VIDEO: निकाय-पंचायत चुनाव से पहले कांग्रेस में जुबानी जंग, दिग्गजों की बयानबाजी से फिर गुटबाजी आई सामने, देखिए ये खास रिपोर्ट

जयपुर: निकाय और पंचायत चुनाव की जंग से पहले राजस्थान कांग्रेस में एक बार फिर कलह शुरु हो गई है. दिग्गजों की बयानबाजी के चलते चुनाव से पहले अब खुलकर गुटबाजी  सामने आने लगी है. पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा के तीखे बयानों से शुरु हुई जुबानी जंग अभी तक थमने का नाम नहीं ले रही है. डोटासरा के बयान के बाद अशोक गहलोत औऱ शांति धारीवाल के तुरंत बयान आने से कांग्रेस की सियासत गर्मा गई है.

महज 15 दिनों के बाद राजस्थान में निकाय चुनाव की रणभेरी बज जाएगी. लेकिन चुनावी जंग में जुटने के बजाय कांग्रेस में तो जुबानी जंग शुरु हो चुकी है. राजस्थान कांग्रेस का पिछला पूरा हफ्ता कह सकते है बयानबाजी के चलते गुटबाजी के नाम रहा. महेन्द्रजीत सिंह मालवीय के पीसीसी से पहले अशोक गहलोत के बंगले पर जाने और चौथी बार गहलोत सरकार के नारों के बाद उपजा विवाद अभी भी शांत होता नहीं दिख रहा. पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने इस घटनाक्रम पर  तीखा हमला करते हुए कहा कि ऐसे नारे लगने के चलते ही तो कांग्रेस की सरकार रिपीट नहीं हो पाई.

डोटासरा के तीखे हमलों के बाद तुरंत फिर अशोक गहलोत का भी बयान आ गया. गहलोत ने कहा कि कांग्रेस के पक्ष में अच्छा माहौल है लेकिन किसी को भी अपनी लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए. हालांकि गहलोत ने किसी नेता का नाम तो नहीं लिया लेकिन माना जा रहा है कि उनका यह इशारा डोटासरा के बयान को लेकर था. डोटासरा और गहलोत की बयानबाजी के बाद हाड़ौती के लाल शांति धारीवाल भी मैदान में कूद पड़े. धारीवाल ने एक बार फिर कहा कि राजस्थान में कांग्रेस के तो आलाकमान अशोक गहलोत ही है.

खास बात है कि इस बार समर्थकों और कार्यकर्ताओं द्वारा यह बयानबाजी नहीं हो रही बल्कि दिग्गज खुद ही बयानवीर बन गए हैं. दिग्गज नेताओं की अचानक शुरु हुई इस बयानबाजी को लेकर अब कांग्रेस गलियारों में कई तरह की चर्चाएं जारी है. सब यही सवाल पूछ रहे है कि आखिर चुनाव से ठीक पहले यह बयानबाजी क्यों हो रही है. निकाय औऱ पंचायत चुनाव की टिकट वितरण के अलावा कई अन्य कारणों से इस बयानबाजी को वो जोड़कर  देख रहे हैं.

खैर, बयानबाजी पावर शेयरिंग की वजह से है या फिर अन्य कारणों से. लेकिन इलेक्शन से जस्ट पहले शुरु हुई यह बयानबाजी पार्टी के लिए बिल्कुल भी शुभ संकेत नहीं है. क्योंकि इस बयानबाजी से गुटबाजी को ही बढ़ावा मिलेगा जिससे चुनावी मोड में आने वाले कार्यकर्ताओं का भी मोरल डाउन होगा. अब देखते है कि दिग्गजों की बयानबाजी के लिए क्या डैमेज कंट्रोल की कोशिश होती है.