VIDEO: छात्रसंघ चुनाव बहाली की मांग ने पकड़ा जोर, पानी की टंकी से चुनाव बहाली की मांग, अस्पताल में भी जारी छात्रनेता की भूख हडताल, देखिए ये रिपोर्ट

जयपुर: राजस्थान में छात्रसंघ चुनावों की बहाली को लेकर चल रहा आंदोलन लगातार उग्र होता जा रहा है. प्रदेश की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी में पिछले कई दिनों से चल रहे विरोध प्रदर्शनों ने अब प्रशासन और पुलिस दोनों की चिंता बढ़ा दी है. चुनाव बहाली की मांग को लेकर एनएसयूआई के तीन छात्र नेताओं ने पानी की टंकी पर चढ़कर आमरण अनशन शुरू कर दिया,पानी की ऊंची टंकी पर चढ़कर किया गया यह प्रदर्शन विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति माना जा रहा है. 

दूसरी ओर छात्र नेता शुभम रेवाड़ का आंदोलन भी लगातार चर्चा में बना हुआ है. शुभम पिछले सात दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हुए थे. उनकी बिगड़ती तबीयत को देखते हुए पुलिस और प्रशासन ने उन्हें जबरन उठाकर अस्पताल में भर्ती कराया. हालांकि अस्पताल पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपना अनशन समाप्त नहीं किया और वहीं से आंदोलन जारी रखने की घोषणा कर दी. उनके समर्थकों का कहना है कि जब तक छात्रसंघ चुनाव बहाल नहीं किए जाते, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं होगा. विश्वविद्यालय परिसर में पिछले दस दिनों से धरना जारी है. धरने में बड़ी संख्या में छात्र भाग ले रहे हैं और लगातार चुनाव बहाली की मांग उठा रहे हैं. 

छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नेतृत्व तैयार करने का मंच भी होता है. छात्रसंघ चुनावों के माध्यम से ही युवाओं को नेतृत्व का अवसर मिलता है और उनकी आवाज प्रशासन तथा सरकार तक पहुंचती है. इस पूरे आंदोलन के दौरान एक और घटनाक्रम ने माहौल को और गरमा दिया. छात्र नेता लक्ष्यराज ने चुनाव बहाली की मांग को लेकर भूमि समाधि लेने की चेतावनी दी थी. प्रशासन ने इसे गंभीरता से लेते हुए पूर्व सावधानी के तौर पर उन्हें पहले ही गिरफ्तार कर लिया. पुलिस का तर्क है कि किसी भी अप्रिय घटना को रोकना प्राथमिकता है, जबकि आंदोलनकारी इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन बता रहे हैं.

दरअसल, छात्रसंघ चुनावों पर रोक का मामला वर्ष 2022 से जुड़ा हुआ है. तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगा दी थी. उस समय प्रशासनिक और अन्य कारणों का हवाला देते हुए चुनाव प्रक्रिया को स्थगित किया गया था. लेकिन उसके बाद से लेकर अब तक चुनाव दोबारा शुरू नहीं हो सके हैं. इस कारण पिछले चार साल से छात्रसंघ चुनाव पूरी तरह बंद हैं. छात्र नेताओं का सबसे बड़ा तर्क यह है कि चुनाव नहीं होने से उनकी राजनीतिक यात्रा प्रभावित हुई है. लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुसार छात्रसंघ चुनाव लड़ने के लिए उम्र सीमा निर्धारित है. ऐसे में जो छात्र वर्ष 2022 में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, उनमें से कई आज उम्र सीमा पार कर चुके हैं. इन छात्रों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक छात्र राजनीति में सक्रिय रहकर चुनाव की तैयारी की, लेकिन चुनाव नहीं होने से उनका अवसर छिन गया. 

यही कारण है कि छात्र संगठनों के भीतर गहरी नाराजगी दिखाई दे रही है. कई छात्र नेता इसे अपने राजनीतिक भविष्य से जुड़ा मुद्दा मान रहे हैं. उनका कहना है कि यदि जल्द चुनाव नहीं कराए गए तो आगामी वर्षों में भी कई छात्र चुनावी प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे. छात्रों के अनुसार यह केवल किसी संगठन का मुद्दा नहीं बल्कि पूरे छात्र समुदाय का सवाल है. अगस्त का महीना छात्रसंघ चुनावों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है. परंपरागत चुनाव कैलेंडर के अनुसार इसी अवधि में चुनाव प्रक्रिया शुरू होती रही है. जैसे-जैसे अगस्त नजदीक आ रहा है, छात्र संगठनों की बेचैनी भी बढ़ रही है. यही वजह है कि आंदोलन में नई-नई रणनीतियां अपनाई जा रही हैं. धरना, भूख हड़ताल, टंकी पर चढ़कर प्रदर्शन और आमरण अनशन जैसी गतिविधियां इसी बढ़ते दबाव का संकेत हैं. 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि छात्रसंघ चुनावों का मुद्दा केवल विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है. राजस्थान की राजनीति में छात्र राजनीति की हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका रही है. प्रदेश के कई बड़े नेता छात्र राजनीति से निकलकर ही मुख्यधारा की राजनीति में पहुंचे हैं. ऐसे में चुनाव बहाली का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील माना जा रहा है. फिलहाल विश्वविद्यालय परिसर में माहौल पूरी तरह आंदोलनमय बना हुआ है. पुलिस और प्रशासन लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं. वहीं छात्र नेता अपने आंदोलन को और तेज करने की चेतावनी दे रहे हैं. आने वाले दिनों में यह आंदोलन किस दिशा में जाएगा और सरकार इस पर क्या निर्णय लेती है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं.

चार साल से बंद पड़े छात्रसंघ चुनावों की बहाली की मांग अब केवल ज्ञापन और नारों तक सीमित नहीं रह गई है. भूख हड़ताल, आमरण अनशन, टंकी पर प्रदर्शन और गिरफ्तारी जैसे घटनाक्रम इस बात का संकेत हैं कि छात्र नेतृत्व अब किसी निर्णायक नतीजे की उम्मीद में पूरी ताकत झोंक चुका है. अगस्त के चुनावी कैलेंडर से पहले विश्वविद्यालय में बढ़ती हलचल यह साफ कर रही है कि छात्रसंघ चुनाव बहाली का जिन्न एक बार फिर बाहर आ चुका है और जब तक इस पर कोई ठोस फैसला नहीं होता, यूनिवर्सिटी की सियासत में यह मुद्दा सबसे बड़ा केंद्र बना रहेगा.