राजस्थान विधानसभा में अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की भूमिका, सदन में विधायकों को पढ़ाया अनुशासन का पाठ, देखिए खास रिपोर्ट

जयपुरः राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी सदन संचालन को लेकर इन दिनों खासा चर्चा में है .बजट सत्र  विधानसभा की कार्यवाही के दौरान सदन में अनुशासन और मर्यादा बनाए रखने को लेकर देवनानी ने कड़ा रुख अपना रखा है . विधानसभा अध्यक्ष के रूप में वे लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सदन की गरिमा सर्वोपरि है और सभी सदस्यों को नियमों का पालन करना चाहिए. हाल के सत्र में उन्होंने विधायकों को स्पष्ट शब्दों में अनुशासन का पाठ पढ़ाते हुए कहा कि जनता ने उन्हें अपनी आवाज उठाने के लिए चुना है, न कि शोर-शराबा या अव्यवस्था फैलाने के लिए.

मर्यादाओं के मंदिर में जब स्वर ऊँचे होने लगें, तो किसी एक सख्त लेकिन संतुलित आवाज़ का उठना ज़रूरी हो जाता है. वासुदेव देवनानी ने राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष के रूप में ठीक वही भूमिका निभाई है—जहाँ शब्दों की तलवारें टकराती हैं, वहाँ नियमों की ढाल थामे खड़े दिखाई देते हैं. सत्ता और विपक्ष के बीच चलने वाले राजनीतिक घमासान के बीच उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया है कि लोकतंत्र की असली ताकत शोर में नहीं, बल्कि संयमित संवाद में है. सदन में अनुशासन का पाठ पढ़ाते हुए उन्होंने यह भी जता दिया कि अध्यक्ष की कुर्सी किसी दल की नहीं, बल्कि व्यवस्था और मर्यादा की प्रतीक है. अध्यक्ष देवनानी ने पक्ष और विपक्ष दोनों को बराबर अवसर देने की अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई.सदन की कार्यवाही के दौरान उन्होंने कई मौकों पर विपक्षी सदस्यों को भी पर्याप्त समय दिया, वहीं सत्तापक्ष के विधायकों को भी अपनी बात रखने का मौका मिला. उनका मानना है कि संतुलित संचालन ही विधानसभा की गरिमा को बनाए रख सकता है. सत्र के दौरान जब कुछ विधायक बार-बार अपनी सीट से खड़े होकर बीच में बोलने लगे तो अध्यक्ष ने सख्त रुख अपनाया. उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना अनुमति के बोलना नियमों के खिलाफ है और इससे कार्यवाही बाधित होती है. इसी क्रम में एक मौके पर उन्होंने मनीष यादव और एक भाजपा विधायक को भी फटकार लगाई. अध्यक्ष ने नाराजगी जताते हुए कहा, “आप मेरे से बड़े हो क्या, जो बार-बार नियमों की अनदेखी कर रहे हैं?” उनके इस वक्तव्य के बाद सदन में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया और सदस्य अपनी-अपनी सीटों पर बैठ गए.

देवनानी समय-समय पर मंत्रियों और अधिकारियों को भी सावचेत करते नजर आते हैं. उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि किसी प्रश्न का उत्तर संतोषजनक नहीं होगा या तथ्यों में कमी पाई जाएगी तो संबंधित मंत्री या अधिकारी को जवाबदेह ठहराया जाएगा. उनका कहना है कि विधानसभा जनता के विश्वास का मंच है और यहां दी जाने वाली हर जानकारी तथ्यपूर्ण और जिम्मेदार होनी चाहिए. 

स्पीकर देवनानी ने कहा कि प्रश्नकाल लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसमें जनप्रतिनिधि सरकार से जनहित से जुड़े मुद्दों पर तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त करते हैं. अतः प्रश्नकाल के दौरान अनावश्यक बहस, आरोप-प्रत्यारोप या विषयांतर चर्चा से बचना चाहिए. उन्होंने सभी माननीय सदस्यों से कहा कि वे नियमों एवं परंपराओं का पालन करते हुए संक्षिप्त एवं स्पष्ट प्रश्न पूछें तथा मंत्रीगण भी निर्धारित विषय पर सटीक और तथ्यात्मक उत्तर दें. जिससे सदन की कार्यवाही सुचारु, मर्यादित और प्रभावी ढंग से संचालित हो सके.   

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अध्यक्ष के रूप में देवनानी की कार्यशैली सख्त लेकिन संतुलित रही है. वे जहां एक ओर नियमों के पालन में कोई ढील नहीं देते, वहीं दूसरी ओर सभी दलों को समान महत्व देकर लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करने का प्रयास करते हैं. कुल मिलाकर, वासुदेव देवनानी का स्पष्ट संदेश है कि सदन की गरिमा और अनुशासन से कोई समझौता नहीं होगा. पक्ष और विपक्ष दोनों को समान अवसर देना और नियमों का कड़ाई से पालन कराना उनकी प्राथमिकता है, जिससे राजस्थान विधानसभा की कार्यवाही सुचारू और प्रभावी ढंग से संचालित हो सके.