जयपुर: रात के समय सड़क पर सफ़र करने वालों के लिए कारों की तेज़ सफ़ेद LED लाइट अब बड़ी परेशानी बनती जा रही है. इंजीनियरिंग के हिसाब से ये लाइटें सड़क को बेहतर रोशन भले ही करती हैं, लेकिन सामने से आने वाले वाहन चालक के लिए विजन ब्लर करने समेत कई तरह की नेत्र दिक्कतें पैदा कर रही है. सड़क पर बढ़ता LED हेडलाइट्स का चलन अब दुर्घटनाओं की एक नई वजह बनकर सामने आ रहा है.
वाहनों में लगाई जा रही सफ़ेद और ब्लू टोन की हाई-इंटेंसिटी LED रोशनी आंखों पर तेज़ ग्लेयर डालती है, जिससे कुछ सेकेंड्स के लिए विजिबिलिटी खत्म हो जाती है और इसी दौरान हादसे हो जाते हैं. नेत्र विशेषज्ञ बताते हैं कि इन हाई-पावर LED लाइटों का सबसे बड़ा प्रभाव आंखों के रेटिना पर पड़ता है. लगातार इस ग्लेयर का सामना करने वालों में ड्राईनेस, सिरदर्द, आंखों में जलन, फोकस में दिक्कत और विज़न ब्लर होने जैसे लक्षण तेजी से बढ़ रहे हैं. कई मामलों में माइग्रेन और फोटोसेंसिटिविटी तक बढ़ जाती है.
विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादा देर तक सफ़ेद LED लाइट देखने से ‘टेम्परेरी नाइट ब्लाइंडनेस’ की स्थिति बन सकती है. सामने से तेज़ रोशनी पड़ने के बाद कुछ सेकेंड्स तक आंखें किसी भी चीज़ पर फोकस नहीं कर पातीं. यही पल ड्राइवर के लिए सबसे खतरनाक होता है, खासकर हाईवे पर जहां गाड़ियां तेज़ रफ्तार से चलती हैं. ऑप्टोमेट्रिस्ट और नेत्र रोग विशेषज्ञों ने बताया कि लगातार हाई-इंटेंसिटी लाइट के संपर्क में रहने से रेटिना की फोटो-रिसेप्टर सेल्स पर दबाव बढ़ता है. लंबे समय में इससे विज़न कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है. यह असर खास तौर पर उन लोगों में ज्यादा देखा जा रहा है जो रोजाना रात में लंबा ड्राइव करते हैं—जैसे ट्रक ड्राइवर, कैब ड्राइवर और नाईट शिफ्ट कर्मचारी.
लो-बीम पर रखें लाइट:
-वाहनों में लगाई जा रही सफ़ेद और ब्लू टोन की हाई-इंटेंसिटी LED लाइट्स पर सुझाव
-एसएमएस मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों ने नेत्ररोग के बढ़ते मामलों को देखते हुए दी सलाह
-उन्होंने कहा कि वाहन चालक लो-बीम का इस्तेमाल करें
-हाई-इंटेंसिटी LED या आफ्टर-मार्केट लाइटें लगाने से बचें और
-रात को ड्राइव करते समय दूसरे ड्राइवरों की विज़िबिलिटी का भी ध्यान रखें