जयपुरः फर्स्ट इंडिया न्यूज़ के CEO और मैनेजिंग एडिटर पवन अरोड़ा ने राष्ट्र सेविका समिति प्रमुख कार्यवाहिका अन्नदानम सीता गायत्री का KeyNote by Pawan Arora कार्यक्रम में SUPER EXCLUSIVE INTERVIEW लिया. जिसमें सटीक सवालों का अन्नदानम सीता गायत्री ने जवाब दिया.
अन्नदानम सीता गायत्री का प्रारंभिक जीवन कैसा रहा?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि मेरा जन्म तेलंगाना प्रांत अभी कहते हैं, पहले आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में हुआ था. मेरे पिता जी शुरुआत से राष्ट्रीय स्वयं संघ से जुड़े थे. इसलिए हम परिवार में संघ की विचारधारा से ही पले बढ़े हैं. जब मैं 10 साल की थी तब से हमारे विद्यालय में राष्ट्रीय सेविका समिति की शाखा चलती थी. तो मैंने जाना शुरू किया था, सरस्वती शिशु मंदिर की मैं छात्रा हूं. बचपन से लेकर 10वीं तक शिक्षा की. वहां पर राष्ट्रीय विचारधारा होने के कारण देशभक्ति और समाज सेवा का भाव. जो घर में था, वैसा ही अनुकूल वातावरण स्कूल में मिला. जैसे ही मेरी पढ़ाई हुई, संघ में जैसे प्रचारक रहते हैं, वैसे मैंने भी अपना जीवन इसी कार्य में लगाया. अभी 32 वर्षों से मैं राष्ट्रीय सेविका समिति की प्रचारिका के नाते काम कर रही हूं.
महिलाओं के लिए अलग संगठन क्यों बना?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि उस समय की सामाजिक परिस्थिति ऐसी थी कि महिलाएं ज्यादातर सामाजिक कार्य में भाग नहीं लेती थीं. लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं ने थोड़ा बाहर आकर काम करना शुरू किया. उस वक्त लक्ष्मीबाई केलकर जी जो राष्ट्रीय सेविका समिति की संस्थापिका हैं. वो भी कांग्रेस के द्वारा चलने वाले स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेती थीं. महात्मा गांधी जी को सुनती थीं और सामाजिक परिस्थिति का भी वो निरीक्षण कर रहीं थीं. समाज के लिए कुछ करना, ऐसा उनके मन में विचार चल रहा था. उसी वक्त उनके बेटे का संघ में जाते हुए डॉक्टर जी के साथ परिचय हुआ. तो उनके जो मन का मंथन था, उसको आधार मिला. और उसी ध्येय को लेकर उन्होंने काम करने का विचार उनके साथ शेयर किया. तब उन्होंने बताया कि जो शाखा हम चलाते हैं वो पुरुषों के लिए है. अगर आप चाहते हैं तो अलग से संगठन बनाकर काम कर सकते हैं. हम जरूर आपको मदद करेंगे, तब से आज तक भाई लोग मदद करते हैं. इसकी रीति-नीति कार्य पद्धति भी वही है और 1936 से लेकर अब तक कार्य अनवरत चल रहा है.
क्या स्वतंत्रता संग्राम में सेविका समिति की भूमिका रही?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि महत्वपूर्ण तो नहीं कह सकते क्योंकि 1936 में शुरू हुआ, 1947 में स्वतंत्रता मिल गई. लेकिन स्वयं वंदनीय मौसी जी लक्ष्मीबाई केलकर और कुछ सेविकाएं आंदोलन में भाग लेती थीं. महात्मा गांधी जी की सभाओं में जाना, वहां से जो प्रेरणा मिलती थी, जो आंदोलन चलता था उसमें सहभागी रहते थे.
राष्ट्र सेविका समिति का अंतिम लक्ष्य क्या है?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि तेजस्वी हिंदू राष्ट्र पुनर्निमाण, यह राष्ट्रीय सेविका समिति का ध्येय है. उसके लिए हम हमारी प्रार्थना में बोलते हैं कि तेजस्वी मां बनना, धन्य मां बनना. भारत की महिलाओं की एक विशेष ताकत है. और विश्वास करते हैं कि हम जैसा संकल्प करते हैं वैसी ही संतान को हम दे सकते हैं. और मातृत्व जो है ये केवल बायोलॉजिकल सिस्टम नहीं है ये स्टेट ऑफ माइंड है. मन की विचारधारा है, विशाल मातृत्व भावना से समाज के सभी के अंदर अच्छे गुण प्राप्त करने के लिए वो प्रयास करती हैं, और ये प्रयास महिलाएं करती रहेंगी. तो हम तेजस्वी भारत का संकल्प कर रहे हैं वो प्राप्त कर सकते हैं. यह राष्ट्रीय सेविका समिति का विश्वास है, उसी उद्देश्य को लेकर समिति 90 सालों से काम कर रही है.
सेविका समिति के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां क्या रहीं?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि संगठन जब प्रारंभ हुआ था, तब बहुत बड़ी चुनौती थी. ग्राउंड पर महिलाओं का शारीरिक काम करना, क्योंकि तब भारत में ऐसी स्थिति नहीं थी. तब बालिका शिक्षा ही बहुत कम होती थी, भारत में जो आक्रमण हुए थे. उस दौरान बहुत कम बालिकाएं विद्यालय जा पाती थीं. तो मैदान में युवतियों को खड़ा करके उनको शारीरिक प्रशिक्षण देना अपने आप में एक चुनौती थी. लेकिन उस वक्त लक्ष्मीबाई केलकर ने अनेक चिंतकों के साथ बैठकर
बहुत सारे विषयों को राष्ट्रीय सेविका समिति के जरिए करना प्रारंभ किया था. 1953 में भारतीय स्त्री जीवन विकास परिषद का निर्माण किया था. उसके बाद शाखा कार्य के अलावा महिलाएं अलग से क्या कर सकती हैं ? उस पर विचार करते थे. लड़कियों के पढ़ने के लिए हॉस्टल शुरू किया. उसके साथ वर्किंग वूमन जो थीं, उनके लिए भी हॉस्टल बनाया था. दूसरा है पालनाघर, जो महिलाएं बाहर काम करने जाती थीं. उनके बच्चों को परिवार का वातावरण देते हुए प्यार से संभालना ऐसे ही अलग-अलग काम के जरिए समाज की समस्याओं का निदान अपने आचरण से करना है, यह शुरू किया था.
समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए क्या प्रयास?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि हम सोचते हैं कि कुरीतियों का विरोध करना समस्या का निदान नहीं है. एक्शन प्लान जिसको हम बोलते हैं उसी के लिए अलग-अलग काम शुरू हुआ. जैसे कोई महिला शिक्षा से वंचित है उनको शिक्षा दिलवाना. उदाहरण के लिए नॉर्थ ईस्ट में शिक्षा के लिए बहुत कठिन परिस्थितियां थीं. 10 से 15 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था. ऐसे में हमने उनके लिए नागपुर में एक छात्रावास शुरू किया था. आज तक वहां से 400 बालिकाएं पढ़ चुकी हैं.
वो नॉर्थ ईस्ट से आकर जितनी पढ़ाई करना चाहती थीं, वो पढ़ाई उन्होंने की. वहां से जाकर वापस सामाजिक कार्य में नेतृत्व कर रही हैं. जम्मू कश्मीर में भी आतंकवाद से पीड़ित अनेक परिवार हैं. वहां के बच्चों को संभालने वाला कोई नहीं है. उनके बच्चों को संभालने के लिए नि:शुल्क छात्रावास हम चलाते हैं. लद्दाख जैसे क्षेत्र में तो पैसों के लिए लड़कियों को बेच दिया जाता है. वहां से हम लड़कियों को लेकर पंजाब के जालंधर में लड़कियों को छात्रावास में पढ़ाते हैं. बच्चों के लिए हम छात्रावास चलाते हैं, ऐसे काम करना ही राष्ट्रीय सेविका समिति का ध्येय है.
राष्ट्र सेविका समिति का नेटवर्क कितना बड़ा है?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि पूरे भारत में समिति की दृष्टि से 1044 जिले हैं. उसमें से 850 जिलों में राष्ट्रीय सेविका समिति काम कर रही है. केवल सीमा क्षेत्र या कुछ दुर्गम स्थान हैं वहां तक महिलाओं का पहुंचना मुश्किल है. वहां कठिनाई आती है, ऐसे जिलों में हमारा काम नहीं है. बाकी सब जगह राष्ट्रीय सेविका समिति काम कर रही है.
संघ परिवार में महिलाओं की भूमिका क्या है?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि हम उसी परिवार के भाग हैं, अलग नहीं हैं. जैसे संघ के बारे में बताते हैं तो शाखा मैदान में महिलाओं का काम अलग है, पुरुषों का काम अलग है. अभी विश्व हिंदू परिषद में राष्ट्रीय सेविका समिति के लोग कार्य कर रहे हैं. धार्मिक क्षेत्र में जिनको रूचि है वो वहां चले जाते हैं, विद्यार्थी इकाई में महिला सेविकाएं काम करती हैं. अलग संगठन हमारा नहीं है, हम अलग नहीं हैं हम एक ही हैं. अलग से काम नहीं है, सब मिलकर काम करते हैं.
RSS और सेविका समिति में समन्वय कैसे होता है?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि हम सभी बैठकों में एक साथ आते हैं विचारधारा तो एक ही है. अभी भाई का घर अलग और बहन का घर अलग होता है. लेकिन भाई-बहन त्योहारों में एकत्रित हो जाते हैं. और एक विचार से एक परिवार से अब अलग-अलग जगहों पर काम करते हैं. करना तो हम सबको सामाजिक क्षेत्र में है, बैठकों में हम साल में दो-तीन बार मिलते हैं और विचार मंथन होता है. प्रतिनिधि सभा में हम कुछ कार्यकर्ता जो अपेक्षित हैं वो वहां जाते हैं, विचार रखते हैं. हमारे यहां सामूहिक निर्णय होता है, इसलिए हम एक ही विषय को लेकर समाज में कैसे चलाना है ? अलग-अलग पद्धत्ति के द्वारा हम अलग-अलग कार्यक्रमों के द्वारा चलाते हैं.
विजयादशमी का RSS और सेविका समिति से क्या संबंध?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि अपने इतिहास, संस्कृति और परंपरा में ही विजयादशमी का बहुत महत्व है. राम-रावण युद्ध हुआ, रामजी को उसी दिन विजय प्राप्त हुई. धर्म की अधर्म से जब लड़ाई होती है तो धर्म का विजय प्राप्त होने वाला दिन विजयादशमी है. इसको हम शुभ मानते हैं और अपनी संस्कृति परंपरा में जो भी अलग काम करना होता है. तो उसके लिए अलग मुहूर्त नहीं देखना पड़ता है, ऐसा मुहूर्त विजयादशमी है. इसीलिए संगठनों की स्थापना करने वाले उन दिनों में ऐसा सोचकर यह धर्म का ही कार्य है. राष्ट्रधर्म, सामाजिक धर्म हमको निभाना है. हर व्यक्ति के अंदर इन भावनाओं को जागृत करना है तो उसी को मुहूर्त लेकर निकला था. और हमारी विजय परंपरा तो इतने वर्षों में चलते ही आई. एक महिलओं का संगठन 90 साल बिना रूकावट चलते आना. और देशभर में एक 'द लार्जेस्ट वूमेन ऑर्गेनाइजेशन" इतनी नेटवर्किंग किसी की नहीं है. और एक ही विषय, एक ही ध्येय को लेकर चलने वाला है. यह ताकत जो मिली है वो शायद उसी शुभ मुहूर्त के दिन शुरू होने के कारण ऐसा लगता है.
महिला सशक्तिकरण का असली अर्थ क्या है?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि थोड़ा मैं इसको केवल महिला सशक्तिकरण नहीं मानती. महिला नेतृत्व करने वाली शक्ति आज समाज में जागृत हो रही है. क्योंकि दुर्भाग्य है कि आज महिलाओं के स्वावलंबन को ही सशक्तिकरण मानने की स्थिति आ गई. आर्थिक स्वावलंबन सशक्तिकरण नहीं है.
क्या पूरे भारत में मद्य निषेध होना चाहिए?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि बिल्कुल, सरकार को करना ना पड़े व्यक्ति खुद के अंदर से आना ही हमारा प्रयास है. मुझे ये काम नहीं करना है ये अंत:प्रेरणा होती है.
महिलाओं पर बढ़ते अत्याचार कैसे रुकेंगे?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि सरकार के कानून बनाकर प्रयास करने पर भी घरेलू हिंसा हो रही है. इसका पहला कारण है हम अपनी संस्कृति को भूल चुके हैं. हमारा सनातन धर्म कहता है 'मातृवत् परदारेषु'. यानि कोई भी स्त्री को देखने की दृष्टि पुरुषों की कैसी होनी चाहिए कि वो मेरी अपनी माता है. तो ऐसा देखने की दृष्टि पुरुषों की बनती है तो स्वाभाविक महिला सुरक्षा बनी रहती है, सुरक्षित होती है. और अपने आपकी सुरक्षा रखने की ताकत भी महिला के अंदर होती है. वह भी महिला कभी-कभी भूल जाती है, तो हम करते हैं. महिला की सुरक्षा घरेलू हिंसा से दूर रहने के लिए ये दोनों बढ़ाना जरूरी है. पुरुषों का नजरिया महिला के प्रति मां के स्वरूप में है उसके लिए भी एक महिला ही प्रयास करना है.
महिलाओं के लिए आत्मरक्षा प्रशिक्षण कितना जरूरी?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि हमारा संगठन जब से शुरू हुआ, तब से मैदान में महिलाओं के साथ शारीरिक कार्यक्रम करवाते हैं. दंड चलाना अभी वर्तमान में नि:शस्त्र युद्ध यानि कराटे शुरू किया था. सिखाने का काम जो हम करते हैं, उससे अभी तक लाखों युवतियों को राष्ट्र सेविका समिति ने ऐसा प्रशिक्षण दिया. हर वर्ष एक ही जगह पर रहकर 15 से 20 हजार युवतियां यह प्रशिक्षण लेती हैं. और अपने-अपने स्थानों पर ये वापस जाकर सिखाती भी हैं. जब समाज में दंगे होते हैं. एक प्रत्यक्ष उदाहरण बताना चाहती हूं. पश्चिम बंगाल में पिछली बार चुनाव के बाद गांवों में दंगे हो गए. अपने घर में सब्जी काटने वाले चाकू लेकर दो युवतियां, जो हमारी प्रशिक्षित सेविकाएं हैं ने परिवार के सभी लोगों को बचाया. और धमकी देकर गए थे वो लोग कि हम रात को आकर पूरे गांव की लड़कियों पर कुछ करेंगे. लेकिन इसके पहले एक पूरे गांव को एकत्रित करके एक ताकत खड़ा किया. गांव की रक्षा की यानि हमारी प्रशिक्षित सेविकाएं आज परिवार की गांव की रक्षा करने की ताकत रखती हैं.
महिलाओं की भूमिका आने वाले भारत के लिए अहम ?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि बिल्कुल, अभी हम समाज में जो परिवर्तन देख रहे हैं, क्योंकि वापस रूट्स पर जाना. जिसको हम कहते हैं, हम कहां से आए हैं, हमारा क्या है वह पहचानने की एक समाज में स्थिति आ गई है. बहुत सारे पढ़े लिखे युवा-युवतियों को आज हम देखते हैं वापस अपने पैतृक गांव में जाकर कुछ सेवा कार्य करना. वहां विद्यालय के लिए कुछ डोनेशन देना और स्वंय जाकर पढ़ाना. छुट्टियों को मनाने के लिए वहां जाते हैं तो पूरे गांव के लोगों की समस्याएं सुनना. हम निदान कैसे कर सकते हैं ? आज इस प्रकार के सेवा कार्य करने में भारत की युवा पीढ़ी आगे बढ़ रही है. हमें विश्वास है कि अगर हम ऐसा काम निरंतर करते रहेंगे तो एक पर्टिकुलर प्वाइंट पर तो परिवर्तन आ ही जाएगा. हमारा काम ही ऐसा है कि व्यक्ति निर्माण से सामाजिक परिवर्तन. सामाजिक परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन ये तीन काम लगातार प्रोसेसिंग में हैं. और इस कारण से भविष्य में भारत में और अच्छा हम देख सकते हैं. भारत का अमृतकाल अभी चल रहा है 2047 तक विकसित भारत जो हम देखना चाहते हैं. उसके लिए भारत के युवा एक प्रकार से तैयार हो रहे हैं, ऐसा दृश्य हमें दिखता है.
राजनीति-नौकरियों में महिलाओं का आरक्षण बढ़ाना चाहिए?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि अभी आरक्षण के संदर्भ में मौका जैसे ही मिलता है महिलाएं आगे तो बढ़ती ही हैं. और आरक्षण ही चाहिए ऐसा नहीं है. राष्ट्र सेविका समिति की मान्यता है कि अपने कर्तृत्व से महिलाएं अपने स्थान को प्राप्त करना. तो वो प्राप्त करने के लिए जो प्रयास हैं, वो प्रयास महिलाएं कर रहीं हैं और आगे बढ़ रही हैं. कहीं-कहीं तो आरक्षण से अधिक स्थान भी आज कल महिलाओं को अपने हिसाब से उनके कर्तृत्व के कारण मिलता है. ऐसी शक्ति उनके अंदर है, महिला के अंदर दुर्गा शक्ति है. अगर वो शक्ति बाहर आती है तो देवी-देवता सब उनको ही आगे खड़ा करते हैं ऐसी स्थिति को लेकर हमें आना है.
RSS और राष्ट्र सेविका समिति में क्या है अंतर?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि दिखाई नहीं देता ऐसा नहीं कह सकते हैं, बस प्रकट नहीं होता ये अंतर है. अपने आपको समिति की हूं ऐसा परिचय करने वाले नहीं होंगे. लेकिन समिति की विचारधारा से चलने वाले आज सभी क्षेत्र में हैं. उनके अंदर वो भावना है, वो प्रचार में नहीं हैं, कई विविध क्षेत्रों तक समिति की व्याप्ति नहीं है. और संगठन के नाते जितना प्रांतों तक और विस्तार होना है महिलाओं के समाज में
स्थिति और नियमों के कारण विस्तार कम हैं. लेकिन 20-25 सालों में कई क्षेत्रों में समिति की महिलाएं आगे बढ़ रहीं हैं.
RSS को धार्मिक संगठन क्यों कहा जाता है?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि हिंदू राष्ट्र की कल्पना ऐसी है कि ये एक सनातन राष्ट्र है. राष्ट्र केवल एक भूमि का टुकड़ा नहीं है, प्रजा को देश की मातृभूमि की भक्ति होनी चाहिए. सांस्कृतिक विरासत होनी चाहिए, शत्रु मित्र की भावना होनी चाहिए. उनको हम कहते हैं राष्ट्र, ऐसे राष्ट्र के पुनर्निमाण का काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, राष्ट्रीय सेविका संघ भी कर रहे हैं. स्पष्टता देने में आज शिक्षा क्षेत्र कारण है, क्योंकि जो कंटेंट दिया है. वो गलत होने के कारण 3-4 पीढ़ियों को उसकी स्पष्टता नहीं रही. लेकिन अगर हम भारत के सनातन धर्मों में पढ़ने वाले मंत्रों में जब देखते हैं. तो कोई भी अच्छा कार्य होता है तो मुहूर्त निकलता है, उस मुहूर्त के समय पूरे भारत में एक ही मंत्र बोलते हैं. ध्रुवं ते राजा वरुणो ध्रुवं देवो बृहस्पतिः । ध्रुवं त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्रं धारयतां ध्रुवम् ।। यानि राष्ट्र की धारणा की कल्पना अनादि काल से है, बीच के कालखंड में हम भूल गए. फिर से उसको वापस याद दिलाने में थोड़ा समय लगेगा, हम काम कर रहे हैं.
राजनीति में कदम रखने का मन है?
अन्नदानम सीता गायत्री ने कहा कि बिल्कुल नहीं करता, हम सब प्रचारक हैं. प्रचारक जीवन के लिए हमें बताया जाता है कि हम पोस्ट कार्ड जैसे हैं. जो एड्रेस लिखा जाता है संगठन की ओर से, वहां जाकर वो काम करते हैं. तो यह प्रचारिका परंपरा भी संगठन के प्रारंभ से है. तो हम समाज के प्रति ऋणी हैं उस ऋण को चुकाने के लिए ही ये काम स्वीकार किया. और उसी में ही हमें आनंद है और किसी प्रकार की कोई व्यक्तिगत इच्छा नहीं है.