KeyNote by Pawan Arora: क्या राजनीति से खत्म होगा जातिवाद ? जानिए घनश्याम तिवाड़ी ने SUPER EXCLUSIVE INTERVIEW में क्या कहा ?

जयपुरः फर्स्ट इंडिया न्यूज़ के CEO और मैनेजिंग एडिटर पवन अरोड़ा ने राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी का KeyNote by Pawan Arora कार्यक्रम में SUPER EXCLUSIVE INTERVIEW लिया. जिसमें सटीक सवालों का घनश्याम तिवाड़ी ने जवाब दिया. 

ABVP से राजनीति तक कैसे पहुंचे घनश्याम तिवाड़ी?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि एक्टिव पॉलिटिक्स में आना एक संयोग था. मैं RSS से जुड़ा हुआ था, यूनिवर्सिटी में आने के बाद ABVP का काम किया. राजस्थान का संयोजक रहा, कई बड़े-बड़े आंदोलन किए. मैं एक बार सीकर के रेलवे स्टेशन पर था, संघ के प्रचारक ब्रह्मदेव जी शर्मा थे. वहां उन्होंने कहा कि मेरे से मिलने आना तो मैं गया. उन्होंने मुझे कहा कि देखो इस समय देश में यंगस्टर्स की चिंता है, चर्चाएं बहुत हैं. मोहन दारिया, चंद्रशेखर जी, तारकेश्वर सिन्हा और इनको भारतीय पॉलिटिक्स में यंगस्टर्स कहा जाता था. उस समय जनसंघ की कोई यूथ विंग नहीं थी. उन्होंने मुझसे कहा कि हमने तय किया है कि राजस्थान युवा जनसंघ के आप अध्यक्ष होंगे. और गाजियाबाद अधिवेशन है, आप वहां चले जाइए. इतना कहते ही मैं रात को ट्रेन में बैठकर गाजियाबाद चला गया. और वहां मुझे अटल बिहारी वाजपेयी जी ने राजस्थान युवा जनसंघ का अध्यक्ष घोषित कर दिया. और वहां से मेरी ये शुरुआत हो गई. 

सीकर से सांगानेर तक क्यों बदली सीटें?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि ये ऐसा हुआ कि मुझे 77 में टिकट मिल गई थी. और मैं एकमात्र आदमी था, जिसने 77 की मिली हुई टिकट को वापस कर दी मैंने कहा कि हमारे से बड़े मदनलाल सोनी एक एडवोकेट थे. उनके साथ मैं शुरू-शुरू में प्रेक्टिस करता था. मैंने कहा कि उनको दे दें तो उनको टिकट मिल गई और वो हार गए थे. ढाई साल बाद ही विधानसभा के फिर चुनाव हुए. तो मुझे बिना मांगे ही सीकर से विधानसभा की टिकट मिल गई. सीकर कोई बीजेपी के लिए कोई अच्छी constituency नहीं थी, मैं पहला बीजेपी का सीकर से ही नहीं. हिंदुस्तान में 6 अप्रैल 1980 को बीजेपी बनी, 1 जुलाई  1980 को राजस्थान विधानसभा के रिजल्ट आए. उसमें 32 MLA जीत गए और पहला रिजल्ट मेरा ही आया. तो मैं बीजेपी बनने के बाद पहला MLA हूं कमल वाला, 80 में बन गया फिर 85 में दोबारा जीत गया. फिर 90 के चुनाव हुए, उसमें भी मैं जीत गया था. लेकिन बलराम जाखड़ जी वहां से सांसद थे, लोकसभा के स्पीकर थे. उस समय चुनाव आयोग कुछ नहीं होते थे तो उन्होंने घोषित करवा दिया हारा हुआ. मैंने फिर रिट की, उसका 16 दिसंबर को रिजल्ट आया. और 6 दिसंबर को बाबरी का ढांचा ढहा दिया था. तो उसी 16 तारीख को नरसिंहराव जी ने चारों विधानसभाओं को भंग कर दिया था. जज ने फैसला दिया कि Writ is Allowed... तो वैसे मेरा एक टर्म गिना जाना चाहिए. लेकिन उस समय हमको कोई पेंशन मिल जाएगी, इसकी कोई परवाह नहीं थी. इसलिए हम गए नहीं उस काम में, वरना तो 7 टर्म काउंट होते हैं. 

भैरोंसिंह शेखावत से पिता-पुत्र जैसा रिश्ता!
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि मैं जब 1980 में चुनाव जीतकर आया. तो उन्होंने मुझे विधानसभा में चढ़ते समय एक बात कही थी कि ये जो विधानसभा का पटल है. उसमें दो काम करता है या तो बार-बार MLA बनाता है या नेता बनाता है तो तुमको नेता बनना है. नेता बनना है, इसका मतलब है कि पब्लिक के इश्यूज उठाने हैं. और शुरू से लेकर आखिर तक विधानसभा में बैठना है. तो मैंने वो तय कर लिया और एक साल में उनको ये लगा कि ये लड़का अच्छा है. तो उन्होंने फिर मुझे कागज देने शुरू किए, फिर मैं स्वत: ही काम करता गया. मैरे उनसे संबंध अभी के नहीं, आपको एक किस्सा सुनाता हूं बहुत जोरदार. भैरोंसिंह जी का फ्रैक्चर होकर पैर टूट गया था और वो SMS अस्पताल में थे. डॉक्टर पी.के. सेठी ने उनका इलाज किया था तो उस समय दर्द हो रहा था. डॉक्टर ने कहा कि इनका पैर पकड़ लो, मैंने उनका जोर से पैर पकड़ा, उनके दर्द जोर से हुआ. तो उन्होंने पकड़कर जोर से मेरा कान खींचा, फिर वो ठीक हुए तो बोले सॉरी भाई मैंने तुम्हारा कान खींचा. मैंने कहा साहब आपने तो कान मेरा आज खींचा है, मैंने तो आपका बहुत पहले खींचा था. तो बोले कि कैसे ? मैंने कहा जब आप चुनाव 52 पहले सीकर चुनाव लड़ने गए थे तब मैं तो 4 साल का था. मैरे ताऊजी उस समय अध्यक्ष हुआ करते थे, आप उनसे मिलने गए. मैं घर में ही था, आपने मुझे उठा लिया था. तो आपका साफा और वो कपड़े देखकर मुझे गुस्सा आया, तो मैंने आपके कान खींच लिए थे. मैंने तो आपके पहले ही पैर पकड़े हुए हैं तो ये किस्सा उनके साथ हुआ था. तो उनका और मेरा संबंध घरेलू भी रहा और सीकर जिले के कारण से भी रहा. उनकी मारवाड़ी-शेखावाटी में बोलने की आदत थी, मेरी भी वही आदत थी. इस कारण से मेरा और उनका बहुत अच्छा संबंध था. लेकिन वो राजनीति में एक आदर्श पुरुष थे. प्रैक्टिकल राजनीति अगर किसी को सीखनी है तो भैरोंसिंह जी का जीवन उसके लिए पुस्तक है. 

ग्रीन बुक कंठस्थ, विधानसभा में छा जाते थे तिवाड़ी!
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि कुछ बातें तो ऐसी हैं कि ग्रामीण परिवेश में रहा हूं. तो ग्रामीण परिवेश में रहने से मुझे वो ग्रामीण क्षेत्र की बोली, मुहावरे वो सारे थे. तो मौके पर उनको फिट करने का, दूसरा मेरी भाषण की शुरू से ही रही है. डॉ. जगदीश चंद्र जी हैं वो भी डिबेट में आते थे. और हम दोनों यूनिवर्सिटी के टाइम पर बहुत बढ़िया डिबेटर थे. उनको कभी पहला पुरस्कार मिलता, कभी मुझे मिलता. उस समय मेरी आदत डिबेट की थी, इस कारण सब ठीक प्रकार से चला. 

घनश्याम तिवाड़ी को आज भी याद आती है विधानसभा
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि विधानसभा बहुत याद आती है और विधानसभा से बढ़िया कोई जगह नहीं है. लेकिन राज्यसभा में जाकर ऐसा लगा कि विधानसभा में जो अनुभव है. वो मुझे राज्यसभा में काम आ रहा है. आज राज्यसभा में भी मुझे भगवान की कृपा से अच्छा स्थान मिल रहा है और वो काम आ रहा है. लेकिन राज्यसभा में वास्तव में ही बहुत बड़े-बड़े लोग हैं. सारे देशभर की बातें जो वहां पर आती हैं तो राज्यसभा जो है वो बहुत बड़ी चीज है. 

8-10 संसदीय कमेटियों में क्यों हैं तिवाड़ी?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि मैं वन नेशन, वन इलेक्शन JPC में हूं. एक अपने जेपीसी बनी थी, उसमें सहकारिता की उसमें भी था. तो करीब करीब मैं 8-10 कमेटियों में हूं. उन्होंने जो मुझे काम दिया मैं वो कर रहा हूं. 

क्या 2028 के बाद चुनाव लड़ेंगे घनश्याम तिवाड़ी?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि अब विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं होती. अब तो मेरी कोई चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं है. क्योंकि मैं जिस समय रिटायर्ड होउंगा राज्यसभा से मैं 82 को हो जाउंगा. तो 30 साल का मैं बना था MLA और 82 साल तक रह गए. आखिर आदमी कहीं न कहीं मन को थोड़ी सांत्वना देनी चाहिए कि इसके आगे. वो तो भगवान की दया से जो हुआ ठीक है, वरना 80 वर्ष की उम्र में लोग रिटायर्ड हो ही जाते हैं. 

क्या बेटे को राजनीति में आगे बढ़ाएंगे तिवाड़ी?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि आशीष भी राजनीति में काम कर रहा है और अब बीजेपी में परिवारवाद नहीं है. अगर काम करेगा, अच्छा काम करेगा तो उसको पार्टी सोचेगी. मेरी तरफ से किसी को लड़ाने की इच्छा नहीं है. 

वसुंधरा राजे से रिश्तों पर बोले घनश्याम तिवाड़ी
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि वसुंधरा के साथ मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं, पहले भी थे अब भी हैं. वो एक ग्रहों का चक्कर होता है, ग्रहों के चक्कर में वो कालखंड आ गया था. उस कालखंड को मैं भूल गया हूं वो भी भूल गई और यहां तक कि पार्टी भी भूल गई है. जब मुझे राज्यसभा की टिकट दे रहे थे, उस समय ये परिस्थिति थी कि टिकट के लिए वहां गया. तो मोदी जी के पास ये मामला जब गया, तो उन्होंने कहा कि नहीं मैं घनश्याम को 40 साल से देख रहा हूं. 4 महीने का काम नहीं देख रहा हूं और उसका हुआ भी नहीं. आप आश्चर्य करेंगे कि मैंने भारत वाहिनी बनाई सारा काम किया. फिर भी मुझे बीजेपी से निष्कासित नहीं किया गया,इसलिए बीजेपी में ही हूं.  

शिक्षा मंत्री वाला कार्यकाल क्यों है खास?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि शिक्षा मंत्री का कार्यकाल जो है, वो यादगार कार्यकाल लगता है. उसमें जितने काम हुए थे, वो आज कर रहे हैं. उसमें कुछ बातें ऐसी हैं जो कभी हुईं नहीं थीं. जैसे हमने 8,300 विधवाओं को जो 10वीं और 12वीं पास हैं उनको आते ही नौकरी देने का काम किया. 

विधवाओं को नौकरी देकर बदली हजारों की जिंदगी
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि 8,300 विधवाओं को उस वक्त नौकरी मिली और जब वो फाइल मेरे पास आई. तो तत्कालीन सचिव ने लिखा कि बिना BSTC, B.ED किए हुए इनको नौकरी नहीं दे सकते. तब मैंने मेरे हाथों से लिखा, इनको नियुक्ति दी जाए. और सरकारी खर्चे पर इनको B.ED, BSTC कराई जाए और वो कराई गई. वो अपने आप में एक उदाहरण था, हमने प्राथमिक स्कूल खोले, प्राइवेट कॉलेज राजस्थान में नहीं थे. सबसे पहले प्राइवेट यूनिवर्सिटीज का बिल मैं लेकर आया था. प्रोफेसर रेसपाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला कर दिया था. कि एक कानून नहीं बना सकते, सबके लिए अलग-अलग कानून बनाना पड़ेगा. हर यूनिवर्सिटी के अलग-अलग कानून मैं लेकर आया. इस तरह हमको यूनेस्को पुरस्कार मिला था, पहली बार राजस्थान स्टेट को मिला. तो कई अच्छे काम हुए, पारदर्शी तरीके से भर्ती हुए 1,18,000 हजार लोगों को RPSC के माध्यम से भर्ती किया. किसी की लास्ट नियुक्ति तक सिफारिश नहीं थी, मेरिट के आधार पर निर्णय किए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि था कि ऐसा ही होना चाहिए और उस वक्त केंद्र में सरकार कांग्रेस की थी. उन्होंने आदेश निकाला कि जैसे राजस्थान में भर्ती हुई है उसी प्रकार से भर्तियां की जाएं. 

सरकारी स्कूलों पर घनश्याम तिवाड़ी की बड़ी चिंता
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि सरकार को शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए, सरकारों ने दी भी है. पहले के समय से आज स्थिति बहुत बदल गई है. पहले किसी विद्यालय में बच्चों के लिए और बच्चों के लिए अलग-अलग शौचालय नहीं थे. अब शौचालय बन गए और कुछ काम ऐसे हैं, जैसे जर्जर भवन हैं. तो उन भवनों को ठीक करने के लिए उनका काम शिक्षा क्षेत्र में होना चाहिए. शिक्षा क्षेत्र में पैसा भी खूब आ रहा है और इसमें दो बातें साफ हो गई हैं. इसको कहने में मुझे हिचक नहीं है कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे गरीब हैं. गरीब घरों के हैं और उसमें भी अगर बच्चा और बच्ची दोनों हैं. तो अगर प्राइवेट स्कूल में फीस देनी है, एक आदमी की तो बच्चियां तो सब सरकारी स्कूल में है. और इसलिए कई बार आंकड़े देते हैं बच्चों से ज्यादा बच्चियां आगे आ गई हैं. हम जैसे लोग सरकारी स्कूल में पढ़े हैं, मैं पहली से लेकर LLB तक सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं. तो सरकारी स्कूल में पढ़ना तो उसके लिए भैरोंसिंह जी एक बात कहा करते थे. कि जो सरकारी स्कूल में पड़ेगा वह नेता बनेगा और जो प्राइवेट स्कूल में पड़ेगा वह अफसर बनेगा. 

क्या राजनीति से खत्म होगा जातिवाद?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि भारतीय राजनीति में एक युग पुरुष हैं, उसका नाम है नरेंद्र मोदी. उन पर ना जाति का असर है ना परिवार का असर है. उनका पूरा का पूरा कार्यकाल राष्ट्र को समर्पित है और उनका चिंतन भी वही है. उदाहरण के लिए वह जब चिंतन करते हैं तो जाति का वैसे चिंतन नहीं करते. कि जाति में अगर गरीबी है और बेरोजगारी है तो उसे ऊपर उठाना चाहिए. वो तो यह कहते हैं कि मेरी तो चार ही जातियां हैं वो उनके लिए काम कर रहे हैं. वो दबाव में नहीं आते हैं उदाहरण के लिए महाराष्ट्र में लोग कहते थे कि मराठा ही बन सकता है. उन्होंने देवेंद्र फडणवीस को बना दिया, हरियाणा में कहते थे कि जाट ही बन सकता है सैनी को बना दिया. उनको जाति का कोई असर नहीं है, अधिकारी ब्राह्मण हैं. सुवेंदु अधिकारी शुरुआत से लड़ता रहा है और लड़कर यहां तक लोकतंत्र में आया है. जाति हैं दो स्वरूप हैं, एक जाति का स्वरूप है कि जातियों ने हमारी और समाज की बहुत रक्षा की है. जाति व्यवस्था का अगर ठीक से अध्ययन किया जाए. आज राजनीतिक कारण से उसमें बहुत टकराहट आ रही है. लेकिन जाति व्यवस्था ने समाज की रक्षा बहुत की है. एक गांव बने, गांव में खाती का काम अलग हो गया, कुमावतों का काम अलग हो गया. कुम्हार का अलग कर दिया, नाई का काम अलग हो गया, यह सब लोग कृषि पर आधारित थे. और किसान जब पैदा करता था तो इनको वैसे ही वितरण करता था. और वह हल जोतता था, तब सबका अलग-अलग भाग निकलता था. मंदिर के भाग का अलग, पक्षियों के भाग का अलग, गायों के भाग का अलग 'मुगल काल में जब हमले हो रहे थे, धर्म परिवर्तन हो रहा था. इन जाति व्यवस्थाओं ने जाति पंचायत में समाज की बहुत बड़ी रक्षा की. यहां तक पहुंचा और इन जातियों ने लड़ाई में बहुत बड़ा काम किया. भारत की लड़ाई में जो योद्धा लड़ते रहे इसमें भी उन्होंने बहुत काम किया है. आर्य समाज ने बहुत विद्यालय खोले, अग्रवाल समाज ने विद्यालय खोले, बिड़ला इंस्टीट्यूट है. इन लोगों ने समाज सेवा का बहुत काम किया है, जाति के आधार पर भी किया है. लेकिन जाति को लेकर राजनीति में सोचना ठीक नहीं है.

50% महिला आरक्षण पर क्या बोले घनश्याम तिवाड़ी?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि यह जो बिल आया है, 31वां संविधान संशोधन बिल चल रहा है. पहला जो बिल आया था उसके बाद 50 संविधान संशोधन हो गए. जो महिला नारी शक्ति वंदन को लोकसभा राज्यसभा में जो पारित कराया. मोदी के पारित करने के समय सब साथ थे. अब इस समय कुछ पॉइंट बनाकर सरकार को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने महिलाओं के आरक्षण के विधेयक का विरोध किया अब उनके मन में पश्चाताप है. क्योंकि तमिलनाडु में भी डीएमके को इसका जवाब मिल गया. टीएमसी को बंगाल में इसका जवाब मिल गया. कांग्रेस को असम में इसका जवाब मिल गया. जो विरोध करने वाले लोग थे, वो अब सहम गए हैं. मैं समझता हूं निश्चित रूप से आने वाले सत्रों में यह बिल पास होगा. और पास होकर ये आने वाले 2029 के चुनाव में लागू हो जाएगा. 

राजस्थान में राजनीतिक नियुक्तियों में देरी क्यों?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि इन सबका कार्यकाल कानून में 3 साल का ही है, अब तो हो जाना चाहिए. सब राजनैतिक दल अपने हिसाब से करते हैं और दूसरा ये जो बार-बार चुनाव होते हैं. तो केंद्र और राज्यों के लोगों को चुनावों में जाने से फुर्सत नहीं मिल पाती, ये नियुक्तियां होनी चाहिए. 

मंत्रिमंडल विस्तार में देरी क्यों हो रही है?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि मंत्रिमंडल विस्तार और ये जो सारी बातें हैं, मंत्रिमंडल विस्तार वैसे तो मुख्यमंत्री का काम है. लेकिन हाईकमान के बिना तो कोई कर ही नहीं सकता, आजकल तो यथार्थ बात है. अब हाईकमान जब वो चीज समझेगा तो मंत्रिमंडल का विस्तार हो जाएगा. केंद्र में लगातार काम कर रहे हैं, मैंने इतने प्रधानमंत्रियों को काम करते देखा है. अटल बिहारी वाजपेयी को भी देखा है, लेकिन नरेंद्र मोदी के काम करने का तरीका ही अलग है. हर क्षेत्र में वो काम कर रहे हैं, विधाता ने इनको भारत का कुछ काम करने के लिए यहां पर पैदा किया है. इतने बड़े काम कर रहे हैं, तो उनके सामने कई समस्याएं आती रहती हैं, ये तो होता रहेगा. मंत्रिमंडल विस्तार में हमेशा 4-5 सीट खाली रखते हैं. ताकि सबका मन लगा रहता है कि मेरा नंबर आ जाएगा. 15 लोगों में भी काम होता है, 20 में भी होता है, और हमने तो 9 लोगों ने भी काम किया है. 

भूमि आवंटन में देरी पर क्या बोले?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि मैं समझता हूं कि ये जो भूमि आवंटन का मामला है. लास्ट में आवंटन करने पर कई गलतियां इसमें ऐसी होती हैं. जब नया आता है तो लगता है कि ये क्या कर दिया ? फिर उसमें वो कमेटी बनती है, वो देखते हैं, जबकि भूमि के संबंध में एक नीति बननी चाहिए. कि किसको, किस प्रकार भूमि आवंटित हो ? जैसे हमने प्राइवेट यूनिवर्सिटी को शिक्षा मंत्री रहते हुए जब बिल पेश किया था. तब कहा था कि 30 एकड़ जमीन वो लेकर आएंगे, endowment का इतना पैसा वो जमा करवाएंगे. इतना कंस्ट्रक्शन वो करेंगे तब उनको भूमि मिलेगी, अब ये समाज के नाम से जो भूमि आवंटन है. तो समाज को देखना चाहिए कि कौन सा समाज, क्या शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहा है ? क्या समाज सुधार के क्षेत्र में काम कर रहा है, और अगर काम करना है. तो उसको भूमि आवंटन जब वो कहे उसके 2-3 महीने में करना चाहिए. तो भूमि के संबंध में एक पॉलिसी बननी चाहिए. 

क्या डबल इंजन सरकार से राजस्थान को फायदा हुआ?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि ये बात तो तय है कि डबल इंजन की सरकार से जितना फायदा राजस्थान को हुआ है उतना किसी स्टेट को नहीं हुआ, इतना ज्यादा रेलवे का काम हुआ है, ये काम बहुत बड़ा हुआ है. दूसरा irregation के लिए तीन बड़े काम हुए हैं, ये काम हो गए. तो पूरे राजस्थान में पानी की समस्या का समाधान हो जाएगा. इसी प्रकार से सरकार ने जो हर महीने का कैलेंडर बनाकर जो भर्तियों का काम पूरा हुआ है. और एक भी पेपर लीक नहीं हुआ है, सारी भर्तियां हो रही हैं, ये भी बड़ा काम सरकार ने किया है. सरकार के एक विधानसभा के हिसाब से चाहे कांग्रेस का विधायक हो या बीजेपी का. उन्होंने जो लिखकर दिया है वो सारा काम पूरा हुआ है. उन्होंने रिकॉर्ड भी विधानसभा में पेश कर दिया है. राजस्थान में किसी प्रकार का कोई सांप्रदायिक वातावरण नहीं बना. कोई जाति संघर्ष का वातावरण नहीं बना, लोगों की नौकरियां लगी हैं. पहले 90 हजार करोड़ रुपए केंद्र से सहायता मिलती थी अब तो वो भी बढ़ गई है. सरकार से मिलने वाली सहायता 90 हजार करोड़ से बढ़कर 1 लाख 10 हजार करोड़ हो गई है. हर साल सहायता बढ़ती जा रही है, ये जो पैसा है और इसके अलावा जो रेलवे का पैसा है वो अलग से है. सड़कों का पैसा है, वो बैंकों से आता है, नितिन गडकरी ने जो व्यवस्था की है. कि उससे फास्ट टैग से जो पैसा कटता है, बैंकों में पैसा जाता है, बैंकों की स्थिति मजबूत हो रही है. सड़क बन रही है और काम हो रहा है, इंफ्रास्ट्रक्चर का जो पैसा आ रहा है वो 1 लाख 10 हजार से बाहर है. 

भजनलाल सरकार के कामकाज को कैसे देखते हैं?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा लगातार निरंतरता से समर्पित होकर काम कर रहे हैं ये बात जरूर है कि वो नए हैं तो कुछ 6 महीने, पांच महीने उनको उसमें लगा लेकिन अब तो वो द्रुत गति से काम कर रहे हैं और नए-नए प्रोजेक्ट भी लेकर आ रहे हैं. जैसे नमामि गंगे अभी प्रोजेक्ट लेकर आए हैं और कई प्रोजेक्ट लाए हैं. इसी तरीके से वो सारे काम कर रहे हैं मुझे लगता है उनकी काम करने की गति तीव्र है, वो ठीक प्रकार से कर रहे हैं. 

रात्रि चौपाल और जनता से सीधा संवाद कितना असरदार?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि बिल्कुल इसका फर्क पड़ता है, वो गांवों में जा रहे हैं मिल रहे हैं, बातचीत कर रहे हैं. एक झालमुड़ी खाने का प्रधानमंत्री का पूरे बंगाल और देश में असर हो गया. तो ये जाकर खुद मिलते हैं, और इतने नए होकर इतना काम कर रहे हैं, ये प्रशंसा की बात है. 

मोदी की ऊर्जा बचत अपील पर क्या बोले?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि देखिए प्रधानमंत्री ने एक पहले अपील थी कोई कानून नहीं बनाया था कि जो समर्थ लोग हैं वो गैस की सब्सिडी लोग छोड़ दें. उसका अच्छा असर था, उनके एक कहने से लाखों लोगों ने गैस की सब्सिडी छोड़ दी थी. अब उन्होंने ये अपील की है, वो राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान की अपील है. इस अपील का लोगों पर असर हो रहा है, इसका भी व्यापक असर सामने आएगा. जैसे गैस का आया था, प्रधानमंत्री थोपते नहीं हैं, वो प्रेरित करके काम कराते हैं. राष्ट्र के प्रति लोगों में समर्पण हो इसलिए उन्होंने 7 पॉइंट बताए. और वो ऐसे हैं कि उनको टाल सकते हैं, अगर गोल्ड आज नहीं खरीदेंगे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा. और पेट्रोल डीजल बचाएंगे तो अच्छा ही होगा. मैंने भी राज्यसभा में कहा था कि पहले हम भोजन चूल्हे से, लकड़ी से, कोयले से, स्टोव से बनाते थे. अब इंडक्शन है तो उससे बनाओ, बिजली पर आ जाओ. प्रधानमंत्री ने बिजली काम में लेने के लिए कहा है. ईवी पर आ जाओ, अब ईवी इतनी चलने लग गई है. ये अगर सड़कों पर आएगी तो पट्रोल की बचत होगी. और अगर खाने पीने का काम इंडक्शन पर हो जाएगा तो ये और बचत हो जाएगी. सबसे ज्यादा पैसा क्रूड ऑयल के इंपोर्ट पर ही जाता है. 

 “कॉकरोच जनता पार्टी” ट्रेंड पर क्या बोले?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि ये थोथा है, कारण क्या है कि एक तो इसमें दो प्रकार के लोग हैं. एक एंटी इंडिया जो लोग हैं, जो भारत की एकता को भारत के इस प्रभाव को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं तो मैं देख रहा हूं कि सोशल मीडिया पर कुछ पकड़े भी गए हैं. कि रहता तो कौन-सी जाति का है, दूसरी जाति का आदमी. लेकिन दूसरी जाति का आदमी बनकर उस जाति पर हमला करता है. और लिखता है, ये जाति है तो उसके प्रति इनमें वैमनस्य जागृत हो जाएगा. उसी प्रकार से ये जो कॉकरोच पार्टी वाला मामला है. इसमें कई पाकिस्तानी लोगों ने हिंदुस्तानी बनकर काम किया है. भारत को अस्थिर करने के लिए जो लोग चाहते हैं वो भी कभी इस काम में लगते हैं. लेकिन फिर थोड़े दिनों में वो फुस्स हो जाते हैं, तो वैसा ही है ये. 

राजस्थानी भाषा को लेकर क्या कहा?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि ये सुप्रीम कोर्ट का दिशा-निर्देश है और मैं समझता हूं कि राजस्थानी भाषा के बारे में. जब मैं शिक्षा मंत्री था, तब भी मैंने बहुत कोशिश की थी. और एक उदाहरण है मेरे पास राजस्थानी भाषा के लेखक और ये सभी मेरे से मिलने आए थे. तो मैंने उनको कहा कि ठीक है आप सब जितनी चाहते हैं, उतनी खोल देते हैं. लेकिन, उसमें सब आप अपने बच्चों को राजस्थानी भाषा के माध्यम से पढ़ाने के लिए तैयार हो जाओ. एक भी तैयार नहीं हुआ, अभी जो समस्या है मैंने राज्यसभा में बोलकर कहा कि तमिलनाडु में हिंदी की समस्या नहीं है. तमिल भाषा को खतरा अंग्रेजी से है, इंग्लिश मीडियम के लोग तमिल से ज्यादा हो गए. और हमारे यहां भी देखें तो आजतक तो यहां तक लोगों कि कल्पना हो गई. कि मेरा बच्चा अगर पैदा हो वो रोए भी, पैदा होते ही अंग्रेजी में रोए, हिंदी में रोए नहीं. तो ये सारी बातें जो हो गई हैं उससे राजस्थानी भाषा और इन सब भाषाओं का विकास जरूरी है. लेकिन मूल खतरा इंग्लिश से है, इसलिए मोदी जी द्वारा नई शिक्षा नीति में मातृभाषा को प्राथमिकता दी गई है. और उसमें ही मातृभाषा में शिक्षा मिले, तो राजस्थानी भाषा भी मातृभाषा है. इसमें शिक्षा मिलनी चाहिए, इस पर सरकार को काम करना चाहिए. 

छात्रसंघ और निकाय चुनाव समय पर होने चाहिए?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि मेरी एक मान्यता बहुत साफ है इसमें 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद में संस्थाओं को संवैधानिक बना दिया. कॉन्स्टिट्यूशनल बॉडी जो होती है तो जैसे लोकसभा के और विधानसभा के जो चुनाव होते हैं. उसी प्रकार इनके भी चुनाव होना जरूरी हैं और समय पर जरूरी हैं. लेकिन दुर्भाग्य से पिछली सरकार ने इतना टाइम टेबल इनका बिगाड़ दिया कि बार-बार चुनाव, बार-बार चुनाव 
इसलिए सरकार ने वन नेशन नहीं 'वन स्टेट वन इलेक्शन' तो ऐसे कई जगह हुए हैं अभी
अभी गुजरात में एक साथ सारे चुनाव हो गए हैं. उसी प्रकार राजस्थान में भी ये सारे चुनाव एक साथ हो जाएं इसके लिए इस प्रक्रिया में थोड़ा विलंब हो गया. लेकिन अब चूंकि जुलाई तक आदेश आ गया और सरकार ने इस कारण से भी नहीं किया. कि OBC का जो कोटा फिक्स होना था. सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला हो गया था कि OBC आयोग की रिपोर्ट नहीं आएगी. तब तक आप OBC का आरक्षण नहीं कर सकते और OBC के आरक्षण के बिना कोई चुनाव नहीं कराना चाहता. इसलिए अब ये OBC आरक्षण की रिपोर्ट आ जाएगी तो 21% जो उनको देते हैं उतना रिजर्वेशन उनका हो जाएगा. SC-ST के साथ-साथ OBC का आरक्षण होकर भी चुनाव एक साथ हो जाएगा. 

31 जुलाई से पहले आ जाएगी OBC आयोग की रिपोर्ट ? 
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि हां आ जानी चाहिए. 

राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी सफलता क्या है?
घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि मेरे राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि EWS आरक्षण है. राजस्थान में जब जाटों को OBC का आरक्षण दिया गया था. तो ब्राह्मण, बनिये, राजपूत इन्होंने सामाजिक न्याय मंच के अंतर्गत OBC में आरक्षण की मांग की. और मैं उस समय सबसे अलग हटकर मैंने उसका विरोध किया. मैंने कहा कि  OBC में ब्राह्मण, बनिये, राजपूत, कायस्थ ये नहीं आ सकते. क्योंकि बीपी मंडल कमीशन की जो रिपोर्ट थी उसमें ये कवर नहीं होते थे. क्योंकि इनके यहां नाता की प्रथा नहीं थी, उसमें कहा था कि नाता प्रथा होगी वो पिछड़ा होगा. उसमें कहा कि जिनकी औरतें काम करती हैं वो पिछड़े हैं. उन्होंने कहा था कि जो मोटा अनाज खाते हैं वो पिछड़े होंगे. तो ये चारों वर्ग जो थे उस समय, इसमें नहीं आते थे. मैंने EWS का सबसे पहले फॉर्मूला दिया और मैंने 16 वर्ष पहले इस आंदोलन को शुरू किया. विधानसभा में पहला बिल भी ये पेश किया. हिंदुस्तान की किसी भी असेंबली में EWS का फॉर्मूले के साथ आरक्षण का बिल पेश नहीं हुआ था. वो मैंने पेश किया पारित भी कराया फिर हाईकोर्ट ने उसको रोक दिया. लेकिन उसके बाद में मोदी जी ने 93वां संविधान संशोधन कर EWS को लागू कर दिया. मैं समझता हूं मेरे जीवन की एक तो सबसे बड़ी सफलता और कामयाबी राजनीतिक जीवन की ये है. दूसरी मेरी सबसे बड़ी सफलता रही आपातकाल में जो मैंने लड़ाई लड़ी. उसका जो परिणाम बाद में आया वो भी हमारे जीवन की बहुत बड़ी सफलता है. लोकतंत्र को बचाने में जो हमने त्याग किया, लड़ाई की, मार खाई, पिटाई खाई, जेल में गए. अंडरग्राउंड होकर काम किया तो ये दो बहुत बड़ी उपलब्धियां हैं.