिया के बारे में जानकारी मिल रही है कि कैसे ये चुनाव संपन्न होने हैं. और हम आपके इस चैनल का लाभ उठाकर जनता से अपील भी करना चाहेंगे. कि वो एक सुयोग्य उम्मीदवार का, जागरूक उम्मीदवार का जो सक्रिय हो. जिसके अंदर कोई कमी नहीं हो, कोई आपराधिक मुकदमा उसके खिलाफ नहीं चल रहा हो. ईमानदार हो, निष्ठावान हो, निष्पक्ष हो, ऐसे लोगों का चयन करें. ताकि देखिए स्थानीय जो लोकतंत्र है वो लोकतंत्र की आधारशिला है. और जो स्थानीय समस्याएं हैं उनका स्थानीय स्तर पर ही समाधान हो सकता है. उसका समाधान कोई केंद्र सरकार या राज्य सरकार नहीं करेगी. तो ये जनप्रतिनिधि जितने जागरूक होंगे, जितने सक्रिय होंगे. और जितने संवेदनशील होंगे, जितने उत्तरदायी होंगे. तो मुझे लगता है कि केंद्र और राज्य सरकार को फिर बड़े मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने का ज्यादा अवसर प्राप्त होगा. तो हम यही चाहेंगे कि अच्छे लोग, जिनका चरित्र और व्यक्तित्व, कृतित्व उज्ज्वल रहा हो. ऐसे लोग चुनकर आएं और जनता भी ऐसे लोगों को ही चुने. ये हम आपके माध्यम से मतदाताओं से निवेदन करना चाहते हैं. इसके अलावा भी हम मतदाता जागरूकता अभियान चला रहे हैं. हम युवा मतदाताओं से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं. स्वंयसेवी संस्थाओं से मदद मांग रहे हैं कि ज्यादा से ज्यादा मतदान हो. और जनता जैसे धर्म और जाति के आधार पर वोट नहीं दे. धार्मिक स्थलों का दुरुपयोग नहीं हो, आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हो, लोग प्रलोभन के शिकार नहीं हों. तो ये सारी चीजों में हम समाज जो भी जागरूक तबका है विशेष रूप से जो बुद्धिजीवी वर्ग है. उसके सहयोग की हमको अपेक्षा रहेगी, गीता में एक बढ़ा अच्छा श्लोक है. "यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते". कि समाज के जो अग्रगण्य लोग होते हैं, बुद्धिजीवी लोग होते हैं, प्रमुख लोग होते हैं. वो जैसा आचरण करते हैं, वैसा ही आम जनता आचरण करती है. और वो जैसा मानदंड स्थापित कर देते हैं कार्य और व्यवहार का. तो वही एक लोगों का सामूहिक आदर्श और सामूहिक मानदंड बन जाता है. तो ये बुद्धिजीवियों की भूमिका है, समाज के अग्रणी लोग हैं उनकी भूमिका है. कि वो जनता को सही दिशा में प्रेरित करें और उनको मार्गदर्शन दें. 

आपका मत क्या है ? आपको क्या लगता है इससे क्या फर्क पड़ेगा ? 
राजेश्वर सिंह ने कहा कि हम लोगों ने कम्युनिकेट किया है. इसको अब देखिए किसी भी निर्णय के दो पहलू होते हैं. आप उसके पक्ष में भी तर्क दे सकते हैं और उसके विपक्ष में भी तर्क दे सकते हैं. तो 2 बच्चों वाला या जो शिक्षा वाला था, अब 2 बच्चों वाले के फेवर में तो ये था. कि इससे परिवार कल्याण की जो भावना है उसको प्रोत्साहन मिलता था. लेकिन उसके विपक्ष में आप ये कह सकते हैं कि बहुत से काबिल लोग थे. बहुत ही निष्ठावान थे, जो जनता के प्रति प्रतिबद्ध थे. जनकल्याण के प्रति समर्पित थे, उनको मौका नहीं मिल पाता था. तो दोनों ही पक्ष-विपक्ष में कहा जा सकता है, वैसे ही शिक्षा की जहां तक बात है. 

अब आपने शिक्षा की बाध्यता ही हटा दी है, अब चाहे कोई अनपढ़ हो या ना पढ़ा-लिखा हो या केवल साक्षर हो, वह भी चुनाव को लड़ सकता है उसका क्या असर आएगा ?
राजेश्वर सिंह ने कहा कि अब यह देखिए की वही बात है कि बहुत से लोग हैं जो पढ़े-लिखे तो नहीं हैं. लेकिन उनकी जो जन सेवा की भावना है, निष्ठा है, कर्तव्य निष्ठा है, प्रतिबद्धता है. गांव के विकास की जो दूर दृष्टि है, तो वह बहुत ज्यादा समुन्नत है. तो ऐसे लोगों को मौका मिल जाएगा और दूसरा ये है कि सरपंच जो है एग्जीक्यूटिव रिस्पांसिबिलिटी होती है. तो उसको नियम-कानून कायदे का ज्ञान होना चाहिए. बहुत सारी योजनाओं में चेक साइनिंग अथॉरिटी होती है. तो दोनों के पक्ष-विपक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं. यह तो राज्य सरकार का निर्णय है अब उसके बारे में तो क्या टिप्पणी करूंगा. 

आप मिशन मोड में आ चुके हैं  
राजेश्वर सिंह ने कहा कि नहीं, मैं तो बहुत ज्यादा आशान्वित हूं. माननीय उच्च न्यायालय ने जो निर्णय दिया है उसकी अनुपालना में जो ओबीसी कमीशन है. वह समय पर रिपोर्ट पेश कर देगा, राज्य सरकार समय पर लॉटरी निकाल देगी. और हम समय पर चुनाव कराने के लिए बिल्कुल कटिबद्ध हैं.