तीन उपचुनाव में कितना सफल होगा सियासी दलों का परिवारवाद कार्ड, इतिहास में सफलता का रिकॉर्ड बेहद कम

तीन उपचुनाव में कितना सफल होगा सियासी दलों का परिवारवाद कार्ड, इतिहास में सफलता का रिकॉर्ड बेहद कम

तीन उपचुनाव में कितना सफल होगा सियासी दलों का परिवारवाद कार्ड, इतिहास में सफलता का रिकॉर्ड बेहद कम

जयपुर: उपचुनाव में परिवारवाद कितना सफल होगा यह 2 मई को आने वाले परिणामों से साफ हो जाएगा. दिवंगत विधायकों के निधन के चलते पूर्व में जितने भी उपचुनाव (by-election) हुए हैं उनमें अधिकांश में भाजपा, कांग्रेस या अन्य दलों को परिवारवाद (Familyism) के नाम पर कोई सफलता नहीं मिल पाई. 1965 से लेकर 2005 के इतिहास को देखें तो दिवंगत विधायकों के निधन के चलते हुए 8 चुनावों में परिवारवाद को नहीं मिल पाई जनता की सहानुभूति. 

प्रदेश की 3 सीटें सहाड़ा, राजसमंद और सुजानगढ़ में दिवंगत विधायकों के निधन के चलते हुए उपचुनाव में भले ही भाजपा और कांग्रेस ने सहानुभूति वोट बंटोरने के लिए परिवारवाद का दांव खेला है. लेकिन इनके लिए राह आसान नहीं है. सहाड़ा में कांग्रेस ने दिवंगत विधायक की पत्नी गायत्री देवी को चुनावी समर में उतारा. राजसमंद में बीजेपी ने दिवंगत विधायक किरण माहेश्वरी की बेटी दीप्ति को उम्मीदवार बनाया. सुजानगढ़ में कांग्रेस ने दिवंगत मंत्री मास्टर भंवर लाल मेघवाल के बेटे मनोज को चुनावी समर में उतारा है. परिवावाद के तहत गायत्री देवी और मनोज मेघवाल है कांग्रेस के प्रत्याशी, वहीं दीप्ति को बीजेपी ने उम्मीदवार बनाया है. दिवंगत विधायकों के निधन के चलते पूर्व में जितने भी उपचुनाव हुए हैं उन्हें भाजपा कांग्रेस या अन्य दलों को परिवारवाद के नाम पर कोई सफलता नहीं मिल पाई है.

---उपचुनाव में परिवारवाद की लगातार हार--- 

- 1965 में राजाखेड़ा में बीजेपी से प्रताप सिंह को टिकट मिला, यह दिवंगत विधयक एम सिंह के पुत्र थे, इन्हें मिली हार

- 1978 में रूपवास से बी राम के पुत्र ताराचंद को पराजय मिली, कांग्रेस से टिकट मिला था

-1988 में खेतड़ी से एच लाल चुनाव हारे, उनके पिता मालाराम रहे थे विधायक, कांग्रेस के डॉ जितेंद्र सिंह ने हराया

- 1995 में बांसवाड़ा से हरिदेव जोशी के बेटे दिनेश जोशी को टिकट मिला और पराजय हुई, राज्य के सीएम रह चुके नेता के बेटे की हार अचरज भरी थी इस जीत से बीजेपी के भवानी जोशी चमके

-1995 में बयाना से बृजराज सिंह के पुत्र शिवचरण सिंह को बीजेपी का टिकट मिला, हार हो गई, कांग्रेस के विजेंद्र सिंह सुपा चुनाव जीते

- 2000 में लूणकरणसर से कद्दावर कांग्रेस विधायक भीमसेन के निधन के बाद उनके बेटे वीरेंद्र बेनी वाल को टिकट मिला लेकिन बीजेपी के वरिष्ठ नेता माणिक चंद सुराणा ने हरा दिया

- 2002 में सागवाड़ा से कांग्रेस के बड़े आदिवासी नेता भीखाभाई के निधन के बाद सुरेंद्र कुमार बामनिया को टिकट मिला और हार मिली, बीजेपी के कद्दावर नेता कनक मल कटारा ने जीत दर्ज की

- 2005 में लूणी के कांग्रेसी दिग्गज रामसिंह विश्नोई के निधन के बाद उनके पुत्र मलखान सिंह को टिकट मिला और पराजय हुई, बीजेपी के जोगाराम पटेल चुनाव जीते

1965 से लेकर 2005 तक दिवंगत विधायकों के निधन के चलते हुए 8 चुनावों में परिवारवाद को नहीं मिल पाई जनता की सहानुभूति, सियासी गलियारों में चर्चा, क्या इस बार तीन उपचुनावों में टूटेगा मिथक, सहाड़ा राजसमंद और सुजानगढ़ में परिवारवाद पर खेला गया है दांव. दिवंगत विधायकों के निधन के चलते 1965 से लेकर साल 2005 तक 8 ऐसे उपचुनाव हुए हैं जहां सहानुभूति बटोरने के लिए दिवंगत विधायकों के परिवारजनों को टिकट दिए गए हैं लेकिन हैरानी की बात यह है कि सभी चुनावों में जनता ने परिवारवाद को पूरी तरह से नकारा है. 1965 से लेकर साल 2005 तक 8 उपचुनावों में दिवंगत विधायकों के परिजन उपचुनावों में जीत दर्ज नहीं कर पाए. अभी तक तो राजनीतिक दल आकलन लगा रहे हैं कि उनकी ओर से परिवारवाद का दांव खाली नहीं जाएगा. 

...फर्स्ट इंडिया के लिए योगेश शर्मा की रिपोर्ट

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