नई दिल्लीः भारत की अध्यक्षता में आयोजित 12वां ब्रिक्स संसदीय मंच संयुक्त घोषणा-पत्र अंगीकृत किए जाने के साथ संपन्न हो गया. दो दिवसीय सम्मेलन में वैश्विक शासन व्यवस्था में ग्लोबल साउथ की भागीदारी बढ़ाने, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार, सीमापार आतंकवाद पर सख्त रुख, डिजिटल तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल और सतत विकास जैसे अहम मुद्दों पर साझा प्रतिबद्धता सामने आई. लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने समापन सत्र में कहा कि वैश्विक चुनौतियों का स्थायी समाधान युद्ध और संघर्ष में नहीं, बल्कि संवाद, शांति और सहयोग में निहित है. सम्मेलन के समापन पर उन्होंने वर्ष 2027 के लिए ब्रिक्स संसदीय मंच की अध्यक्षता चीन को सौंप दी. ब्रिक्स संसदीय मंच के शानदार आयोजन से कोटा सांसद और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का भी सम्मान बढ़ा.
संयुक्त घोषणा-पत्र में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों, संप्रभु समानता, परस्पर सम्मान, देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई गई. इसमें वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में ग्लोबल साउथ को अधिक प्रतिनिधित्व देने के लिए UNSC में सुधारों का समर्थन किया गया. नई दिल्ली घोषणा-पत्र के संबंधित प्रावधानों का उल्लेख करते हुए सीमापार आतंकवाद, आतंकवाद के वित्तपोषण और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने की निंदा की गई. साथ ही आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने और दोहरे मापदंडों से बचने पर जोर दिया गया. समापन भाषण में ओम बिरला ने कहा कि अलग-अलग भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद मानवता के कल्याण, शांति और समृद्धि के प्रति साझा प्रतिबद्धता ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत है. उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय क्षेत्रीय संघर्षों, आर्थिक अनिश्चितता, व्यापारिक तनाव, आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है. इनका प्रभाव किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता, इसलिए संवाद, कूटनीति और आपसी सहयोग पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं-
जलवायु संबंधी एजेंडे को मिली जगहः
बिरला ने भारत के दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए कहा कि स्थायी समाधान युद्ध के बजाय संवाद, संघर्ष के बजाय शांति और प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग में तलाशे जाने चाहिए. उन्होंने राष्ट्रीय संप्रभुता के सम्मान, अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और सभी देशों के लिए समान विकास अवसरों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता बताई. उन्होंने कहा कि वैश्विक शांति का अर्थ सभी के लिए सुरक्षा, सम्मान, न्याय और बेहतर भविष्य सुनिश्चित करना है, विशेषकर युवा पीढ़ी के लिए लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि संसदें केवल कानून बनाने वाली संस्थाएं नहीं, बल्कि संवाद, आम सहमति, जवाबदेही और जनविश्वास के महत्वपूर्ण केंद्र हैं. बदलते वैश्विक परिदृश्य में संसदीय संस्थाओं को अधिक प्रभावी, पारदर्शी, सहभागी और जन-केंद्रित बनाना आवश्यक है. उन्होंने सदस्य देशों की संसदों से विधायी निरंतरता, लोकतांत्रिक निगरानी और जवाबदेही को मजबूत करने के साथ नागरिकों की अपेक्षाओं के अनुरूप अपनी कार्यप्रणाली में नवाचार अपनाने का आह्वान किया. उन्होंने तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जिम्मेदार इस्तेमाल को संसदीय कार्यप्रणाली अधिक प्रभावी बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया. बिरला के अनुसार, AI और डिजिटल तकनीक के उपयोग से सांसदों की दक्षता बढ़ाने, संसदीय कार्यवाही को सुगम बनाने और नागरिकों की भागीदारी का विस्तार करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, इसके लिए मानवीय मूल्यों, नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही को प्राथमिकता देना जरूरी है. संयुक्त घोषणा-पत्र में भारत की अध्यक्षता के दौरान सामने आए विकास और जलवायु संबंधी एजेंडे को भी जगह मिली. इसमें डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) रिपोजिटरी के विस्तार, नैतिक AI प्रशासन और जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर समान लेकिन पृथक उत्तरदायित्वों एवं संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) के सिद्धांत के पालन का उल्लेख किया गया. बिरला ने कहा कि ब्रिक्स की सफलता केवल सदस्य देशों की प्रगति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसका लाभ व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक पहुंचना चाहिए. वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की आकांक्षाओं को उचित स्थान मिलना भी आवश्यक है. उन्होंने युवाओं की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि उनकी प्रतिभा, तकनीकी ज्ञान और आकांक्षाओं को अवसरों से जोड़ना संसदों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है. शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और समान अवसरों के माध्यम से युवाओं को राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनाया जाना चाहिए. उन्होंने विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का पूरक बताते हुए समावेशी और सतत विकास की आवश्यकता रेखांकित की. ब्रिक्स संसदीय मंच के दौरान ओम बिरला ने यूरोपीय संसद की विदेश मामलों की समिति (AFET) के प्रतिनिधिमंडल से भी मुलाकात की. बैठक में भारत और यूरोपीय संघ के बीच संसदीय संवाद को नियमित बनाने तथा सांसदों, संसदीय समितियों और राजनीतिक समूहों के बीच संपर्क बढ़ाने पर चर्चा हुई. डिजिटल अर्थव्यवस्था, AI, व्यापार, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण, सुरक्षा और रक्षा सहयोग जैसे विषयों पर अनुभव साझा करने की संभावनाओं पर विचार किया गया बिरला ने बहुभाषी संसदीय कार्यप्रणाली में तकनीक के उपयोग का उल्लेख करते हुए संसद की Sansad Bhashini पहल को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि भाषा-प्रौद्योगिकी के माध्यम से संसदीय कार्यवाही को अधिक सुलभ बनाया जा सकता है, ताकि भाषा लोकतांत्रिक भागीदारी में बाधा न बने. बैठक में भारत-EU व्यापार एवं निवेश संबंधों, सेमीकंडक्टर, डिजिटल कौशल, 6G, समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग पर भी विचार-विमर्श हुआ. भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताएं पूरी होने को आर्थिक संबंधों की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया.
दो दिवसीय सम्मेलन के समापन पर ओम बिरला ने वर्ष 2027 के लिए ब्रिक्स संसदीय मंच की अध्यक्षता चीन को सौंपते हुए उसे शुभकामनाएं दीं. उन्होंने विश्वास जताया कि चीन के नेतृत्व में भी संसदीय सहयोग आगे बढ़ेगा. सम्मेलन का समापन सदस्य देशों की संसदों से शांति, सहयोग, साझा समृद्धि और अधिक न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाने के आह्वान के साथ हुआ