जयपुर: देशभर में केंद्रीय सरकारी एजेंसियों के अधिकारियों-कर्मचारियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में आमतौर पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी CBI की भूमिका प्रमुख मानी जाती है. खासतौर पर CGST, रेलवे और अन्य केंद्रीय विभागों में रिश्वतखोरी या भ्रष्टाचार की शिकायतों पर CBI कार्रवाई करती रही है. लेकिन राजस्थान में पिछले कुछ मामलों ने केंद्रीय एजेंसियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को लेकर एक अलग तस्वीर सामने आई है. यहां केंद्रीय विभागों के अधिकारियों और उनसे जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई प्रदेश की भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी ACB करती नजर आ रही है.
सबसे ताजा मामला राजसमंद का है, जहां हाल ही में पहले ACB ने CGST से जुड़े दलालों को ट्रैप किया. कार्रवाई के बाद उदयपुर स्थित CGST अधीक्षक के आवास से करीब 17.30 लाख रुपए नकद बरामद किए गए. इसके अलावा 143.5 ग्राम सोना और 368.1 ग्राम चांदी के जेवर भी बरामद हुए. मामला केंद्रीय कर विभाग से जुड़ा होने के कारण इस कार्रवाई ने केंद्रीय एजेंसियों में भ्रष्टाचार की शिकायतों और उन पर होने वाली जांच को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. इसी तरह हाल ही में बांदीकुई में ACB ने रेलवे के एक अधिकारी को भी ट्रैप किया. रेलवे पूरी तरह केंद्रीय सरकार के अधीन आने वाला विभाग है.
ऐसे में केंद्रीय विभाग के अधिकारी के खिलाफ राज्य की भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी की कार्रवाई ने यह सवाल और बड़ा कर दिया है कि आखिर राजस्थान में केंद्रीय विभागों में भ्रष्टाचार की शिकायतों के लिए परिवादी CBI का रुख क्यों नहीं कर रहे, आमतौर पर केंद्रीय विभागों में भ्रष्टाचार के मामलों में CBI को प्रमुख जांच एजेंसी माना जाता है. केंद्र सरकार के विभागों में रिश्वतखोरी, पद के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों पर CBI की एंटी करप्शन यूनिट कार्रवाई करती रही है. ऐसे में राजस्थान में CGST और रेलवे जैसे केंद्रीय विभागों के मामलों में लगातार ACB की कार्रवाई सामने आना चर्चा का विषय बन गया है.
हालांकि राज्य ACB को भी भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत कार्रवाई करने की परिस्थितियां और अधिकार प्राप्त हैं. यही वजह है कि केंद्रीय विभागों से जुड़े मामलों में ACB की कार्रवाई को सीधे तौर पर गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता. लेकिन सवाल यह है कि केंद्रीय एजेंसियों के खिलाफ शिकायत करने वाले परिवादी CBI के बजाय राज्य ACB तक क्यों पहुंच रहे हैं?राजस्थान में सामने आए इन मामलों ने CBI की राज्य में सक्रियता और केंद्रीय विभागों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में उसकी भूमिका पर चर्चा छेड़ दी है. क्या परिवादियों को स्थानीय स्तर पर ACB तक पहुंचना आसान लगता है?
क्या ACB की त्वरित कार्रवाई के कारण परिवादी उसी का रुख कर रहे हैं? या फिर केंद्रीय विभागों में भ्रष्टाचार की शिकायतों को लेकर CBI तक पहुंचने की प्रक्रिया को लेकर कोई धारणा बनी हुई है, यह भी बड़ा सवाल है कि जब मामला केंद्रीय विभाग के अधिकारी से जुड़ा है तो परिवादी की पहली पसंद CBI क्यों नहीं बन रही? यदि आने वाले समय में केंद्रीय विभागों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों में राज्य ACB ही लगातार कार्रवाई करती रही तो राजस्थान में CBI की भूमिका को लेकर यह सवाल और ज्यादा गंभीर हो सकता है.