जयपुरः यूनेस्को स्थापना दिवस केवल ऐतिहासिक धरोहरों को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि प्राकृतिक विरासत के संरक्षण का संकल्प भी है. राजस्थान के भरतपुर में स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान ऐसा ही एक विश्वप्रसिद्ध यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, जो अनेक दुर्लभ पक्षी प्रजातियों का आश्रयस्थल है.
प्रसिद्ध समकालीन चित्रकार हरि दर्शन सांख्य ने इन दुर्लभ पक्षियों के जीवन के संवेदनशील क्षणों को अपने कैनवास पर जीवंत किया है. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हरि दर्शन सांख्य ने देश और विदेश में एकल प्रदर्शनियां आयोजित की हैं. खास बात भारत के विभिन्न ऐतिहासिक संग्रहालयों में संग्रहित अपनी कलाकृतियों के माध्यम से उन्होंने विशिष्ट पहचान स्थापित की है.
तकनीकी सौंदर्य और प्रजातियों की विविधताः
वर्ष 2016 में केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में छह महीने के प्रवास के दौरान उन्होंने पक्षियों के जीवन और व्यवहार का गहन अवलोकन किया और अनेक प्रारंभिक रेखाचित्र बनाए. इन्हीं के आधार पर उन्होंने 48 तैलचित्रों की एक शृंखला तैयार की. वर्ष 2016 से अब तक अप्रकाशित यह संग्रह कला और पर्यावरण संरक्षण के अनूठे समन्वय का उदाहरण है. तैलचित्रों में विभिन्न रंगतों की अनेक परतों का प्रयोग किया गया है. पक्षियों के पंखों की बनावट और उनको उभारने के लिए गहरे और सघन रंगों का उपयोग किया गया है.
भरतपुर के पारिस्थितिकी तंत्र का जीवंत चित्रणः
यह संग्रह केवलादेव की सारस प्रजातियों तक सीमित नहीं है, बल्कि भरतपुर के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का जीवंत चित्रण प्रस्तुत करता है. इसमें स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की विविधता दिखाई देती है जिसमें मुख्य तौर पर पानी पर तैरते पेलिकन, पेड़ की डाल पर चिंतनमग्न बैठा किंगफिशर, पंख फड़फड़ाती पिंटेल और मल्लार्ड बतखें और पेंटेड स्टॉर्क तथा ध्यानमग्न मुद्रा में खड़े बगुले.
प्राकृतिक सौंदर्य और संरक्षण का संदेशः
यह शृंखला पक्षियों के स्वाभाविक व्यवहार के गहन अध्ययन को दर्शाती है. कलाकार हरि दर्शन सांख्य उनकी दैनिक गतिविधियों को बारीकी से चित्रित करते हुए उन्हें कलात्मक गरिमा प्रदान करते हैं. यह संग्रह स्थानीय और प्रवासी पक्षी प्रजातियों का एक प्रामाणिक अभिलेख प्रस्तुत करता है. इनमें साइबेरियन क्रेन भी शामिल है, जिसकी आबादी पिछले दशकों में घटती गई है. लेकिन वर्तमान में यह शृंखला भरतपुर के विरासत होटल ‘चंद्र महल हवेली’ के निजी संग्रह में संरक्षित है.
यूनेस्को स्थापना दिवस के संदर्भ में यह शृंखला महज कलाकृतियों का संग्रह नहीं रह जाती, बल्कि भारतीय वन्यजीव कला का एक विशिष्ट शोध दस्तावेज बनकर सामने आती है, जिसे सार्वजनिक मंच पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए.
लेखक: अशोक महिंद्रू