VIDEO: मरूभूमि की अमर प्रेम गाथा–मूमल महेन्द्रा, रेत में दफन वो मोहब्बत, लौद्रवा की मेड़ी से उठती पुकार, आज भी गूंजता है ये नाम !

जयपुर: आज पूरी दुनिया वैलेंटाइन डे मना रही है. प्रेम का दिन… इज़हार का दिन… विश्वास और समर्पण का दिन. फूलों की खुशबू है, उपहारों की चमक है, और हर ओर मोहब्बत की बातें हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस आधुनिक उत्सव से सदियों पहले हमारी अपनी धरती पर भी एक ऐसी प्रेम कथा जन्मी थी, जिसने प्रेम को अमरता दे दी?राजस्थान की तपती मरुभूमि में एक ऐसी गाथा रची गई, जहाँ मिलन से अधिक विरह ने प्रेम को महान बना दिया… जहाँ सौंदर्य से अधिक विश्वास की परीक्षा हुई… और जहाँ एक क्षण की शंका ने दो जिंदगियों को सदा के लिए बदल दिया. वैलेंटाइन डे के इस खास मौके पर हम आपको रूबरू कराने जा रहे हैं राजस्थान की उसी अमर प्रेम कहानी से—मूमल और महेन्द्रा की कथा से. कैसे लौद्रवा की मेड़ी में शुरू हुआ यह प्रेम…कैसे रात्रियों की चाँदनी में पनपा यह संबंध…और कैसे एक गलतफहमी ने इसे इतिहास की सबसे मार्मिक प्रेम गाथाओं में बदल दिया.

मरुधरा की रेत केवल धोरों की सरसराहट नहीं समेटे हुए है, वह अपने कण-कण में प्रेम, विरह, त्याग और समर्पण की कहानियाँ भी सहेजे हुए है. जब थार की हवाएँ शाम ढले सुनहरी हो उठती हैं और सूर्य अपनी अंतिम किरणों से रेत को चूमता है, तब लगता है मानो यह भूमि किसी अनकही पीड़ा को फिर से जी रही हो. प्रेम की अमर कथाओं का स्मरण करते ही मन में हीर–रांझा, सोहनी–महीवाल, शीरीं–फरहाद, लैला–मजनूँ और रोमियो–जूलियट जैसे अमर प्रेमियों के नाम उभर आते हैं. परंतु इन सबके मध्य राजस्थान की तपती धोरों में जन्मी एक ऐसी कथा भी है, जो उतनी ही मार्मिक, उतनी ही पवित्र और उतनी ही हृदयविदारक है—वह कथा है मूमल और महेन्द्रा की. यह कहानी केवल दो व्यक्तियों के मिलन और बिछोह की नहीं, बल्कि विश्वास और भ्रम, साहस और संवेदना, और प्रेम तथा प्रतिष्ठा के सूक्ष्म संतुलन की कहानी है. सदियों बीत जाने पर भी जब कोई यात्री जैसलमेर की ओर बढ़ता है, तो उसे रेत की लहरों के बीच से मानो किसी स्त्री की करुण पुकार सुनाई देती है और किसी पुरुष की पश्चाताप से भरी आवाज़-“मूमल…”. यही पुकार इस कथा को अमर बनाती है, यही विरह इसे कालातीत कर देता है.

लौद्रवा की मेड़ी – सौंदर्य और परीक्षा का अद्भुत संसार:
जैसलमेर की प्राचीन राजधानी लौद्रवा आज भले ही खंडहरों में तब्दील हो चुकी हो, पर कभी वह वैभव, कला और समृद्धि का केंद्र थी. काक नदी के शांत तट पर स्थित मूमल की प्रसिद्ध मेड़ी उस युग की स्थापत्य कला और रहस्यपूर्ण कल्पना का अद्भुत उदाहरण मानी जाती थी. यह कोई साधारण राजमहल नहीं था; यह बुद्धि, साहस और धैर्य की परीक्षा लेने वाला एक जीवंत भूलभुलैया था. जालीदार झरोखों से छनकर आती चाँदनी भीतर के कक्षों को स्वप्निल बना देती थी. सुगंधित इत्र और कस्तूरी की महक वातावरण में घुली रहती. संगमरमर जैसे चमकते फर्श के नीचे काँच का ऐसा भ्रमजाल रचा गया था कि देखने वाला जल समझकर रुक जाए. प्रवेश द्वार पर कृत्रिम शेर और अजगर ऐसे स्थापित थे कि अनजान व्यक्ति भयभीत हो उठे. कहीं छिपे गुप्त मार्ग, कहीं पहेलियों से भरे द्वार, तो कहीं ऐसी सीढ़ियाँ जो सीधे मंज़िल तक न ले जाकर साहस की अंतिम सीमा तक ले जाती थीं. यह सब केवल किसी को डराने के लिए नहीं, बल्कि यह सिद्ध करने के लिए था कि मूमल केवल रूपवती ही नहीं, अपितु प्रखर बुद्धि और आत्मसम्मान से परिपूर्ण स्त्री है. उसने प्रण लिया था कि वही पुरुष उसका जीवनसाथी बनेगा जो इन सभी परीक्षाओं को पार कर उसके समक्ष पहुँचेगा. अनेक राजकुमार आए, पर लौट गए—किसी का साहस डगमगा गया, किसी की बुद्धि भ्रम में उलझ गई. मेड़ी प्रतीक्षा करती रही उस एक पुरुष की, जो केवल सौंदर्य का नहीं, बल्कि आत्मा का भी पारखी हो.

अमरकोट का राजकुमार और प्रथम मिलन की वह घड़ी:
सिंध के अमरकोट, जिसे आज उमरकोट के नाम से जाना जाता है, वहाँ राणा वीसलदे सोढा का पुत्र महेन्द्रा अपने पराक्रम और तेजस्विता के लिए विख्यात था. शिकार, युद्धकला और घुड़सवारी में निपुण महेन्द्रा स्वभाव से साहसी और जिज्ञासु था. एक दिन अपने साले हमीर जडेजा के साथ शिकार करते हुए वह हिरण का पीछा करते-करते काक नदी के तट तक आ पहुँचा. दूर चमकती मेड़ी और उसके चारों ओर फैला बाग़ उसकी दृष्टि को बाँध गया. जिज्ञासा उसे भीतर खींच लाई. हमीर पहले गया, पर कृत्रिम शेर और अजगर देखकर भयभीत होकर लौट आया. महेन्द्रा ने भाला उठाया और वार किया—भूसा बाहर निकला. वह समझ गया कि यह परीक्षा है. एक-एक कर उसने सभी भ्रमों को पार किया, काँच के फर्श की सच्चाई जान ली और अंततः ऊँची सीढ़ियाँ चढ़कर उस कक्ष तक पहुँचा जहाँ मूमल खड़ी थी. कहते हैं उस क्षण समय ठहर गया था. मूमल का रूप मानो काली घटा में कौंधती बिजली था—लंबे केश, शांत पर तेजस्वी नेत्र, और मुख पर आत्मविश्वास की उजली आभा. महेन्द्रा अनायास बोल उठा—“न किसी मंदिर में ऐसी मूर्ति होगी, न किसी राजमहल में ऐसा रूप.” पर यह केवल रूप का आकर्षण नहीं था; वह बुद्धि और साहस की विजय थी. दोनों की आँखें मिलीं और दो अजनबी हृदय एक ही स्पंदन में बँध गए. उस रात बातचीत का सिलसिला चला तो मानो शब्दों के माध्यम से आत्माएँ एक-दूसरे को पहचानने लगीं. प्रेम का अंकुर उसी क्षण फूट पड़ा था.

रात्रियों का प्रेम, शंका की छाया और विरह की ज्वाला:
महेन्द्रा विवाहित था, उसकी सात पत्नियाँ थीं, परंतु मन अब मूमल के प्रेम में डूब चुका था. उसने अपने विश्वस्त ऊँट ‘चीतल’ की सहायता से रात्रि में अमरकोट से लौद्रवा तक गुप्त रूप से आना-जाना आरंभ किया. तीसरे पहर लौट आता ताकि किसी को आभास न हो. रेगिस्तान की चाँदनी, हवाओं की मंद सरगम और मेड़ी की खिड़कियों से झरती रोशनी उनके मिलन की साक्षी बनती रही. परंतु प्रेम जितना गहरा होता है, ईर्ष्या की छाया भी उतनी ही घनी हो जाती है. पत्नियों को संदेह हुआ और उन्होंने चीतल के पैर तुड़वा दिए. विवश होकर महेन्द्रा ने दूसरी ऊँटनी ‘टोरड़ी’ ली. एक रात असावधानी में चाबुक ऊँचा उठा और ऊँटनी भटक गई. देर से पहुँचे महेन्द्रा ने देखा कि मूमल की बहन सूमल पुरुष वेश में उसके पास सोई है. यह दृश्य उसके मन में शंका का तूफ़ान बन उठा. बिना कुछ पूछे वह लौट गया. सुबह मूमल ने उसकी जूतियाँ देखीं और सब समझ गई. उसने संदेश भेजे, गीत गवाए, पत्र लिखे—पर महेन्द्रा का हृदय आहत था. अंततः उसने झूठा समाचार भिजवाया कि उसे नाग ने डस लिया है. यह सुनते ही मूमल का संसार अंधकारमय हो गया; उसने प्राण त्याग दिए. जब सत्य ज्ञात हुआ, महेन्द्रा पश्चाताप में “मूमल… मूमल…” पुकारता हुआ स्वयं भी जीवन त्याग बैठा.

अमरता की ओर बढ़ती विरह गाथा – एक अविस्मरणीय अंत:
आज भी जब कोई यात्री जैसलमेर की ओर बढ़ता है और मरुस्थल में डूबते सूर्य को देखता है, तो उसे प्रतीत होता है मानो रेत के कणों में मूमल का विरह और महेन्द्रा की पुकार गूँज रही हो. लोकगीतों, ढोलक की थाप और मांड की मधुर तान में यह कथा जीवित है. मरु महोत्सव में ‘मिस मूमल’ प्रतियोगिता उसी सौंदर्य, आत्मसम्मान और बुद्धिमत्ता की स्मृति को जीवित रखती है. किंतु इस प्रेम कथा का सार केवल सौंदर्य या बलिदान में नहीं, बल्कि विश्वास की नाज़ुक डोर में छिपा है. एक क्षण की शंका ने उस प्रेम को भस्म कर दिया, जो साहस और समर्पण से उपजा था. यदि संवाद होता, यदि विश्वास अडिग रहता, तो शायद यह कथा सुखांत होती. परंतु संभवतः यही अधूरापन इसे अमर बना गया. पूर्ण प्रेम अक्सर इतिहास के पन्नों में दर्ज होता है, पर अधूरा प्रेम आत्मा में बस जाता है. मूमल और महेन्द्रा का प्रेम मिलन से अधिक विरह में जीवित है—रेत की अनंत लहरों की तरह, जो हर आँधी के बाद फिर उठ खड़ी होती हैं. मरुधरा आज भी मानो यही संदेश देती है—प्रेम में सबसे बड़ा शत्रु दूरी नहीं, शंका होती है; और जहाँ विश्वास अटल हो, वहीं प्रेम काल और मृत्यु की सीमाओं को लाँघकर अमर हो जाता है. मूमल-महेन्द्रा की गाथा उसी अमरता की उजली, किंतु करुण, ज्योति है.

मूमल गीत – लोकधुनों में अमर हुआ विरह:
राजस्थान की लोकसंस्कृति में मूमल-महेन्द्रा की कथा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि सुरों में भी जीवित है. “मूमल गीत” या “मूमल री मांड” आज भी मरुभूमि की आत्मा की तरह गाया जाता है. जब ढोलक की धीमी थाप, खड़ताल की लय और कमायचा की करुण तान वातावरण में गूँजती है, तो लगता है मानो स्वयं मूमल अपने विरह की कथा सुना रही हो. यह गीत केवल प्रेम का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस स्त्री के अंतर्मन की पीड़ा, उसकी प्रतीक्षा, उसकी स्वाभिमानी संवेदना और उसके टूटते विश्वास की आहट को स्वर देता है. लोकगायक जब ऊँचे स्वर में गाते हैं—“म्हारी मूमल म्हारो दिल ले गी…”—तो श्रोताओं की आँखें अनायास ही नम हो उठती हैं. गीत में लौद्रवा की मेड़ी, काक नदी का तट, चाँदनी रातें और रेगिस्तान की हवाएँ सजीव हो उठती हैं. इस गीत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संवाद कम और अनुभूति अधिक है. कहीं मूमल की प्रतीक्षा है, कहीं महेन्द्रा की पश्चाताप भरी पुकार, तो कहीं वह क्षण जब एक गलतफहमी ने दो जीवनों को सदा के लिए अलग कर दिया. मांड शैली में गाया जाने वाला यह गीत गहरे आलापों से आरंभ होता है, जो धीरे-धीरे शिखर पर पहुँचकर विरह की तीव्रता को प्रकट करते हैं. लोक मेले, विशेषकर जैसलमेर के मरु महोत्सव में, जब यह गीत गूँजता है तो पूरा वातावरण मानो सदियों पीछे लौट जाता है. श्रोता केवल कहानी नहीं सुनते, वे उसे जीते हैं. मूमल गीत हमें यह स्मरण कराता है कि लोककथाएँ केवल इतिहास नहीं होतीं, वे समाज की सामूहिक स्मृति होती हैं. जब तक यह गीत गाया जाता रहेगा, तब तक मूमल और महेन्द्रा का प्रेम भी जीवित रहेगा—रेगिस्तान की हवाओं में, लोकगायकों की आवाज़ में और हर उस हृदय में जो प्रेम को विश्वास के साथ जोड़कर देखता है. यही लोकधुनें इस कथा को अमरत्व प्रदान करती हैं.

“मूमल-महेन्द्रा प्रतियोगिता” :
इस अमर प्रेम गाथा को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखने के लिए जैसलमेर में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध डेजर्ट फेस्टिवल जैसलमेर के दौरान “मूमल-महेन्द्रा प्रतियोगिता” का विशेष आयोजन किया जाता है. इस प्रतियोगिता में युवतियाँ पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा में मूमल के सौंदर्य, शालीनता और आत्मविश्वास को मंच पर प्रस्तुत करती हैं, वहीं युवा प्रतिभागी महेन्द्रा के रूप में शौर्य, गरिमा और मर्यादा का प्रदर्शन करते हैं. केवल बाहरी रूप ही नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति की समझ, संवाद शैली, लोकगीतों की प्रस्तुति और कथा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का ज्ञान भी परखा जाता है. जब मंच पर मांड की मधुर तान गूँजती है और प्रतिभागी मूमल-महेन्द्रा के रूप में संवाद प्रस्तुत करते हैं, तो दर्शकों को ऐसा प्रतीत होता है मानो सदियों पुरानी प्रेमकथा पुनः जीवंत हो उठी हो. यह आयोजन केवल एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक स्मृति को संजोने और नई पीढ़ी को अपनी लोकगाथाओं से जोड़ने का सशक्त माध्यम है, जो यह संदेश देता है कि प्रेम, स्वाभिमान और विश्वास की यह कथा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी.