VIDEO: गुलाबी नगरी की 'बदरंग' हकीकत, पर्यटन का बढ़ता ग्राफ और सुविधाओं का गिरता स्तर, देखिए ये खास रिपोर्ट

जयपुर: जिसे दुनिया 'पिंक सिटी' के नाम से जानती है, आज अपनी ही विरासत और लोकप्रियता के बोझ तले दब रहा है. हर वीकेंड पर जब दिल्ली, हरियाणा और गुजरात जैसे पड़ोसी राज्यों से पर्यटकों का सैलाब उमड़ता है, तो शहर के पर्यटन स्थलों का नजारा किसी कुंभ के मेले जैसा होता है. लेकिन इस भीड़ के साथ जो दूसरी तस्वीर उभरती है, वह बेहद डरावनी है. गंदगी के ढेर, ट्रैफिक का दम घोंटता जाम और बुनियादी सुविधाओं का अभाव अब जयपुर की पहचान पर दाग लगा रहे हैं. 

टूरिस्ट स्थलों पर नगर निगम की उदासीनता:
-टूरिस्ट स्थलों की साफ सफाई के लिए निगम के पास नहीं कोई प्लान
-जबकि इन दिनों निगम का खास ध्यान होना चाहिए टूरिस्ट स्थलों पर
-सडक,सफाई,सीवर पर निगम को करना होगा हार्डवर्क
-शहर के प्रमुख स्थलों की राोजना साफ सफाई की हो मॉनिटरिंग
-शहर के प्रमुख स्थलों पर अस्थाई तौर पर डस्टविन लगाई जाए
-इन अस्थाई तौर पर लगाई डस्टबिन से रोजाना कचरा उठाना सुनिश्चित हो

जयपुर विश्व धरोहर का हिस्सा है. आमेर किला, हवामहल, जंतर-मंतर और नाहरगढ,जलमहल जैसे स्थलों पर पैर रखने की जगह नहीं होती. पर्यटन विभाग भले ही सैलानियों की संख्या को अपनी उपलब्धि मानकर पीठ थपथपा ले, लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि सैलानी यहाँ से खूबसूरत यादें कम और कड़वे अनुभव ज्यादा लेकर जा रहे हैं. कचरे का ढेर और आवारा पशुओं की मौजूदगी शहर की साख को बट्टा लगाती है. नगर निगम की उदासीनता इस कदर है कि पर्यटन स्थलों के आसपास भी सफाई व्यवस्था केवल 'खानापूर्ति' बनकर रह गई है. जयपुर नगर निगम अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते नजर आ रहा है पर्यटक स्थलों के मुख्य द्वारों पर कचरे के ढेर सड़ रहे हैं. डस्टबिन या तो टूटे हुए हैं या फिर समय पर खाली नहीं किए जाते. परकोटे के भीतर कई जगहों पर बहता गंदा पानी पर्यटकों को नाक पर रुमाल रखने को मजबूर कर देता है. विश्व पटल पर प्रसिद्ध एक शहर का नगर निगम इतना लाचार है कि वह टूरिस्ट सीजन के लिए कोई विशेष 'क्लीनलीनेस ड्राइव' नहीं चला सकता.

सार्वजनिक शौचालयों की भारी कमी पर्यटकों को मुसिबत में डाल रही:
-प्रमुख पर्यटन मार्गों स्वच्छ मोबाइल टॉयलेट्स का नहीं होना
-खासतौर पर महिला पर्यटकों के लिए मोबाइल टॉयलेट्स का नहीं होना
-परकोटे के भीतर निजी वाहनों को प्रतिबंध
-केवल इलेक्ट्रिक शटल बसें या व्यवस्थित ई-रिक्शा
-व्यापार मंडलों को साथ लेकर 'माई टूरिस्ट, माय गेस्ट' जैसी मुहिम

​सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हजारों पर्यटकों के लिए शहर के मुख्य केंद्रों पर सार्वजनिक शौचालयों की भारी कमी है. जब प्रशासन को पता है कि वीकेंड पर भीड़ सामान्य से 5 गुना बढ़ जाती है, तो प्रमुख पर्यटन स्थलों जैसे अल्बर्ट हॉल या जलमहल के पास अस्थाई मोबाइल टॉयलेट्स नहीं लगाए जाते खासतौर पर महिला पर्यटकों के लिए स्थिति और भी विकट है. साफ-सुथरे शौचालयों के अभाव में उन्हें निजी होटलों या कैफे का सहारा लेना पड़ता है, जो हर किसी के बस की बात नहीं है.  पर्यटन स्थलों के बाहर ट्रैफिक का जो मंजर होता है, उसे देखकर लगता है कि जयपुर एक 'जाम सिटी' है. जौहरी बाजार, बड़ी चौपड़ और आमेर रोड पर घंटों जाम लगा रहता है.

पर्यटकों के वाहनों के लिए उचित पार्किंग व्यवस्था न होने के कारण गाड़ियां सड़कों पर खड़ी होती हैं, जिससे जाम और बढ़ जाता है. ट्रैफिक पुलिस कुछ हद तक प्रयास तो करती है, लेकिन बिना किसी ठोस मैनेजमेंट प्लान के उनके हाथ भी खाली रह जाते हैं. नगर निगम को केवल पर्यटन क्षेत्रों के लिए एक विशेष टीम बनानी चाहिए, जो हर 2 घंटे में सफाई सुनिश्चित करे. नगर निगम और जिला प्रशासन अपनी नींद से नहीं जागे, तो कचरे के ये ढेर हमारी विरासत को निगल जाएंगे. यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो जयपुर का 'नेगेटिव फीडबैक' भविष्य में सैलानियों को कही ओर मोड़ देगा.