VIDEO: नगर निगम के उल्टे सिस्टम से भीतरखाने गंभीर असंतोष, उपायुक्त मान बैठे खुद को अधिशासी अभियंताओं का बॉस, देखिए ये खास रिपोर्ट

जयपुर : नगर निगम जयपुर की कार्यप्रणाली को लेकर इन दिनों भीतरखाने गंभीर असंतोष और असमंजस की स्थिति बनती नजर आ रही है. निगम की स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था और स्पष्ट पदानुक्रम के बावजूद, कुछ ज़ोन में ऐसे हालात सामने आ रहे हैं जो न केवल नियमों के विपरीत हैं, बल्कि पूरे सिस्टम की संतुलित कार्यशैली पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं. निगम की कार्यप्रणाली में एक ऐसा बदलाव उभर रहा है, जो प्रशासनिक नियमों और तकनीकी संरचना को दरकिनार करता प्रतीत होता है. इस बदलाव का प्रभाव ज़ोन स्तर पर साफ दिखाई दे रहा है हालात ये कि कई जोनों मे एक आरओ लेवल का अधिकारी अपने ही सीनियर अधिकारों को आदेशित करता हुआ दिख रहा है.

उपायुक्त मान बैठे खुद को अधिशासी अभियंताओं का बॉस
-खुद से वरिष्ठ अभियंताओं को दे रहे है अब दिशा- निर्देश
-नगर निगम की ज़ोन व्यवस्था में खुला नियम उल्लंघन
-ऐसे में ज़ोन स्तर पर जारी हो रहे मनमाने आदेश
-नियमों के तहत तय पदानुक्रम को किया जा रहा नजरअंदाज़
-इंजीनियर आदेशों से नहीं, दबाव से चलने को मजबूर
-सवाल ये कि क्या आयुक्त लेंगे इस पूरे मामले पर कोई संज्ञान
-या फिर यूंही चलती रहेगी वरिष्ठ अधिकारियों की नजरअंदाजी

नियमों के अनुसार, उपायुक्त ज़ोन की प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करता है, जबकि अधिशासी अभियंता तकनीकी कार्यों, इंजीनियरिंग निर्णयों और तकनीकी स्टाफ के संचालन के लिए उत्तरदायी होता है. दोनों ही अधिकारी सीधे नगर निगम आयुक्त को रिपोर्ट करते हैं और एक-दूसरे के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करते कम से कम व्यवस्था तो यही कहती है. लेकिन  कुछ ज़ोन में हालात इससे बिल्कुल उलट होते नजर आ रहे हैं. सूत्रों के अनुसार, इन ज़ोन में उपायुक्त, अधिशासी अभियंताओं को अपने अधीन मानते हुए ज़ोन स्तर पर ऐसे आदेश जारी कर रहे हैं, जिनका तकनीकी कार्यप्रणाली से सीधा टकराव है. बताया जा रहा है कि कई मामलों में अधिशासी अभियंताओं से बिना किसी लिखित आदेश या आयुक्त स्तर की स्वीकृति के काम कराए जा रहे हैं. यह स्थिति न केवल प्रशासनिक मर्यादा के खिलाफ है, बल्कि निगम के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन भी मानी जा रही है. मामला यहीं खत्म नहीं होता. कुछ ज़ोन में स्थिति और भी गंभीर बताई जा रही है, जहां आरओ (Revenue Officer) को उपायुक्त का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया है. इस अतिरिक्त प्रभार के चलते, आरओ द्वारा अपने से वरिष्ठ अधिशासी अभियंताओं को निर्देश देने की स्थिति बन रही है. यह नजारा निगम के भीतर ही कई अधिकारियों को असहज कर रहा है. निगम के जानकारों का कहना है कि यह न केवल पदानुक्रम के विरुद्ध है, बल्कि इससे निर्णय प्रक्रिया में भ्रम और टकराव की स्थिति पैदा हो रही है.

राजस्व अधिकारी बन रहे ज़ोन के सर्वेसर्वा
-RO को DC बनाए जाने पर शुरू हुआ पावर मिसयूज़
-वरिष्ठ अभियंताओं से जूनियर RO दे रहे दिशा निर्देश
-इन दिनों DCद्वारा XEN को अधीन दिखाने की हो रही कोशिश
-ऐसे में प्रशासनिक मर्यादा हो रही  पूरी तरह तार‑तार
-जबकि नियमों के अनुरूप XEN नहीं करते डीसी को रिपोर्ट
-इन सबके चलते हुए निगम के अंदर बन रहा निगम का मज़ाक
-सवाल अब ये कि कौन तय करेगा इनकी जिम्मेदारी

वर्तमान हालात में सबसे ज्यादा दबाव तकनीकी शाखा पर नजर आ रहा है. सूत्रों का कहना है कि अधिशासी अभियंताओं और उनके अधीनस्थ तकनीकी स्टाफ को मनमाने ढंग से इधर‑उधर स्थानांतरित किया जा रहा है, वह भी बिना किसी स्पष्ट प्रशासनिक आदेश या आवश्यकता के.तकनीकी अधिकारियों का मानना है कि ऐसी तबादला संस्कृति से न सिर्फ कार्य प्रभावित होता है, बल्कि ज़मीनी स्तर पर प्रोजेक्ट्स की गति और गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है.नगर निगम जैसे बड़े शहरी निकाय में प्रशासनिक और तकनीकी समन्वय बेहद आवश्यक होता है. लेकिन जब दोनों धाराएँ अपनी‑अपनी सीमाएं लांघने लगें, तो परिणाम अव्यवस्था और असंतुलन के रूप में सामने आता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो निगम की निर्णय प्रक्रिया कमजोर होगी और भविष्य में बड़े स्तर पर प्रशासनिक टकराव देखने को मिल सकता है.

फिलहाल नगर निगम जयपुर के आयुक्त का दायित्व ओम कसेरा के पास है. निगम की संपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था, ज़ोनल संतुलन और अधिकारियों के बीच स्पष्ट कार्य विभाजन बनाए रखना आयुक्त की जिम्मेदारी होती है.ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या निगम स्तर पर इन घटनाक्रमों की जानकारी है? और यदि है, तो क्या इन पर समय रहते संज्ञान लिया जाएगा?निगम के कई अनुभवी अधिकारी इन हालात को लेकर खुलकर बोलने से तो बच रहे हैं, लेकिन अंदरखाने बेचैनी साफ महसूस की जा रही है. उनका कहना है कि यदि नियमों और पदानुक्रम को पुनः सख्ती से लागू नहीं किया गया, तो पूरे निगम की प्रणाली प्रभावित हो सकती है.

वर्तमान परिस्थितियाँ यह संकेत देती हैं कि नगर निगम जयपुर को तत्काल रूप से अपने प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा करनी होगी क्योकि नगर निगम केवल इमारतों और सड़कों का विभाग नहीं, बल्कि शहर की धड़कन है. उसकी कार्यप्रणाली में संतुलन बना रहना ही जयपुर जैसे ऐतिहासिक और तेजी से बढ़ते शहर के लिए अनिवार्य है.