जयपुर: राजस्थान के जलदाय विभाग में अफसरों के प्रबंधन को लेकर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं. विभाग में चीफ इंजीनियर के 11 स्वीकृत पद हैं, लेकिन वर्तमान में केवल तीन चीफ इंजीनियर ही पदस्थापित हैं. कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं, जबकि कई जिम्मेदारियां अतिरिक्त प्रभार के भरोसे चल रही हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर विभाग में अफसरों का प्रबंधन क्यों बिगड़ गया है और इसका असर आम जनता से जुड़े कामों पर कितना पड़ रहा है?
राजस्थान का जलदाय विभाग अब व्यवस्था को लेकर पंगु बनता जा रहा है. जलदाय विभाग में चीफ इंजीनियर के 11 पद स्वीकृत हैं, लेकिन महज तीन अधिकारी—देवराज सोलंकी, संदीप शर्मा और नीरज माथुर—ही चीफ इंजीनियर के रूप में पदस्थापित हैं. एक ओर मनीष बेनीवाल लंबे समय से एपीओ चल रहे हैं, वहीं तीन चीफ इंजीनियर महेश जांगिड़, केडी गुप्ता और दिनेश गोयल निलंबित हैं. स्थिति यह है कि क्वालिटी कंट्रोल और जल जीवन मिशन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी नियमित चीफ इंजीनियर उपलब्ध नहीं हैं. विभाग में आठ पद अतिरिक्त प्रभार के सहारे संचालित किए जा रहे हैं.
दो पदों पर तो किसी अधिकारी की नियुक्ति ही नहीं की गई है. जोधपुर में तैनात देवराज सोलंकी को जयपुर में मुख्य अभियंता शहरी का अतिरिक्त जिम्मा दिया गया है, जबकि इस पद पर कार्यरत रहे मनीष बेनीवाल को एपीओ किया जा चुका है. नीरज माथुर भी दो महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. इसके अलावा चार अतिरिक्त मुख्य अभियंताओं को भी चीफ इंजीनियर का कार्यभार सौंपा गया है. इसी तरह भरतपुर में पदस्थापित सुरेंद्र शर्मा को जयपुर ग्रामीण क्षेत्र की जिम्मेदारी भी दी गई है. अधिकारियों पर बढ़ते अतिरिक्त कार्यभार के चलते प्रशासनिक दक्षता और जवाबदेही प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है. विभागीय सूत्रों के अनुसार कई अधिकारी अपनी मूल जिम्मेदारियों के साथ अतिरिक्त दायित्वों को पूरी तरह निभाने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं.
स्थिति सिर्फ चीफ इंजीनियर स्तर तक सीमित नहीं है. जलदाय विभाग में चीफ इंजीनियर से लेकर एक्सईएन स्तर तक कुल 49 महत्वपूर्ण पद खाली बताए जा रहे हैं. कई क्षेत्रों में काम अतिरिक्त प्रभार के भरोसे चल रहा है. उदयपुर और अजमेर क्षेत्रों की स्थिति को विशेष रूप से चिंताजनक माना जा रहा है. वहीं क्वालिटी कंट्रोल विंग में पद रिक्त होने से निगरानी और गुणवत्ता संबंधी कार्यों पर भी असर पड़ने की आशंका है. सवाल यही खड़ा होता है कि विभाग में इतने बड़े स्तर पर पद खाली क्यों हैं?
आखिर नियमित नियुक्तियां कब तक की जाएंगी? जल जीवन मिशन और क्वालिटी कंट्रोल जैसे महत्वपूर्ण प्रकोष्ठों में स्थायी व्यवस्था कब होगी? जलदाय विभाग में अधिकारियों की कमी और अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था अब प्रशासनिक चुनौती बनती दिखाई दे रही है. सवाल यह है कि जब विभाग में दर्जनों महत्वपूर्ण पद खाली हैं, तो आम जनता से जुड़े पेयजल और विकास कार्यों की निगरानी कितनी प्रभावी ढंग से हो पाएगी. अब निगाहें सरकार और विभागीय नेतृत्व पर हैं कि इस स्थिति को सुधारने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं.