नई दिल्ली: पूरी दुनिया इस समय ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का सामना कर रही है. बढ़ते वैश्विक तापमान के बीच भारत को लेकर एक अहम जलवायु संबंधी तथ्य सामने आया है. नासा से जुड़े शोध के मुताबिक, भारत में तापमान बढ़ने की रफ्तार दुनिया के कई अन्य हिस्सों की तुलना में अपेक्षाकृत धीमी रही है. वैज्ञानिक इस घटना को 'वार्मिंग होल' (Warming Hole) के नाम से संबोधित कर रहे हैं.
क्या है 'वार्मिंग होल'?:
'वार्मिंग होल' ऐसी जलवायु स्थिति को कहा जाता है, जहां आसपास के क्षेत्रों की तुलना में किसी विशेष इलाके में तापमान बढ़ने की गति कम रहती है. भारत में इस प्रभाव के पीछे कई प्राकृतिक और जलवायु संबंधी कारकों की भूमिका मानी जा रही है. शोध के अनुसार, समुद्र से आने वाली हवाएं, मानसूनी गतिविधियां, बादल और भूमि की सतह से जुड़े बदलाव भारत के तापमान को प्रभावित करते हैं. इन कारकों के कारण देश के कई हिस्सों में वैश्विक औसत की तुलना में तापमान वृद्धि की गति कम रही है.
वैश्विक तापमान में लगातार बढ़ोतरी:
जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 1980 के बाद से वैश्विक औसत तापमान में करीब 1.4 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि दर्ज की गई है. इसके विपरीत, भारत में 20वीं सदी की शुरुआत से अब तक औसत तापमान में वृद्धि 0.9 डिग्री सेल्सियस से कम बताई गई है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ग्लोबल वार्मिंग से पूरी तरह सुरक्षित है. देश के कई हिस्सों में हीटवेव, अत्यधिक बारिश, सूखा और अन्य मौसम संबंधी घटनाओं का असर लगातार देखने को मिल रहा है.
फिलहाल राहत, लेकिन चुनौती बरकरार:
'वार्मिंग होल' भारत को वैश्विक तापमान वृद्धि के कुछ प्रभावों से फिलहाल अपेक्षाकृत राहत दे सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार इसे स्थायी सुरक्षा कवच नहीं माना जा सकता. जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के साथ भारत में भी तापमान और मौसम के पैटर्न में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं. इसलिए तापमान वृद्धि की धीमी रफ्तार के बावजूद भारत के लिए जलवायु परिवर्तन से निपटने, जल संसाधनों के संरक्षण और अत्यधिक गर्मी से बचाव की तैयारियां महत्वपूर्ण बनी हुई हैं.