जयपुर: आज हम स्वतंत्रता के अस्सीवें वर्ष का उत्सव मना रहे हैं. तिरंगा लहरा रहा है, राष्ट्रगान गूँज रहा है और देश अपने स्वतंत्र होने पर गर्व कर रहा है. लेकिन इस उत्सव के बीच एक प्रश्न हममें से प्रत्येक को स्वयं से पूछना चाहिए-क्या स्वतंत्रता केवल वह अधिकार है जो हमें मिला है, या वह ज़िम्मेदारी भी है जिसे हमें निभाना है? आईएएस टीकम चंद बोहरा सदस्य राजस्व मंडल ने कहा कि संविधान की उद्देशिका तीन अत्यंत महत्वपूर्ण शब्दों से शुरू होती है-“हम, भारत के लोग…”
यही तीन शब्द भारतीय लोकतंत्र की आत्मा हैं. संविधान यह नहीं कहता—“हम, भारत की सरकार”, “हम, भारत के नेता” या “हम, भारत के अधिकारी.” वह कहता है—“हम, भारत के लोग.” अर्थात इस गणराज्य के असली मालिक भी हम हैं और इसकी सफलता-असफलता के अंतिम उत्तरदायी भी हम ही हैं. हम अक्सर देश की हर समस्या के लिए सरकार, व्यवस्था, नेताओं और अधिकारियों को दोष देते हैं. दोष जहाँ है, वहाँ सवाल अवश्य होना चाहिए; सत्ता से जवाब माँगना लोकतंत्र का अधिकार ही नहीं, नागरिक कर्तव्य भी है. लेकिन क्या कभी हम उतनी कठोरता से स्वयं से भी सवाल करते हैं?
हम गंदगी के लिए नगर निकाय को दोष देते हैं, लेकिन कचरा सड़क पर फेंकने में संकोच नहीं करते. हम कानून-व्यवस्था चाहते हैं, लेकिन अपने हित में कानून तोड़ना हमें अपराध नहीं, सुविधा लगता है. हम भ्रष्टाचार को कोसते हैं, लेकिन अपना काम जल्दी कराने के लिए रिश्वत देने को तैयार हो जाते हैं. हम ईमानदार राजनीति चाहते हैं, मगर मतदान करते समय जाति, धर्म, रिश्ते और निजी लाभ से ऊपर कितनी बार उठ पाते हैं? लोकतंत्र केवल वैसी सरकार नहीं बनाता जैसे नागरिक चाहते हैं; धीरे-धीरे वह वैसा समाज भी प्रकट करता है जैसे नागरिक स्वयं होते हैं.
उद्देशिका हमें न्याय का वचन देती है-सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, लेकिन न्याय केवल अदालतों में नहीं जन्मता. वह हमारे घर, दफ्तर, खेत, दुकान और व्यवहार में भी जन्मता है. किसी मनुष्य को उसकी जाति, धर्म, लिंग, भाषा, गरीबी या पेशे के कारण छोटा समझना संविधान की किताब भले न जलाए, उसकी आत्मा को अवश्य झुलसा देता है.संविधान हमें स्वतंत्रता देता है-विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की. इसका अर्थ केवल यह नहीं कि मुझे बोलने की आज़ादी है; इसका अर्थ यह भी है कि जो मुझसे असहमत है, उसे भी बोलने का उतना ही अधिकार है. अपने लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माँगना अधिकार है, विरोधी की अभिव्यक्ति की रक्षा करना लोकतांत्रिक संस्कार.
उद्देशिका समानता की बात करती है, लेकिन समानता केवल कानून की धाराओं में नहीं, हमारी निगाह में उतरनी चाहिए, जिस दिन किसी व्यक्ति का उपनाम, जाति, धर्म, धन, पद या पहनावा देखकर उसके प्रति हमारे सम्मान की मात्रा तय होना बंद हो जाएगी, उस दिन संविधान काग़ज़ से निकलकर समाज में साँस लेने लगेगा और फिर आता है वह शब्द जिसकी आज शायद सबसे अधिक आवश्यकता है-बंधुता.
हम न्याय की माँग कर सकते हैं, स्वतंत्रता का उपयोग कर सकते हैं, समानता के लिए कानून बना सकते हैं; लेकिन बंधुता कानून के डंडे से पैदा नहीं की जा सकती. वह मनुष्य के भीतर पैदा होती है. यह वह भावना है जो कहती है-तुम्हारा धर्म मुझसे अलग हो सकता है, तुम्हारी भाषा, जाति, विचार और जीवन-पद्धति अलग हो सकती है, फिर भी तुम मेरे ही देश के नागरिक हो; तुम्हारी गरिमा की रक्षा मेरी भी ज़िम्मेदारी है. आज सोशल मीडिया ने प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में एक छोटा-सा प्रसारण केंद्र दे दिया है. एक झूठ, एक अफ़वाह, एक अपमानजनक टिप्पणी हजारों लोगों तक पहुँच सकती है. इसलिए आज नागरिकता का अर्थ केवल मतदान करना नहीं है; कुछ साझा करने से पहले सत्य जाँचना, असहमति में मर्यादा रखना और नफ़रत को आगे बढ़ाने से इनकार करना भी राष्ट्रसेवा है. देश केवल सीमा पर खड़े सैनिक से नहीं बचता. देश उस शिक्षक से भी बचता है जो ईमानदारी से पढ़ाता है; उस कर्मचारी से जो बिना रिश्वत काम करता है; उस व्यापारी से जो सही तौलता है;
उस अधिकारी से जो पद को विशेषाधिकार नहीं, दायित्व समझता है; उस मतदाता से जो अपना वोट बेचता नहीं; और उस सामान्य नागरिक से भी, जो अकेला होने पर भी गलत को गलत कहने का साहस रखता है. हमने स्वतंत्रता विरासत में पाई है, लेकिन स्वतंत्रता की रक्षा विरासत में नहीं मिलती. हर पीढ़ी को उसे अपने आचरण से फिर अर्जित करना पड़ता है. अस्सीवें स्वतंत्रता दिवस पर शायद सबसे सार्थक संकल्प यही होगा कि हम तिरंगा केवल घर पर न लगाएँ, उसके मूल्यों को अपने भीतर भी जगह दें. संविधान को केवल अदालतों, संसद और सरकारी कार्यालयों की वस्तु न समझें. उसे अपने व्यवहार का आईना बनाएँ.
सरकार से प्रश्न करें-पर स्वयं से भी.
अपने अधिकार माँगें-पर दूसरों के अधिकारों की रक्षा भी करें.
देश से अपेक्षा रखें-पर यह भी पूछें कि देश हमसे क्या अपेक्षा रखता है.
क्योंकि राष्ट्र कोई हमसे अलग खड़ी सत्ता नहीं है. राष्ट्र हमारे छोटे-छोटे आचरणों का विराट योग है. “हम, भारत के लोग” केवल संविधान की शुरुआती पंक्ति नहीं है-यह हमें सौंपा गया उत्तरदायित्व है. जिस दिन हम यह समझ जाएँगे कि भारत केवल हमारा देश नहीं, हमारी ज़िम्मेदारी भी है, उस दिन स्वतंत्रता दिवस केवल एक उत्सव नहीं रहेगा-वह नागरिक चरित्र का संकल्प-दिवस बन जाएगा. स्वतंत्रता हमें पूर्वजों ने दी थी; उसे सार्थक बनाना हमारी पीढ़ी का काम है.