जयपुर: जयपुर विकास प्राधिकरण को जवाहर सर्किल स्थित बेशकीमती 13 बीघा भूमि के मामले में बड़ी सफलता मिली है. हाई कोर्ट ने करीब दो हजार करोड़ रुपए बाजार भाव की भूमि पर जेडीए का पक्ष मजबूत किया है.
यह मामला है राजधानी में जवाहर सर्किल पर ईएचसीसी हॉस्पिटल के सामने ग्राम चैनपुरा के खसरा नंबर 288,286,289,290,296,291,294,295,306,308 और 304/271 की करीब 13 बीघा भूमि का. करीब 53 साल पुराने इस मामले में भूमि के अधिग्रहण के लिए 21 अगस्त 1969 को अधिसूचना जारी की गई थी. प्रभावित खातेदारों की याचिका पर हाई कोर्ट की एकलपीठ ने इस वर्ष 7 मार्च को आदेश जारी किया था. हाई कोर्ट ने जेडीए को आदेश दिए थे कि प्रभावित खातेदारों को भूमि अवाप्ति के बदले बतौर मुआवजा 25 प्रतिशत विकसित भूखंड दिया जाए. इस आदेश के खिलाफ जेडीए ने हाई कोर्ट की खंडपीठ में अपील की थी. जेडीए की ओर से अधिवक्ता अमित कुड़ी व धर्माराम ने पैरवी की. हाई कोर्ट की खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश को रद्ध कर दिया है. आपको बताते हैं पिछले करीब 53 वर्ष पुराने में कब क्या हुआ.
-8 मई 1975 को अवाप्ति के खिलाफ लगाई खातेदारों की याचिका हाई कोर्ट ने खारिज कर दी
-17 मई 1975 को भूमि अवाप्ति के बदले मुआजवे के लिए अवाउर् जारी किया गया और भूमि राज्य सरकार में निहित हो गई
-23 नवंबर 1976 को सरकार की ओर से कब्जा फर्द के माध्यम से भूमि का कब्जा ले लिया गया
-10 फरवरी 1979 को भूमि अवाप्ति की मुआवजा राशि सिविल कोर्ट में जमा करा दी गई
-जेडीए की ओर से भूमि का कब्जा लेने के खिलाफ और भूमि अवाप्ति के प्रावधानों को चुनौती देते हुए खातेदारों की ओर से याचिका लगाई
-जिस हाई कोर्ट की खंडपीड ने 13 अगस्त 2012 का खारिज कर दिया
-इसके खिलाफ लगाई गई खातेदारों की विशेष अनुमति याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया
-खातेदारों की ओर से दुबारा लगाई याचिका को हाई कोर्ट की एकलपीठ ने 13 अप्रेल 2017 को खारिज कर दिया
-21 अप्रेल 2017 को जेडीए ने भूमि से अतिक्रमण हटाए और तारबंदी की
-इसके खिलाफ खातेदारों की लगाई याचिका को 22 अगस्त 2023 को हाई कोर्ट की खंडपीठ ने खारिज कर दिया
मौके की जगह स्थित इस भूमि पर वाहनों की पार्किंग कर पार्किंग शुल्क वसूला जा रहा है. भूमि पर कब्जे के लिए कोठरियों का निर्माण किया गया है. कुछ स्थानों से जेडीए संपत्ति के बोर्ड हटा दिए गए है. इस मामले में हाई कोर्ट की खंडपीठ ने जेडीए की याचिका को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि मामले में भूमि अवाप्ति प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है और मुआवजा राशि भी जमा कराई जा चुकी है. ऐसे में मुआवजे में विकसित भूखंड लेने के खातेदार हकदार नहीं हैं. आपको बताते हैं कि हाई कोर्ट की खंडपीठ ने अपने इस आदेश में और क्या कहा.
-खातेदारों की ओर से याचिका लगाने से पहले ही अवाप्ति का मुआवजा न्यायालय में जमा करा दिया गया था
-भूमि अवाप्ति अधिनियम के तहत खातेदारों की ओर से संबंधित न्यायालय में कोई रेफरेंस दायर नहीं किया गया
-अवार्ड जारी करने के बाद भूमि अवाप्ति को चुनौती देने वाली याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया
-कई बार प्रभावित खातेदारों की ओर से अदालत में याचिकाएं दायर की गई लेकिन हर बार यह याचिकाएं असफल रही
-खातेदार 25% विकसित भूखंड लेने के खातेदार हकदार नहीं है
-प्रभावित खातेदारों की याचिका को स्वीकार कर एकल पीठ ने गंभीर गलती की है
-हाई कोर्ट की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा
-यदि कब्जा लिया जा चुका है और मुआवजा दे दिया गया है,तो अधिग्रहण निरस्त नहीं माना जाएगा
-हाईकोर्ट ने बार-बार मुकदमेबाजी को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले में अपने आदेश में जो भी कहा वह यह बताता है कि अवाप्ति प्रक्रिया पूरी तरह से सही है. खातेदार को मुआवजे में पच्चीस प्रतिशत विकसित भूखंड लेने का अधिकार नहीं है. भूमि का मालिकाना हक जेडीए का है, इसको लेकर कोई विवाद नहीं है, जानकारों के अनुसार जेडीए को तुरंत भूमि की सुरक्षा के लिए कदम उठाने चाहिए. साथ ही सुप्रीम कोर्ट में जेडीए की ओर से मामले में कैविएट दायर की जानी चाहिए.