जयपुर के नए एंट्री गेट पर उठे सवाल, गेट की डिजाइन में विरासत गायब ? देखिए खास रिपोर्ट

जयपुरः जयपुर शहर में तीन स्थानों पर बनाए जा रहे प्रवेश द्वारों के डिजाइन को लेकर कई सवाल खड़े होने लगे हैं. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस डिजाइन में जयपुर की विश्व प्रसिद्ध विरासत और स्थापत्य कला का अभाव है. जेडीए की ओर से प्रस्तावित इन प्रवेश द्वारों की क्या है डिजाइन और इस डिजाइन को लेकर विशेषज्ञ क्यों उठा रहे हैं सवाल. 

जयपुर विकास प्राधिकरण की ओर से दिल्ली रोड पर आमेर कुंडा,घाट की गूणी टोल प्लाजा और खातीपुरा रेलवे स्टेशन गंगा मार्ग पर तीन प्रवेश द्वारों का निर्माण किया जाएगा. इनके निर्माण में वेस्ट मैटेरियल व स्क्रेप आदि का उपयोग किया जाएगा. करीब 5.36 करोड़ रुपए की लागत से इन प्रवेश द्वारों के निर्माण के लिए जेडीए ने निविदा भी जारी कर दी है. आपको सबसे पहले बताते हैं कि कहां किस डिजाइन के प्रवेश द्वार बनाया जाना प्रस्तावित है.

-घाट की गूणी टनल के टोल प्लाजा पर 50 मीटर चौड़ा और 11 मीटर ऊंचा प्रवेश द्वार बनाया जाएगा
-यहां 50 मीटर की लंबाई में राजस्थानी मूंछ की डिजाइन में गेट बनेगा
-इस गेट के ऊपर राजस्थानी पगड़ी की डिजाइन में स्ट्रक्चर बनेगा
-गेट पर बड़े बड़े अक्षरों में "खम्मा घणी" लिखा जाएगा
-दिल्ली रोड पर आमेर कुंडा मोड़ पर उड़ते लहरिया डिजाइन का गेट बनाया जाएगा
-इस गेट की चौड़ाई 45 मीटर और ऊंचाई 11 मीटर होगी
-12.2-12.2 मीटर चौड़े इस गेट में मुख्य कैरिज वे होंगे, जहां से वाहनों का आवागमन होगा
-इसके अलावा दोनों किनारों पर 2.4-2.4 मीटर चौड़े छोटे गेट बनेंगे
-खातीपुरा स्टेशन के पास गंगा मार्ग पर सड़क के दोनों तरफ 6-6 मीटर ऊंचे स्तंभ बनेंगे
-इन स्तभों पर चारों तरफ खिड़कियों में महापुरूषों के चेहरे लगाए जाएंगे

जयपुर शहर की विरासत,स्थापत्य कला और उसकी खास शैली के कई विशेषज्ञ और कला मर्मज्ञ इन तीनों प्रवेश द्वारों की डिजाइन पर कई सवाल खड़े कर रहे हैं. इन विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्रवेश द्वार ऐसे होने चाहिए जिन्हें देखकर इसमें से गुजरने वाले देशी व विदेशी पर्यटकों को इस गुलाबी नगर की वास्तविक पहचान की जानकारी मिल सके. आपको बताते हैं कि इस मामले में शहर के प्रमुख वास्तुविद् और पर्यटन व कला विशेषज्ञों का क्या कहना है

विशेषज्ञ यूं उठा रहे हैं सवाल
- विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी शहर की विरासत और स्थापत्य कला उस शहर की आत्मा होती है उसकी पहचान होती है

-राजस्थान के हर इलाके की तरह जयपुर की भी अपनी मौलिक स्थापत्य कला है जो पूरे विश्व में उसकी पहचान है

-जो जयपुर अपनी नगर नियोजन और स्थापत्य कला के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है

-उस जयपुर के प्रवेश द्वार में वह नगर नियोजन और स्थापत्य कला दिखनी चाहिए

-ताकि यहां प्रवेश करने वाले लोगों को यह आभास हो सके कि वे वाकई वे जयपुर शहर में जा रहे हैं

-विशेषज्ञों के अनुसार इन प्रस्तावित प्रवेश द्वारों की डिजाइन में जयपुर की इस विश्व प्रसिद्ध पहचान का अभाव है

-शहर में निर्मित इस तरह की संरचनाएं उस शहर का गौरव मानी जाती है इन प्रस्तावित प्रवेश द्वार की डिजाइन में वह गौरव नजर नहीं आता

-विशेषज्ञों का एक तर्क यह भी है जब हम किसी शहर के प्रवेश द्वार में प्रवेश करते हैं तो

-तो हम वहां रूकते नहीं हैं बल्कि उस प्रवेश द्वार में से गुजर जाते हैं

-प्रवेश द्वार की भव्यता दूर से ही उसमें प्रवेश करते समय हमें आकर्षित करती है

-ऐसी भव्यता या आकर्षण इन प्रस्तावित प्रवेश द्वारों में नजर नहीं आता है

शहर के प्रमुख व मशहूर वास्तुविद् अनूप बरतरिया का कहना है कि प्रवेश द्वार की जैसी संरचनाओं में जयपुर की प्राचीन विरासत व स्थापत्य कला,जयपुर की सौम्यता और सहजता की झलक दिखनी चाहिए. वहीं दूसरी तरफ मशहूर लेखक, पर्यटन व कला विशेषज्ञ तृप्ति पांडे का मानना है कि जेडीए की ओर से प्रस्तावित इन प्रवेश द्वारों की डिजाइन देखकर ऐसा लगता है कि हम किसी शहर में नहीं बल्कि किसी सर्कस, डिजनीलैंड या अप्पू घर में प्रवेश कर रहे हैं.     

विशेषज्ञों का यह भी कहना है प्रवेश द्वार की डिजाइन फाइनल करते समय ललित कला अकादमी जैसी संस्थाएं और जयपुर शहर की कला,संस्कृति व स्थापत्य कला में रूचि रखने वाले लोगों की राय ली जानी चाहिए थी. ताकि प्रवेश द्वार बनाने का उद्देश्य सार्थक हो सके.